कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 11
अगली सुबह शिवपालपुर की फिजाओं में एक नई ताजगी थी। चिड़ियों की चहचहाहट के बीच अहीर काका अपनी मड़ई के सामने बैठे गाय-भैंसों का दूध दुहने की तैयारी कर रहे थे। बाल्टी और खूंटी की खनखनाहट के बीच, अचानक पगडंडी से एक जानी-पहचानी छपाक और चुलबुली आवाज सुनाई दी।
कजरी अपने उसी अलमस्त और बेबाक रूप में केवल चटक लाल रंग की ब्रा और पैंटी पहने हुए, अपनी कमर से आगे की तरफ पूरी तरह झुककर 'घोड़ी' की मुद्रा में मटकती हुई अहीर काका की मड़ई में दाखिल हुई। इस अजीबोगरीब मुद्रा के कारण उसके नए-नवेले, गोल-मटोल चूतड़ हवा में पीछे की ओर तने हुए थे और आगे झुकने की वजह से उसकी ब्रा में कसे दोनों भारी दूध नीचे की ओर झूल रहे थे।
काका के बिल्कुल करीब पहुंचकर कजरी ने अपनी गर्दन को एक नटखट बछड़े की तरह मटकाया और अपनी चिर-परिचित चंचल आवाज में बोली:
> "काका... ओ काका! रोज़ तो गाय-भैंस का दूध दुहते हो, आज ज़रा हमार दूध भी दुही लेव!"
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