हां इश्क़ है मुझे भी - (समझदारी vs नादानियां)Chapter 18
विनय : कुछ नहीं होगा मुझे तुम दोनों जाओ यहां ........ विनय अपनी बात पूरी भी नहीं कर पता कि तभी एक आवाज गूंजती है .........
बस के पहिए चरमरा कर रुक गए थे और कंडक्टर बोलता है,,,,,,,, बस 15 मिनट यहां रुकेगी जिसे भी हल्का होना हो या जलपान करना हो कर लो फिर बस सीधे अपने मंजिल पर ही रुकेगी......!!
ईशानी जो अपने अतीत से बस के रुकने और कंडक्टर के बोलने पर बाहर आई थी सीट से अपना सिर उठाकर कंडक्टर की बात सुनती है तो वहीं धीरे-धीरे बस से अधिकतर लोग नीचे उतर जाते हैं....!! दो-चार लोग ही बचे थे जो शायद कुंभकरण के रिश्तेदार थे बस रुकने या अनाउंसमेंट होने का उन्हें कोई अंदाजा ही नहीं था चैन से खर्राटे भर रहे थे....!!
तो वहीं दूसरी तरफ ईशानी अपने माथे पर आई पसीने की बूंदो को साफ करके कुछ ठंडी सांसे भरकर उस घटना को याद करते हुए घबराहट में अपनी अनियमित हुई धड़कनों को संयमित करने की कोशिश करती है और इसी क्रम में पानी पीने के लिए अपनी बाॅटल निकालती है जिसमें दो घूंट ही पानी था तो उस पानी को अपने गले से नीचे उतारती है लेकिन प्यास नहीं बुझती फिर भी अपना सिर वापस सीट पर टिका देती है, ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे शरीर में जान ही नहीं बची हैं और अपनी आंखें बंद कर लेती है खाया पिया तो उसने भी कुछ नहीं था लेकिन मन ही नहीं था.....!!अभी भी ऐसे महसूस हो रहा था जैसे अभी अभी उन राक्षसों से जंग लड़कर हटी है गला सूख रहा था और जुबान ऐंठ रही थी तो ना चाहते हुए भी सुस्त कदमों से बस से नीचे उतरती है और अपने लिए पानी की बाॅटल खरीदती है और वापस बस में आकर बैठ जाती हैं.....!!
ईशानी खिड़की से देखती है तो एक मां अपने दोनों बच्चों को बारी-बारी से अपने हाथ से खिला रही थी....!! उसे देखकर ईशानी को अपना बचपन याद आता है और साथ ही याद आता है कि उसकी मॉम भी ऐसे ही प्यार से अपने हाथों से खाना खिलाती थी लेकिन अविका को....!! अगर ईशानी को खिलाने लग जाती थी तो एक दो कोर से ज्यादा खिला नहीं पाती थी क्योंकि अविका मुंह बनाकर बैठ जाती थी और फिर उसकी मॉम उसे भुला कर अविका को पैंपर करने में लग जाती थी.....!! हमेशा से ही उससे समझदारी की उम्मीद की जाती थी....!! समझदार बनते बनते कब उसका बचपन उस समझदारी की भेट चढ़ गया उसे पता ही नहीं चला.....!! उसका भी मन करता था कि वो भी जिद्द करें ,रूठे और उसकी मॉम कभी उसकी जिद्द पूरी करें !कभी रूठे तो उसकी जिद्द मान कर उसे मनाएं.....!! कभी ना भी करे तो उसे प्यार से समझाएं! लेकिन रूठती तो तब जब उसकी मॉम को वो दिखाई देती! अविका के आगे तो वो जैसे उस घर में मौजूद ही नहीं होती थी....!! कितने आराम से दो बच्चों में से एक बच्चे को यह कहकर नेगलेक्ट कर दिया जाता है कि ये तो समझदार है .....!! और बच्चों में ही क्यों बड़ों के साथ भी तो यही होता है.....!! समझदार को गलती करने की परमिशन ही नहीं होती.....!! उसकी मामूली गलती भी उसका गुनाह बन जाती है! उसे उन सब की उम्मीदों को अपने कंधों पर ढोना पड़ता है जिनकी नज़रों में वो समझदार है.....!! हमेशा उसे ही झुकना पड़ता है ,उसे ही समझौता करना पड़ता है और समझना भी उसी को पड़ता है क्योंकि वो समझदार है ! दूसरे की बदतमीजी , मुंह फट पने, जिद्दी पने को बड़े प्यार से नादान ,नासमझ, बेवकूफ बोलकर प्रोटैक्ट कर लिया जाता है ! एक ही उम्र की तो है दोनों बहने फिर एक की हर जिद्द, हर बात ये कह कर मान लेना कि वो नासमझ है और एक को सिर्फ इसलिए नजर अंदाज कर देना कि वो समझदार है कहां तक उचित है....? अजीब सिस्टम है जहां अच्छा और समझदार होना आपके लिए अभिशाप बन जाए और जहां गलत होना ना समझ होना ऐसा वरदान जहां नादानियां भी हमेशा उसको स्पेशल ट्रीटमेंट दिलाने का कारण बन जाए......!! कितनी बार ईशानी का दिल किया कि बोल दे नहीं बनना उसे समझदार उसे भी करनी है नादानियां .....!!नादानियां करने के बावजूद भी लाड़ दुलार और समझदारी दिखाने के बाद भी दुत्कार तो फिर बिल्कुल भी नहीं बनना उसे ऐसी समझदार......!! यही सोचते सोचते हैं कब ईशानी की आंखों में सैलाब उमड़ आता है और कब हमेशा की तरह वो खुद ही खुद के आंसू साफ करके अपने कंधे पर ही अपना सर टिकाकर खुद को ही एक टाइट हग देती है और हमेशा की तरह महसूस करने की कोशिश करती हैं कि उसने खुद को गले नहीं लगाया है बल्कि उसकी माॅम ने उसे गले लगाया है....!! ऐसे ही हमेशा खुद को झूठी तसल्ली दे दिया करती थी और अब तो पूरी तरह अकेली थी जिस झूठ को हमेशा झुठलाने की कोशिश करती थी वो ,वो झूठ भी अब सच में साथ छोड़ गया था....!!
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