बेइंतहा ❤ "जुनून इश्क़ का" Ch. 3

बेइंतहा "जुनून इश्क़ का" - Chapter 3

Posted by Archana Thakur • Jul 29, 2025 09:06 PM

सबकी निगाह का दृश्य अब पूरी तरह से बदल चुका था| वह महिला भी मुंह पर हाथ रखे बस अपनी जगह खड़ी स्तब्ध रह गई थी| उसके सामने ही सड़क पर अरुण और नन्हा क्षितिज अपने अपने कान पकड़े उठक बैठक लगाने लगते है| सब हैरान होकर उस लाजवाब दृश्य पर से अपनी नज़र ही नही हटा पा रहे थे|

आखिर किसका डर उन दो राजकुमारों पर अपना असर दिखा रहा था कि एक जवान लड़का और एक नन्हे बच्चे में कोई फर्क नही रह गया था| सबकी हैरान नज़रे अब दिलचस्पी में बदल गई और ये मंजर देखते वह महिला लगभग भागती हुई दोनों का एकसाथ हाथ पकड़े एक ओर उन्हें खींचकर लाती हुई लगभग उनपर बरस ही पड़ी –

“बस तुम दोनों के पास यही आखिरी हथियार है – कर लो मुझे ब्लैकमेल – कुछ और भी बचा हो तो वो भी कर लो – आखिर पूरा सूरत देखे तो इन दिवान परिवार के नौनिहालों की सूरत !”

“सॉरी मम्मा |”

“सॉरी भाभी...|”

दोनों बारी बारी से बोलते अभी भी किसी अपराधी की तरह उसके सामने खड़े थे और वो जो उनके सामने खड़ी थी वह थी दिवान परिवार की बड़ी बहु और आकाश दिवान की पत्नी भूमि जो असल में थी तो सिर्फ क्षितिज की माँ पर अरुण के लिए भी उसकी भाभी माँ से कम नही थी|

“अब तुम दोनों का ड्रामा कम्प्लीट हो गया हो तो चले घर !”

भूमि की बात सुनते अरुण और क्षितिज एकदूसरे को देखते आंख मारते हुए भूमि को देखते हुए किसी मासूम बच्चे की तरह हामी में सर हिला देते है|

“वैसे अरुण आते ही तुमने सूरत में बढ़िया पिक्चर बना ली बस शुक्र मनाओ कोई रिपोटर नही हो यहाँ वरना तुम्हारी अंकल के सामने पेशी होने से कोई नही रोक सकता |” तबसे उनके ड्रामे का मजा लेते योगेश ने जल्दी से उनके बीच आते हुए कहा तो सभी फसी सी हंसी हँस पड़े|

“अरे योगेश !! तुम कब अब्रोड से आए ?” भूमि अब योगेश की ओर देखती हुई पूछती है|

पर योगेश हिचकिचाता हुआ कह उठता है – “मैं – मैं तो कही नही गया भाभी – मैं तो यही सूरत में था|”

“ओह चार साल से दिखे नही न इसलिए पूछ लिया|”

योगेश समझ गया था कि भाभी की हाज़िर जवाबी से बचना उसका मुश्किल है| भूमि की बात समझते अब योगेश झेपता हुआ फसी सी हंसी से कह उठा – “ओह सॉरी भाभी – वो मेडिकल में बीजी रहा इसलिए |”

“हाँ क्यों नही दोस्त के आते अब तुम क्या वर्तिका भी नज़र आने लगेगी – बस किसी को भाभी से ही नही मिलना होता |”

“अच्छा है न मैं अपनी प्यारी भाभी माँ किसी से शेअर भी नही करना चाहता |” अबकी अरुण अपनी भाभी का कन्धा पकड़ते हुए कहता है|

“हाँ हाँ बस – अब चलो भी घर |” भूमि मुस्कराती हुई क्षितिज की उंगली थामती हुई कहती है|

“भाभी मैं योगेश के साथ आता हूँ – आप चलिए |” अरुण के कहते भूमि हाँ में सर हिलाती अपनी कार की ओर बढ़ जाती है और उसकी बगल की सीट पर क्षितिज जाकर बैठ जाता है|

वही योगेश की कार में बैठते ही अरुण अपनी पॉकेट तलाशते हुए सिगरेट निकालते हुए बड़े इत्मिनान से उसे सुलगाते उसका एक गहरा कश लेता है| ड्राइविंग सीट पर बैठा योगेश ये देखते चिढ़ते हुए बोलता है – “हाँ तो अब समझ आया इसलिए तू भाभी के साथ नही गया – तू इन चार साल में भी बिलकुल नही बदला – तू और ये तेरी लत |”

“तो कौन कमबख्त बदलने गया था वो तो डैड का हुकुम था जिसे सजा की तरह काटकर बस वापस आ गया|”

“अब फिर वही सब बाते – ये तू और तेरा एटीट्यूड  फिर तेरा अंकल से जरुर कोई पंगा कराएगा – अरे चिल यार क्या कमी है तेरी लाइफ में – क्यों बेवजह अपनी जिंदगी खराब करने में लगा है और ये तेरे फेफड़े है क्यों बेदर्दी से इन्हें फूक रहा है ?” लगातार सिगरेट के गहरे कश लेते देखते हुए योगेश कहता है|

“हाँ ये मेरे है इसलिए तो इतना हक़ है नहीं तो अगर ये डैड के दिए होते तो वही बताते कि इसमें कितनी साँसे भरनी है और कितनी निकालनी|” कहता हुआ अरुण ठसक भरी हंसी से हँस पड़ता है|



"चल छोड़ न यार – अच्छा ये बता कल पार्टी करे ? क्योंकि परसों तो तेरे लिए दिवान मेंशन में पार्टी रखी गई है – जल्दी बता फिर सब अरेंजमेंट मैं करता हूँ – वैसे भी वर्तिका तो है नही यहाँ |”

“वर्तिका !! कहाँ है वह ?” अब अरुण दूसरी सिगरेट सुलगा रहा था|

“क्या पता उसके भैया का तो पता है न कितने सीक्रेट इंसान है – कुछ दिन पहले मिली थी तभी बता रही थी कि उसके भैया ने उसके साथ कही आउटिंग का प्रोग्राम बनाया है – कहाँ ये खुद वर्तिका को भी नही पता – कितने मेसेज भेज चुका हूँ – लगता है तेरी तरह मोबाईल इस बार कही छोड़ रखा है उसने भी – नही तो तू आज आया अगर उसे पता होता तो सारे प्रोग्राम छोड़ छाड कर आ जाती तेरे को रिसीव करने |”

इस पर अरुण बस हलके से मुस्करा देता है|

जबकि योगेश हमेशा की तरह लगातार बोलता हुआ कार ड्राइव कर रहा था – “तेरे आने से लग रहा है जैसे अपने स्कूल के दिन फिर से वापस आ गए -  कॉलेज तो हम तीनो एक साथ एक साल ही पढ़ पाए – इधर तू सिडनी चला गया और मैं अपनी मेडिकल की पढाई में बीजी हो गया फिर बहुत कम मौका ऐसा मिलता जब वर्तिका मुझसे मिलने आती – अब तू आ गया है न – देखना जमकर इन चार साल की कसर निकालेंगे |”

योगेश अपनी बात कहता और खुद ही हँस पड़ता पर अरुण जो सामने से अपने शहर को निहारता हुआ मन ही मन कही गुम था| ये भीड़ भरा शहर फिर से उसमे या वह उसमे शामिल होने आ पहुंचा है| हर बार वह भीड़ में यूँही गुम होता कही खो जाता| अब उसे इस तरह से खो जाने की आदत सी हो गई थी पर मन बार बार बुद्ध होना चाहता| उसका मन कही दूर चला जाना चाहता| इस वैभव भरी गलियों में उसे चुभन होती पर उसकी चुभन को समझने वाला कोई नही था, उसके अकेलपन को जानने वाला कोई नही था बस एक था उसका अपना तनहा मन और तनहा एकांत जहाँ अक्सर वह बड़ी ख़ामोशी से घंटो पड़ा रहता और अपनी साँसों को नदी का बहता हुआ यूँही महसूसता|

आखिर क्या इति है उसके इस अकेलेपन की !! आखिर क्या चाहत है उसके जीवन की !! बिन मकसद के बस अपने पिता की बनाई दुनिया का वह एक कठपुतली मात्र है जिसे वह अपनी उँगलियों पर ज़माने के सामने नचाता हुआ देखना चाहते जबकि हर बार इस टीस के साथ एक बगावत का बीज उसके अन्दर अंकुरित हो जाता|

आखिर कब तक वह इस नन्हे बीज को उनकी कर्कश दुनिया से बचाकर रख सकेगा ? कब उसकी बनाई अपनी दुनिया होगी ? आखिर कब इन्तहा होगी इस बेइंतहा दर्द की.....

क्रमशः ...........................

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