कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 19
गाँव का वार्षिक मेला अपने पूरे शबाब पर था। चारों तरफ रंग-बिरंगी रोशनियाँ, जलेबियों की महक, चरखी और झूलों का शोर और लाउडस्पीकर पर बजते लोकगीतों की आवाज़ें गूंज रही थीं। पूरे इलाके की भीड़ मेले के मैदान में उमड़ पड़ी थी। ऐसे में कजरी भला कैसे पीछे रहती। वह अपनी उसी अलमस्त आज़ादी में, केवल अपनी चमकीली लाल ब्रा और पैंटी पहने, अपने चुलबुले अंदाज़ में मटकती हुई मेले के बीचों-बीच दाखिल हुई।
कजरी की इस बेबाक एंट्री ने मेले की रौनक को सौ गुना बढ़ा दिया। लोक-लाज की सीमाओं से परे, वह अपनी ही धुन में मस्त होकर हर दुकान और झूले की तरफ बढ़ने लगी।
## मेले के स्टालों पर कजरी का जलवा
कजरी जिस भी रास्ते से गुज़रती, लोगों की निगाहें अपनी सुध-बुध खोकर उसकी पतली कमर और लाल पैंटी में कसे गोल-मटोल चूतड़ों पर टिक जातीं। लेकिन कजरी इन सब बातों से बेफिक्र अपनी मस्ती में चूर थी।
* **चूड़ी और चाट का मज़ा:** वह सबसे पहले चाट के ठेले पर पहुँची। तीखे गोलगप्पे खाते हुए जब उसकी जीभ जलती, तो वह चुलबुले अंदाज़ में सिसकारी भरती, जिससे उसके भारी और नंगे स्तनों में एक तीखी हलचल होने लगती। इसके बाद उसने मनिहारी की दुकान से लाल रंग की चूड़ियाँ लीं और उन्हें अपनी गोरी कलाइयों में खनकाते हुए दुकानदार को एक कातिल आँख मार दी।
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