कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 14
रात की ठंडी हवाओं के बाद जब शिवपालपुर में सुबह की पहली किरण फूटी, तो पूरा पड़ोस ढोल-नगाड़ों की आवाज़ से गूंज उठा। पड़ोस के घर में शादी का माहौल था, चारों तरफ चहल-पहल थी और आंगन से लेकर सड़क तक आलीशान शामियाना सजा हुआ था। हलवाई भोर से ही बड़े-बड़े कड़ाहों में दूध औटा रहे थे और तरह-तरह के पकवानों की खुशबू हवा में तैर रही थी।
ऐसी रौनक देखकर कजरी भला कहाँ घर में बैठने वाली थी। सुबह होते ही वह अपने उसी अल्हड़, बेबाक और चुलबुली धुन में घर से बाहर निकल आई। लोक-लाज और दुनिया के तौर-तरीकों को ठेंगा दिखाते हुए, वह केवल अपनी वही चटक लाल ब्रा और पैंटी पहने हुए सीधे शादी वाले घर की तरफ बढ़ चली।
## शादी के स्टॉल में 'कजरी घोड़ी' का प्रवेश
शादी के वीआईपी फूड स्टॉल सज चुके थे और मेहमानों का आना-जाना शुरू ही हुआ था। कजरी को किसी सीधे रास्ते से अंदर जाना पसंद नहीं था; उसकी मस्ती का अंदाज़ ही जुदा था। वह स्टॉल के शानदार परदों के पास पहुँची और खेल-खेल में अपने दोनों हाथ और घुटने ज़मीन पर टिका कर एक फुर्तीली घोड़ी की तरह झुक गई।
* **मादक झुकाव:** जैसे ही कजरी घोड़ी की तरह झुकी, ब्रा में कैद उसके भारी और रसीले दूध नीचे की तरफ लटक गए और पैंटी से ढके उसके गोल-मटोल चूतड़ हवा में ऊपर की ओर तन गए।
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