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Chapter 24

हां इश्क़ है मुझे भी - Chapter 24

ईशानी बस स्टॉप से बाहर आती है और फिर ऑटो करती है और ऑटो वाले को एक धर्मशाला का नाम बता कर वहां चलने के लिए बोलती है...!!

दरअसल इस धर्मशाला में वो सालों पहले जब वो यही कोई 7-8 साल की थी तब अपने नानू के साथ आई थी दरअसल उसके नानू ने ये धर्मशाला अपनी बेटी और दामाद की याद में बनवाई थी और ईशानी को समझ में नहीं आ रहा था कि कहां जाए इत्तेफाक से बेंगलुरु की बस में बैठ गई थी और जब बेंगलुरु उतरी तो बस यही एक नाम उसके दिमाग में आया ! वैसे भी घर से कोई खास अमाउंट लेकर नहीं आई थी कुछ ज्वैलरी थी जो वो डेली में पहनती थी मसलन इयररिंग चैन और कुछ अंगूठी और पर्स में कुछ हजार रुपए इतना ही था ऐसे में किसी होटल मैं कितने दिन सरवाइव करती इसलिए होटल से ज्यादा उसे वो धर्मशाला ही समझ में आई थी।

इधर आहान और आयुष सरस्वती जी के साथ मंदिर पहुंचते हैं  और कार को रोड के एक तरफ लगाकर आहान कार से उतरता है और पीछे की सीट पर बैठी सरस्वती जी के लिए कार का दरवाजा खोलता है वही आयुष भी अपनी साइड का दरवाजा खोलकर जैसे ही कार से उतरने लगता है उसका फोन बज उठता है....!!

आयुषी का कॉल देकर आयुष फटाफट कॉल कट कर देता है और कार से उतरकर कार का दरवाजा बंद करता है और जैसे ही दो कदम आगे बढ़ता है तभी ,,,,,,,

आहान : ओ हेलो नवाब साहब किधर ....??

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