बेइंतहा ❤ "जुनून इश्क़ का" Ch. 2

बेइंतहा "जुनून इश्क़ का" - Chapter 2

Posted by Archana Thakur • Jul 29, 2025 09:05 PM

फ्लाइट अपने सुनिश्चित समय पर भारत की सरजमी पर उतरती है और साथ ही अपने शहर में उतरता है अरुण दिवान भी वो भी पूरे चार साल बाद| सिविल फ्लाइट से आने से उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी एक निजी कंपनी द्वारा संभाली जा रही थी जिससे उसके आगे पीछे एक सुरक्षात्मक घेरा बनाकर वे चल रहे थे जबकि अरुण इन सब तरह के तामझाम पर हमेशा अपनी नाराजगी दर्ज कराता इस कारण वे सभी अरुण से थोड़ा दूरी बनाकर चल रहे थे|

राजवीर और माधव भी उससे दूरी बनाकर उसके पीछे पीछे चल रहे थे| अभी वह एग्जिट पॉइंट से निकला ही था कि कोई शख्स चुपचाप उसके पीछे पीछे होता उसकी ओर बढ़ने लगा पर उन पर माधव की नज़र पड़ गई| वह देखता है कि वह शख्स किसी भी तरह से अरुण के पास पहुँच जाना चाहता था|

वह उसे बस टोकने ही वाला था कि राजवीर उसे ऐसा करने से रोक देता है जिससे वह आश्चर्य से उसकी ओर फिर उस शख्स की ओर देखता है| वह शक्स अब तक अरुण का सुरक्षात्मक घेरा तोड़ता उसके पास पहुँचते उसे पीछे से धौल जमा चुका था| जिससे सुरक्षाकर्मी बस उसकी ओर मुड़ने ही वाले थे कि अरुण उस शख्स की ओर मुड़ता हुआ कसकर मुस्करा उठा|

“योगेश..!”

“और तू क्या समझता है – तू चार साल बाद चुपचाप शहर आएगा और मुझे पता भी नही चलेगा |”

इस पर अरुण दोस्ताने अंदाज में उसकी ओर हाथ मिलाते उसके गले लग जाता है| वे सभी समझ गए थे कि वह अरुण का परिचित है इसलिए उसके आस पास ठहर जाते है|

“इतना भी तुझसे नही होता कि बता देता कि दो दिन पहले आ रहा है पर मैं भी निकला न घाग – पकड़ ही लिया तुझे |”

जिगरी दोस्त से मिलकर अरुण प्रसन्नता जाहिर करता हुआ कहता है – “हाँ अचानक प्रोग्राम में चेंज आया |”

अब वे साथ में बाहर की ओर बढ़ने लगे थे|

“तो इसका मतलब तूने घर पर भी किसी को नही बताया होगा – आई नो |”

“इसकी जरुरत भी नही |”

“तू न कभी नही सुधरने वाला – कम से कम भाभी को तो बताया होता - !!”

इस पर हमेशा वाली हलकी मुस्कान उसके चेहरे पर दिखाई पड़ आई| योगेश अपनी बात कहता कहता देखता है कि अरुण बाहर निकलते अब अपनी जेब में कुछ टटोलने लगा था|

अरुण बस सिगरेट निकालने ही वाला था कि अचानक कोई धुन उसके कानो से टकराई और वह एग्जिट पॉइंट पर मूर्ति बना ठहरा रह गया| उसके बाहर आते उसकी नज़रो के सामने एक कार रूकती है जिसके पिछले दरवाजे से एक एक करके एक दो तीन चार फिर पूरे पांच बैंड वाले उतरते हुए कोई सुरीला बैंड बजाने लगते है| और सबसे आकर्षण का उस बैंड के ठीक आगे गले में छोटा ढोल लिए बजाता एक सात आठ साल का बच्चा जो पूरी मस्ती में खड़ा ढोल बजा रहा था जो उस सुरीली धुन में कुछ अलग ही मालूम पड़ रहा था पर फिर भी सबका ध्यान बस उसी पर टिका था|

अरुण तो बस सीने पर हाथ बांधे उस दृश्य को प्यार भरी नज़र से देखता रहा और वही नही बल्कि वहां से गुजरते सभी इस दृश्य को नजर भर कर देखे बिना न रहे| वह प्यारा सा बच्चा अपने साफ शालीन कपड़ो में भी मस्तमौला लग रहा था और उसे निहारते डैसिंग अरुण पर भी एक बार को सबकी नज़र घूम जाती|

ये सब देख योगेश धीरे से अरुण के कान के पास आता कह रहा था – “दो लोग है दुनिया में जो कभी भी कुछ भी कर सकते है – एक अरुण दिवान और दूसरा उसका भतीजा क्षितिज दिवान – इन्हें कोई नहीं रोक सकता|”

अब अरुण क्षितिज के पास आता उसे प्यार से अपनी गोद में उठाने लगता है तो ढोल बंद करते हुए वह कहता है – “अरे चाचू – सबके सामने मुझे गोद में मत उठाओ – मैं अब बड़ा हो गया हूँ |”

“वो तो दिख ही रहा है|” वह मुस्कराते हुए उसके फूले गाल प्यार से चूम लेता है|

अरुण क्षितिज को लेते राजवीर को इशारा करता है और वह इशारे में सब समझता हुआ तुरंत उन बैण्ड वालो को नगद देता हुआ उन्हें विदा कर देता है|

अभी वे साथ में मिलकर बस आगे बढ़ने ही वाले थे कि एक काली शानदार कार आकर ठीक उसके सामने रूकती है| जिस तेजी से वह कार उसके सामने आकर रुकी थी उसी तेजी से उस कार की ड्राइविंग सीट से एक आकर्षित महिला भी तुरंत बाहर निकलती है| अब सबकी नज़र बस उसी की ओर घूम गई ही|

गहरे भूरे रंग की सादी साडी में लिपटी उस महिला की समृद्धि उसके हर चाल से झलक रही थी| उसकी सादगी में भी उसका वैभव प्रकट हो रहा था| मानो वह कोई मुट्ठी में बंद हीरा थी| वह तेजी से अरुण की ओर बढ़ रही थी और उसी रफ़्तार से अपनी आँखों का काला चश्मा वह अपने सर की ओर करती कसे हुए भाव से अरुण को देख रही थी|

अरुण भी उसे देखता बस अपनी जगह थम सा गया जबकि क्षितिज उसकी गोद से उतरता हुआ उस महिला को भी सपाट भाव से देख रहा था जो तेज कदमो  से उनके बीच का फासला तय करती उनके पास तक पहुँच गई थी|

“कोई जरुरत नही थी न मुझे बताने की – आखिर मैं हूँ ही कौन - |”

वह महिला उन पर तीखी नज़र डाले नाराज हो रही थी और दोनों भी किसी अपराधी की तरह बस नज़र झुकाए खड़े थे|

“जो जी में आए करो – ठीक है – फिर मैं यहाँ आई ही क्यों – मुझे तो बिलकुल यहाँ होना ही नही चाहिए – क्यों है न !!”

वह महिला अभी भी उन्हें तीखे हाव भाव से उन्हें घूर रही ही जबकि अरुण और क्षितिज बुझे भाव से एकदूसरे का चेहरा देख रहे थे और वहां उपस्थित बाकी उनका चेहरा देख रहे थे जैसे जानना चाहे थे कि वे अब क्या करेंगे !!

वह अभी भी कहे जा रही थी – “मैं वहां स्कूल जाती हूँ तो पता चलता है क्षितिज बाबा कहाँ गए किसी को नहीं पता और यहाँ ये छोटे नवाब चुपचाप चले आए और किसी को बताना तो इनकी जिम्मेदारी के अन्दर आता ही नहीं – जिसे पता करना हो खुद पता करो – ठीक – तो दो प्यार करने वाले मिल लिए फिर मेरी तो कोई जरुरत ही नहीं यहाँ – मैं जा रही यहाँ से – अभी |”

वह गुस्से में पैर पटकती बस पलटने ही वाली थी कि अरुण और क्षितिज आँखों आँखों में एकदूसरे को जाने का इशारा करते है और पल में सबकी निगाह बस उनकी ओर ही घूम जाती है|

क्या होगा आगे !! और कौन है ये महिला जानने के लिए बस करे एक दिन का इंतजार....और हाँ आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया...इस यात्रा में साथ चलने के लिए....



क्रमशः ...........................

100%