बेइंतहा ❤ "जुनून इश्क़ का" Ch. 1

बेइंतहा "जुनून इश्क़ का" - Chapter 1

Posted by Archana Thakur • Jul 29, 2025 09:03 PM

खूबसूरत दौड़ता सिडनी शहर मानो रेशमी पंखो से उड़ जाना चाहता था| चमकीली रेत पर उमड़ उमड़ कर आता समंदर किसी जुनूनी आशिक मानिंद लगता जो अपना इश्क और रश्क एकसाथ मानो जी लेना चाहता हो| किसी ख्वाब सा शहर हर आँखों को एक नशीला सपना थमाता जब झूम रहा होता तब उसके किसी नीरव एकांत में वह नौजवान सबसे तनहा बैठा होता|

वह था सूरत के नंबर वन टेक्सटाइल बिजनेसमैन दिवान इन्डेस्ट्री का छोटा बेटा या कहे मोस्ट एलिजबल स्मार्ट डैसिंग अरुण दिवान पर अपने सबसे रूमानी दिनों में वह सबसे कटा हुआ अकेले अपने आलीशान मेंशन की टेरिस में बैठा दूर समंदर की चमकीली लहरों में घुलते आसमान को निहार रहा था| पिछले चार साल से लेकर आज सिडनी की आखिरी रात भी उसकी कुछ अलग नही थी| वही तन्हाई और वही समंदर में घुलता आसमान, कुछ फर्क नही आया उसके इन चार सालो में और वही उसकी उँगलियों में फसी सिगरेट जिसका गहरा कश लेकर उसे दर्द की तरह बार बार होंठो के कोने से वह बाहर उझेल देता पर उसी रफ़्तार से दुबारा कोई दर्द उसके दिल में अपना जमावड़ बना लेता| इसी क्रम में वह अबतक नौ सिगरेट पी गया था और इस रात की आखिरी सिगरेट को पीकर वह उसी तन्हाई में लिपटा अपने बिस्तर पर सोने चला जाता है|

सब जैसे रोजाना की दिनचर्या सा तय था| उसके साथ साथ रहने वाला राजबीर को पता था अब उसे क्या करना है| वह बिन आवाज के उसके कमरे में आता अरुण के जूते खोलता हुआ उसे ओढाकर लाइट ऑफ़ करके चला जाता है|

अगली सुबह की पहली फ्लाइट से वह पूरे चार साल की पढाई के बाद अपने देश अपने शहर सूरत को वह लौटने वाला था पर न उसके चेहरे पर इस रूमानी शहर को छोड़ने की कोई खलिश थी और न अपने शहर पहुँच जाने की उत्सुकता| वह बस अपने पिता की हर आज्ञा की तरह इसे भी उनका अगला हुकुम मानकर बस पालन कर रहा था|

इसके विपरीत उसके आने के इंतजार में सूरत की विशाल कोठी अभी भी यूँ शांत थी मानो वहां कोई हो ही न| अरुण को जिस दिन आना था वह उससे दो दिन पहले अपने शहर पहुँच रहा था| ये प्रोग्राम उसने अपने मन से परिवर्तित किया था जबकि उसके परिवार वालो को उसके लौटने की दो दिन बाद की तारिख पता थी|

सिडनी से उसके जरुरी कागजात समेटवाने के लिए एक नया मेनेजिंग ऑफिसर भेजा गया था जिसे राजबीर के साथ साथ रहना था| वह यहाँ आने और अरुण से मिलने से पहले बहुत सारी उपकल्पना उसके बारे में बनाकर आया था पर अरुण को देखते उसकी वे सारी उपकल्पना मानो हवा हो गई| आज के ज़माने में इतना रिच और हैंडसम यंग ऐसे भी रहता है क्या !! न लड़की न शराब का दौर न पार्टी न लोगो की अथाह भीड़ जैसे ज़माने की भीड़ के बीच कोई साधू हो गया हो !!

वह हैरानगी से देख रहा था जबकि राजबीर इन सबका आदि था और सहजता से मुस्कराकर उसे लेकर चलता हुआ कहता है – “अभी तो और भी आश्चर्य बचे है – माधव जी अपना आश्चर्य जरा बचा कर रखिए |”

“हाँ लग तो यही रहा है – आखिर इन्हें परेशानी क्या है – सभी कुछ तो है इनके पास – फिर ये अकेलापन और तन्हाई किस बात की – इनके तो आस पास लड़कियों की भीड़ नज़र आती – बस एक बार नज़र उठाकर इशारा तो करते फिर ऐसा क्यों.....!!”

“यही बात तो हमारे छोटे सरकार की उन्हें सबसे अलग करती है – इस चार सालो में पढाई के लिए आते ऐसे नौजवान यहाँ जाने कितनी रंगरेलियां मनाते पर हमारे छोटे सरकार तो किसी लड़की की ओर नज़र उठाकर देखते भी नही – बस एक गलत आदत के अलावा कोई एब नही मिलेगा उनमे |”

“एक गलत आदत.....हम्म....वही तो कहू कुछ तो होना ही चाहिए – आखिर ये पैसा अपने साथ एब न लाया तो इसका अर्थ ही खत्म हो जाएगा |” अबकी माधव राजबीर की बातों पर दिलचस्पी लेता हुआ कहता है|

“सिगरेट पीना – पता नहीं क्या जूनून है इसे लेकर – देखकर मन मेरा जलता है पर जानता हूँ वे इसके बिना नही रह सकते इसलिए कुछ भी हो जाए लेकिन उनकी सिगरेट का इंतजाम मुझे हर जगह रखना पड़ता है – बस यही एक एब है जिसे देखकर मन दुखी होता है|”

“क्या !!! बस यही एक एब !! मैंने तो न जाने क्या क्या सोच लिया था – मैं तो इनके बड़े भाई आकाश दिवान जी को भी मिल चुका हूँ – उन्हें मिलने के बाद इन्हें देखना बिलकुल वैसा ही है जैसे दो विपरीत धारा को देखना -|”

“हाँ तो सही ही है – वे जमी आसमान से विपरीत है इसलिए वे अपने परिवार में अनोखे है – यही देख लो आज से दो दिन बाद भारत जाना था पर कल जा रहे है – पता है क्यों ?”

“क्यों ??”

“क्योंकि आज से दो दिन बाद मेरी बहन की मंगनी है |”

“मैं कुछ समझा नही – तुम्हारी बहन की मंगनी से उनका जाने का क्या सम्बन्ध ?”

राजबीर मुस्कराते हुए कहता है – “यही तो अनोखी बात है हमारे साहब में – मेरी बहन की मंगनी मतलब मुझे वहां होना चाहिए पर बड़े साहब ने मुझे छोटे साहब के साथ ही वापसी का हुकुम दिया था इसलिए वे उनके विपरीत जाकर मुझे छुट्टी तो नही दे सके इसलिए खुद दो दिन पहले ही भारत पहुँच रहे है जिससे मैं अपने परिवार की ख़ुशी में शामिल हो सकू – दिल तो उनका खरा सोना है बस गलत परिवार में जन्म ले लिया – कोई समझता कहाँ है उन्हें – पर वे सबको समझते है – खैर चलो अब जाने की तैयारी करते है – सिर्फ दो दिन के लिए जाने के अरेंजमेंट में कितना बदलाव करना पड़ा पर मेरे बारे में पता चलते सब चुटकियों में कर लिया |”

“हाँ तो तुम उनके साथ साए की तरह रहते हो न !”

“देखते जाओ – धीरे धीरे सब पता चल जाएगा – हीरा अपनी चमक सिर्फ जौहरी पर ही नहीं दुनिया पर छोड़ता है -| हँसते हुए राजवीर अपनी बात कहता अब सोने की व्यवस्था करने लगता है|

........तो क्या है दास्ताँ इस नए सफ़र की पता करने बने रहे मेरे साथ..



क्रमशः ..........

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