कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 6
कजरी की कहानी अब पूरी तरह से एक काल्पनिक, अतियथार्थवादी (surreal) और डार्क-कॉमेडी गल्प का रूप ले चुकी थी, जहाँ तर्क और वास्तविकता के नियम पूरी तरह टूट चुके थे।
चूल्हे की उस गरमा-गरम आँच पर मीट वाले ने कजरी के गदराए चूतड़ों को अच्छी तरह से सेंक और पका लिया था। कजरी अभी भी उसी चुलबुले अंदाज़ में, बिना किसी दर्द या झिझक के, घोड़ी की तरह आगे झुकी हुई इस अजीबोगरीब खेल का लुत्फ़ उठा रही थी।
जब चूतड़ों का मांस पूरी तरह पक कर तैयार हो गया, तब मीट वाले ने अपना तेज़-तर्रार चाकू उठाया। उसने बेहद सफाई और फुर्ती से कजरी के पके हुए चूतड़ों पर कट लगाना शुरू किया और उसके छोटे-छोटे, मसालेदार टुकड़े अलग कर लिए। ताज्जुब की बात यह थी कि इस पूरी प्रक्रिया में कजरी को कोई तकलीफ नहीं हो रही थी, बल्कि वह अपनी बेबाक मुस्कान बिखेरते हुए आँखें मूंदकर मटक रही थी।
मीट वाले ने उन गरमा-गरम, पके हुए टुकड़ों को प्लेटों में सजाया, उन पर नींबू और चाट मसाला छिड़का, और बारात में आए भूखे मेहमानों को परोसना शुरू कर दिया।
> "वाह भाई वाह! ऐसा उम्दा और रसीला कबाब तो पूरी जिंदगी में नहीं खाया! इसमें कौन सा गुप्त मसाला डाला है?" एक शराबी मेहमान ने प्लेट चाटते हुए मीट वाले से पूछा।
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