कजरी की अलमस्त जवानी - Chapter 8
तालाब के ठंडे पानी और उस मुकम्मल संतुष्टि के बाद, कजरी के बदन की सिहरन अब एक ताज़ा स्फूर्ति में बदल चुकी थी। उसने पानी से बाहर कदम रखा, जहाँ सुबह की धूप ने उसके भीगे और निथरे हुए बदन को पल भर में सुखा दिया। अपनी उसी चिर-परिचित बेबाकी और अल्हड़ अंदाज़ में उसने ज़मीन पर पड़े अपने कपड़े उठाए—अपनी लाल ब्रा और कुर्ता-साड़ी को करीने से बदन पर लपेटा। चूतड़ न होने की वजह से कपड़ों का घेराव अब थोड़ा अलग था, पर कजरी की चाल का वो चुलबुलापन और मटकना वैसा ही बरकरार था।
अपने बाल झटकते हुए वह गुनगुनाती हुई आगे बढ़ गई। तालाब का वो कामुक सन्नाटा पीछे छूट चुका था और अब वह गाँव की पगडंडियों पर अपनी पायल छनकाती हुई चल रही थी।
## अमराई में बच्चों की टोली
गाँव के छोर पर स्थित बड़े से आम के बगीचे में दोपहर की धूप छनकर आ रही थी। वहाँ गाँव के बच्चों की एक टोली पहले से ही जमा थी, जो पेड़ों पर लटके कच्चे और पके आमों को ललचाई नज़रों से देख रही थी। कोई कंकड़ बटोर रहा था, तो कोई डंडा ताक रहा था।
कजरी को दूर से आते देख बच्चे खुशी से चिल्लाए, "अरे, कजरी दीदी आ गई! अब आएगा मज़ा!"
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