Wife With Benefits - Chapter 18
घर आते-आते रात के 1:00 बज गए थे। माहौल इतना खराब हो गया था कि हम मेरे पति के पेरेंट्स के घर पर भी नहीं रह सकते थे। मेरे पति के साथ उनके संबंध पहले ही खराब हो चुके थे, मैंने भी आखिर में बात करके अपने रिलेशन को बिगाड़ दिया था। वरना वे लोग इतना तो जरूर कहते, "बहू रात को अकेले कहाँ जाएगी? जो भी लड़ाई है, हम इसे बाद में शुरू करेंगे, लेकिन अभी यहाँ रुक जाओ।"
मगर रुकने का कहना तो दूर की बात, उन्होंने यह भी नहीं कहा कि ध्यान से जाना। मेरा पति परेशान था। आते ही वह किचन में गया और ठंडे पानी की बोतल निकालकर उसे गिलास में भरकर पीने लगा। मेरा पति ड्रिंक नहीं करता था, इसलिए जब भी उसे गुस्सा आता था या फिर अजीब लगता था, तब वह एक ठंडा गिलास पानी पी लेता था। या फिर बस वहीं बैठ जाता था जब तक कि उसका गुस्सा शांत नहीं हो जाता था।
मैं उसके पास गई और मैंने भी एक गिलास में पानी डालते हुए कहा, “चीजों को इतना सीरियसली मत लो। मेरे ख्याल से यही सबसे अच्छा तरीका था तुम्हारी बात मनवाने का। यह मौका तुम्हारे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।”
उसने मेरी तरफ देखा और कहा, “यह वरदान नहीं बल्कि श्राप है। जिस बिजनेसमैन के साथ डील करनी है, तुम उसके बारे में नहीं जानती हो। वह खुद की मर्जी का मालिक है। उसे मुनाफे या फिर नुकसान से कोई लेना-देना नहीं, अगर उसे किसी चीज से लेना-देना है तो वह बस और बस अपनी खुशी से है। अगर सामने वाले से वो खुश नहीं हुआ, तो चाहे तुम कितना भी अच्छा प्रपोज़ल क्यों ना दे दो, वह डील से नहीं करने वाला है। मेरे डैड ये सारे काम अच्छे से कर लेते हैं, लेकिन मुझे यह सब नहीं आता। हम फँस चुके हैं।”
मुझे उस बिजनेसमैन के बारे में ज्यादा नहीं पता था, लेकिन मेरे पति ने जिस तरह से बताया, मुझे वह भी अच्छा नहीं लग रहा था। या फिर हो सकता है मेरा पति परेशानी की वजह से बस नेगेटिव सोच रहा है। किसी को खुश करना इतना भी मुश्किल नहीं होता जितना वो अपने दिमाग में पाल बैठा है।
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