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Chapter 44

हां इश्क़ है मुझे भी - Chapter 44

ईशानी : (मन में)अभी तो हल्की रोशनी थी ! ये इतना अंधेरा कैसे हो गया ये सोचते हुए ईशानी की नजर उस खिड़की पर जाती है जहां का पर्दा पहले हटा हुआ था अब वहां से रोशनी नहीं आ रही थी मतलब किसी ने पर्दा खींच दिया.....!!

मतलब चोर ने....?? ये ख्याल दिमाग में आते ही ईशानी को घबराहट होने लगती है।

कुछ पल ईशानी सोचती है और फिर डिसाइड करती है कि चोर के पीछे जाने से, उसे ढूंढने से अच्छा है मै दादी मां के पास जाऊ और उन्हें सेफ करु....!! दादी मां की आदत दरवाजा खोल कर सोने की है! बस एक बार चोर की नजरों से बचकर दादी मां के रूम में पहुंचना है और रूम का दरवाजा अंदर से बंद करना है फिर मैं गार्ड पुलिस सबको बुला लूंगी ......!! ये निश्चय करके ईशानी तेजी से चौकन्नी नजरों के साथ इधर-उधर देखते हुए दबे पांव सीढ़ियों की तरफ बढ़ती और बिना बाधा के सीढ़ियों पर पहुंचते ही ईशानी दौड़ते हुए सीढ़ियां चढ़ना शुरू करती है और जैसे ही आखिरी सीढ़ी पर कदम रखती है तो सामने किसी को हाथ बांधे खड़ा हुआ पाती है....!!

सामने (ईशानी के हिसाब से) वही चोर खड़ा हुआ था और उसे एकदम अपने सामने पाकर ईशानी बुरी तरह हड़बड़ा जाती है और घबराहट में जैसे ही थोड़ा सा पीछे पैर रखती है सीढ़ियों से  ईशानी का पैर फिसल जाता है और इससे पहले कि ईशानी सीढ़ियों से नीचे गिरती वह शख्स तेजी से ईशानी की तरफ बढ़ता है और ईशानी की कलाई थाम लेता है...!! इस वक्त ईशानी उस शख्स से और जमीन से 45 डिग्री का एंगल बनाकर झूल रही थी ईशानी अपनी आंखें जितना हो सकते हैं फैला कर देखने की कोशिश करती है लेकिन सामने खड़े शख्स की चेहरा तो अंधेरे की वजह से ईशानी नहीं देख पाती लेकिन फिर पीछे गर्दन घुमा कर अपनी स्थिति देख घबरा कर अपनी आंखें बंद कर लेती है....!!वो शख़्स एक झटके में ईशानी को अपनी तरफ खींचता है और तेजी से घूमते हुए ईशानी को और खुद को लेकर सीढ़ियों से थोड़ा दूर हो जाता है ...!! और झटके से ईशानी को जैसे ही खुद से दूर करता है वैसे ही ठीक उसी समय ईशानी भी उस शख्स को खुद से दूर करने के लिए धकेलती है जिसका परिणाम ये होता है कि दोनों ही विपरीत डायरेक्शन में गिर पड़ते हैं.....!!

ईशानी के हाथ में पकड़ी हुई पोनी की वजह से जब जमीन पर गिरती है तो उसकी हथेली चोटिल हो जाती है जिसकी वजह से ईशानी की मुट्ठी खुल जाती है और पोनी उसके हाथ से छूट कर गिर जाती है और साथ ही होठों से एक आह निकलती है लेकिन अगले ही पल ईशानी को सामने हलचल महसूस होती है तो तुरंत ईशानी खुद को संभाल कर हाथ बढ़ाकर अपनी पोनी पकड़ लेती है और फुर्ती से खड़ी होती है अब तक वह सामने वाला शख्स भी खड़े होकर ईशानी की तरफ अपना हाथ बढ़ाता है लेकिन ईशानी खड़े होते होते पोनी उसके खुद की तरफ बढ़े हाथ में देकर मारती है और खड़े होकर जैसे ही दूसरा वार तेजी से करती है तो सामने वाला शख्स जो अब तक अपने हाथ को दर्द की वजह से झटक रहा था फुर्ती से तुरंत ईशानी के हाथ को पकड़ लेता हैं तो ईशानी अपनी मुट्ठी में बंद की हुई लाल मिर्च को तेजी से उस शख्स की आंखों में डालने के लिए अपनी मुट्ठी खोलकर और शख्स की आंखों में झोंकती लेकिन उसकी मुट्ठी ठीक से खुलने से पहले ही उसके दूसरे हाथ की मुट्ठी को अपने दूसरे हाथ से आधी खुलने तक ही पकड़ लेता है लेकिन तब भी थोड़ी सी मिर्ची उछाल कर उसकी आंखों के आसपास इतनी तो हवा में फैल गई थी कि आंखों में चिरमिराहट जैसा हो गया था एक पल के लिए वो इंसान अपनी आंखें बंद करता है और गुस्से में ईशानी की पोनी वाली कलाई को मोड़कर उसके हाथ से वह पोनी नीचे गिरा देता है और अगले ही पल उस कलाई को छोड़कर जिस हाथ में मिर्च पकड़ी हुई थी उसे वैसे ही पकड़े हुए जोर से झटके से ईशानी को घुमाता है और ईशानी को अपने आजाद हुए हाथ को मूव करने देने का मौका दिए बिना उसे हाथ को वापस पकड़ लेता है अब स्थिति ऐसी थी की ईशानी की पीठ उस शख्स के सीने से लगी हुई थी मिर्ची वाले हाथ को मुट्ठी बंद करके उस शख्स ने पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ को कलाई से पकड़ कर ईशानी के ही पेट पर घुमा कर दूसरी साइड कर रखा था.....!!

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