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Chapter 14

इश्क़ या जुनून - (अरमानों पर पानी)Chapter 14

....!! तू मेरी नू नहीं धी (बेटी) है । पैर वैर ना छुआ कर ....!! गले लग जाया कर ...!! आगे से ध्यान रक्खी......!! रीमा जी कृत्रिम मुस्कुराहट के साथ बोलती है......!! लेकिन ललचाई नज़रों से वो धरा की नजर बचा कर बार-बार धरा के पर्स को ही देख रही थी।

रीमा जी धरा पर वारी-वारी जा रही थी और उस पर ऊपरी मन से आशीर्वाद की झड़ी लगा रखी थी,,,,,,,,

रीमा जी : बाबा जी तुझ पर अपनी मेहर हमेशा बनाए रखे....!! तेरी जिंदगी के हर कांटे को निकाल दे......!! खुशियों से तेरा दामन भरा रहे.....!! खुशियां इतनी मिले कि तेरा आंचल कम पड़ जाए.....!! ......................

और भी ना जाने क्या-क्या रीमा जी आशीर्वाद पर आशीर्वाद दिए जा रही थी ....!! उनके मन का मोर झूम झूम कर नाच रहा था....!! सच यहीं था कि उनसे अपनी खुशियां नहीं सम्भल रही थी.....!! और इस खुशी में ऐसे आशीर्वाद दे बैठती है जो कि उनके अगेंस्ट जा रहे थे। आशीर्वाद बेशक ऊपरी मन से दे रही थी पर इस बात से बेखबर कि मंदिर जैसी पवित्र जगह पर खड़े होकर आशीर्वाद वो बेशक ऊपरी मन से  दे रही थी लेकिन धरा तो दिल से स्वीकार रही थी.....!! और इन आशीर्वाद में वो कहीं ना कहीं खुद को श्राप दे रही थी क्योंकि रीमा जैसी लालची, मौकापरस्त ,चापलूस औरत किसी भी लड़की के लिए शादी के बाद कांटा नहीं खंजर जैसी (अभिशाप कहे तो ज्यादा सही होगा) साबित होने वाली थी। फ्लो फ्लो में खुद को ही धरा की जिंदगी से निकाल फेंकने की बात कर रही थी.....!! ये भी नहीं सोच रही थी कि बाबा जी ने उसे तथास्तु बोल कर उसकी लाइफ लाइन कट कर दी तो क्या होगा 😜😜.....??

धरा क्योंकि मंदिर में अक्सर आती रहती थी और पंडित जी उसे बहुत मानते थे, तो धरा रीमा जी का हाथ पकड़कर उनके साथ मंदिर प्रांगण में ही बने कमरों की तरफ बढ़ जाती है और एक रूम के अंदर जाकर उसका दरवाजा बंद करते हुए रीमा जी की तरफ मुड़ कर अपने पर्स में हाथ डालती हैं और उसमें से गहनों से भरी पोटली  निकालकर रीमा जी के सामने रखते हुए बोलती है,,,,,,, मम्मी जी ये हमारी माॅम की ज्वैलरी है....!! कुछ उन्होंने हमारे लिए बनवाई थी और कुछ उनकी शादी की है......!! प्लीज इन्हें अपने उसी सुनार के पास गिरवी रख दीजिएगा और उनसे कह कर सेम डिजाइन की इमिटेशन ज्वेलरी तैयार करवा दीजिए.....!!

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