कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 24
दिन ढलते ही घर में शाम की हलचल शुरू हो गई। कजरी, जो किसी भी पारंपरिक नियम या लोक-लाज की परवाह नहीं करती थी, ने एक बार फिर अपनी लाल साड़ी उतारकर एक किनारे रख दी। वह अपनी उसी चिरपरिचित अलबेली धुन में केवल एक तंग काली ब्रा और बारीक थ्रोंग पहने रसोई घर में अकेली रात के खाने की तैयारी करने पहुँच गई।
शाम की मद्धम रोशनी में उसका गोरा और गदराया बदन चमक रहा था। ब्रा की तंग पट्टियों से उसके भारी और गोल-मटोल दूध आगे की तरफ लटके हुए थे, और पीछे थ्रोंग की महीन डोरी के कारण उसके दोनों विशाल चूतड़ पूरी तरह से खुले और बेबाक दिख रहे थे। वह अपनी पतली कमर को मटकाती हुई बर्तन समेट रही थी कि तभी जेठ जी की नज़र उस पर पड़ गई।
## रसोई में जेठ जी का दोबारा धावा
सुबह के खेल के बाद से जेठ जी का हौसला पहले ही बढ़ा हुआ था। शाम को कजरी को इस तरह अकेले और पूरी तरह से उघड़े बदन में देखकर उनसे एक पल भी रहा नहीं गया। वे दबे पाँव रसोई के भीतर आए और बिना कोई समय गंवाए सीधे पीछे से कजरी के दोनों भारी और मांसल चूतड़ों को अपने कड़े हाथों के शिकंजे में ले लिया।
* **रबड़ की तरह मथना:** जेठ जी ने अपने दोनों हाथों की हथेलियों से कजरी के नितंबों को पूरी ताकत से भींचना और एक कड़े रबड़ की तरह गोल-गोल मसलना शुरू कर दिया। उनके हाथों का दबाव इतना कड़ा था कि कजरी का मांस उनकी उंगलियों के बीच बुरी तरह पिचक रहा था।
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