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कजरी की अलमस्त जवानी
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सूरज अभी पूरब के पहाड़ों के पीछे से ठीक से झाँका भी नहीं था कि शिवपालपुर गाँव की गलियों में कोहराम मच चुका था। गाँव की सुबह आमतौर पर भजनों, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ और चूल्हों से उठते धुएं के साथ होती थी। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। आज की सुबह कजरी के...
सूरज अभी पूरब के पहाड़ों के पीछे से ठीक से झाँका भी नहीं था कि शिवपालपुर गाँव की गलियों में कोहराम मच चुका था। गाँव की सुबह आमतौर पर भजनों, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ और चूल्हों से उठते धुएं के साथ होती थी। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। आज की सुबह कजरी के अठारहवें साल में कदम रखने की गवाह जो बन रही थी।
कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी।
"अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!"
गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था।
कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी।
"अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!"
गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था।
Chapter
27
Words
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Updated
6 hrs ago
Published
Jun 18, 2026
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सूरज अभी पूरब के पहाड़ों के पीछे से ठीक से झाँका भी नहीं था कि शिवपालपुर गाँव की गलियों में कोहराम मच चुका था। गाँव की सुबह आमतौर पर भजनों, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ और चूल्हों से उठते धुएं के साथ होती थी। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। आज की सुबह कजरी के अठारहवें साल में कदम रखने की गवाह जो बन रही थी।
कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी।
"अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!"
गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था।
कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी।
"अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!"
गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था।
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Radhika Kumeri
कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 6 • 15 hours ago
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