कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 10
अपने उन्हीं नए-नवेले, गोल-मटोल चूतड़ों को मटकाती और खेतों में किसानों के ठहाकों को पीछे छोड़ती हुई कजरी आखिरकार वापस उसी पुराने तालाब के किनारे पहुँच गई, जहाँ से सुबह उसकी यह अनोखी दास्तान शुरू हुई थी।
दोपहर की तेज़ धूप अब पानी की सतह पर चमक रही थी, जिससे तालाब का पानी चांदी की तरह लश-लश चमक रहा था। कजरी ने पगडंडी से उतरकर तालाब की सीढ़ियों पर अपने कदम रखे। इस वक्त वह केवल अपनी लाल ब्रा में थी, और उसका बाकी का पूरा बदन कुदरत के इस खुले माहौल में बिल्कुल नंगा था।
जैसे ही उसने पानी के पास पहुँचकर अपने भारी चूतड़ों को एक बार फिर झटका, तालाब के शांत पानी में उसकी परछाईं हिल उठी। कजरी ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए, अपनी लाल ब्रा की पट्टियों को खोला और उसे भी किनारे की एक चट्टान पर रख दिया।
अब कजरी पूरी तरह से दिगंबर, अल्हड़ और मदमस्त रूप में तालाब के किनारे खड़ी थी। हवा के ठंडे झोंके जब उसके भीगे बदन और नए उभरे अंगों से टकराए, तो उसके बदन में एक मीठी सिहरन दौड़ गई। उसने बिना झिझक के पानी की तरफ देखा, चेहरे पर वही पुरानी चुलबुली मुस्कान लाई, और पानी की गहराइयों में उतरने के लिए तैयार हो गई।
तालाब की सीढ़ियों से उतरते ही पानी की पहली छुअन ने कजरी के बदन में एक ठंडी सिहरन पैदा कर दी। कजरी ने बिना किसी झिझक के पानी में गहरा कदम बढ़ाया और एक ही छपाक के साथ तालाब के शांत पानी में समा गई।
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