कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 16
पगडंडी और बसों का सफर तय करके जब कजरी अपने माता-पिता के साथ बुआ के गाँव पहुँची, तो वहाँ का नज़ारा देखते ही बनता था। बुआ का घर रोशनी से जगमगा रहा था, दरवाज़े पर तोरण बंधा था और मंगल गीत गाती महिलाओं की आवाज़ें गूंज रही थीं।
जैसे ही कजरी ने अपने सुंदर लाल घाघरा-चोली के घेरे को संभालते हुए बुआ के आंगन में कदम रखा, पूरे परिवार के चेहरे खिल उठे। अपनी सुबह की अल्हड़ और मदमस्त दुनिया को पीछे छोड़, कजरी यहाँ पूरी तरह से एक संस्कारी, सलोनी और मर्यादा में लिपटी बेटी के रूप में सामने थी।
## कजरी का पारिवारिक आदर और संस्कार
बुआ अपनी बेटी की शादी की तैयारियों में व्यस्त थीं, लेकिन भाई-भाभी और भतीजी को आया देख वे दौड़कर दरवाज़े पर आईं। कजरी ने बिना एक पल गंवाए अपनी चुलबुली मुस्कान को थोड़ा धीमा किया और झुककर पूरे आदर के साथ सबसे पहले अपनी बुआ के पैर छुए।
* **बुआ का दुलार:** बुआ ने कजरी की पीठ पर हाथ फेरा, उसे गले से लगाया और उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, *"जीती रह मेरी लाडली, दूधो नहाओ-पूतों फलो! कितनी बड़ी और सुंदर हो गई है मेरी बच्ची।"*
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