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Chapter 15

इश्क़ या जुनून -(अंबर-धरा फिर आए सामने ) Chapter 15

रीमा जी : क्या हुआ पुत्तर जी ये स्कूटी क्यों रोक दी.....??

धरा : मम्मी जी शाॅप आ गई.....!!

रीमा जी उन ज़ेवरों को खुद से अलग नहीं करना चाहती थी लेकिन अब तक उनके खुराफाती दिमाग में नई साजिश ने जन्म ले लिया था। और वो मन ही मन में मुस्कुराती हुई स्कूटी से उतर जाती है और उदास चेहरा बनाकर धरा से बोलती है.......... पुत्तर जी अगर तुम दोनों बच्चों के भविष्य का सवाल नहीं होता तो मैं अपनी समधन के ये ज़ेवर अपने ही हाथों से कभी गिरवी नहीं रखती और ना ही तुम्हें रखने देती.....!! पर क्या करूं तुम्हारी जिद्द और क्षितिज की परेशानी के आगे मजबूर हूं......!! मेरा मन अंदर से हजारों टुकड़ों में कट रहा है.....!! और एक एक टुकड़ा मेरे दिल में शूल की तरह चुभ कर मेरी अंतरात्मा को लहूलुहान कर रहा है .....!! कितने शौक से उन्होंने ये ज़ेवर तुम्हारे लिए बनवाए होंगे....!! मैं भी एक मां हूं अच्छे से समझ सकती हूं कि जब एक मां पूरे दिल से अपने बच्चे के लिए कुछ करती है और वो वैसा ना हो तो आत्मा कितनी दुखती है.......!! समधन जी आत्मा तो आज स्वर्ण में भी रो रही होगी।

(सच तो ये था कि जो टुकड़े रीमा जी के दिल में चुभ रहे थे उन्हें वो सिंपैथी की आड़ में धरा के दिल में चुभो कर उसे लहूलुहान करने से बाज नहीं आ रही थी।)

रीमा जी की बातें सुनकर धरा अपने आपको बहुत ज्यादा गिल्टी महसूस कर रही थी......!! और अब   उसके लिए वहां रुकना बेहद मुश्किल होता जा रहा था....!! इसलिए धरा , रीमा जी को ऑफिस के लिए लेट हो रहा है का बहाना देकर तुरंत वहां से निकल जाती है......!!

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