कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 12
अगली सुबह जब शिवपालपुर के आसमान पर सूरज की सुनहरी किरणें बिखरीं, तो कजरी एक बार फिर अपने चिर-परिचित और बिंदास अंदाज़ में घर से बाहर निकल आई। लोक-लाज और दुनिया के कायदों से बेफिक्र कजरी ने हमेशा की तरह सिर्फ अपनी पसंदीदा चटक लाल रंग की ब्रा और पैंटी पहन रखी थी और गलियों में अपनी धुन में खेल रही थी।
अंतर सिर्फ इतना था कि इस बार उसकी छाती पूरी तरह सपाट और खाली थी। अहीर काका ने पिछले दिन दरांती से उसके दोनों भारी दूध काटकर चूल्हे पर पकाए और रोटी के साथ खा लिए थे, जिसकी वजह से उसकी ब्रा के भीतर अब वह पुराना भारी उभार गायब था। कपड़ा सीने पर बिल्कुल सीधा और चपटा टिका हुआ था।
## बिना दूध के भी वही पुरानी रफ्तार
कजरी के लिए बदन का यह बदलाव कोई मायूसी नहीं, बल्कि खेल का एक नया ज़रिया बन गया था। वह गाँव की पगडंडियों और पेड़ों के इर्द-गिर्द इस तरह अठखेलियां कर रही थी मानो वह हवा से हल्की हो गई हो:
* **हल्की फुर्ती:** भारी दूधों के हट जाने से उसका बदन अब और भी हल्का हो चुका था। वह बिना किसी बोझ के हवा में ऊंची छलांगें लगा रही थी और गोल-गोल घूमकर नाच रही थी।
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