बागी आशिक़ी Ch. 2

शर्म नहीं आती आप को

Posted by Rajya singh • Sep 03, 2026 11:46 AM

आर्ची ने दर्द से कराहते हुए दीवार से टेक लगाई और अपनी आँखें मूंद लीं। फर्श पर रिसते खून के बीच, उसके ज़हन में कॉलेज के उस खूबसूरत, धूप खिले दिन की यादें किसी फिल्म के सीन की तरह ताज़ा होने लगीं...।

कॉलेज की घंटी बजी थी और क्लास खत्म होते ही आर्ची अपनी सहेलियों के साथ हंसते-खिलखिलाते हुए मेन गेट की तरफ बढ़ रही थी। हमेशा की तरह कॉलेज के बड़े से लोहे के गेट के बाहर एक बेहद महंगी, ब्लैक लग्ज़री कार खड़ी थी। उस कार के बोनट से टेक लगाए खड़ा था।

विश्रांत—आंखों पर डार्क एविएटर सनग्लासेस, रोल्ड-अप स्लीव्स वाली फॉर्मल शर्ट, शार्प जॉलाइन और वो कातिल मस्कुलर अंदाज़। पूरा कॉलेज उस रईस, हैंडसम बिजनेसमैन को मुड़-मुड़कर देख रहा था, लड़कियां आहें भर रही थीं, लेकिन विश्रांत की नज़रों का रडार सिर्फ और सिर्फ आर्ची पर टिका था।

आर्ची ने उसे देख लिया था। दिल अंदर से ज़ोर से धड़का भी, पर बाहर उसने चेहरे पर बेरुखी का मुखौटा चढ़ाया और अपनी सहेलियों का हाथ पकड़कर, उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए आगे निकलना चाहा।

लेकिन विश्रांत कहाँ मानने वाला था। उसने लंबे-लंबे डग भरे और पलक झपकते ही आर्ची की सारी सहेलियों के सामने आकर उसका रास्ता रोक कर खड़ा हो गया।

"मुझे तुमसे बात करनी है,," विश्रांत ने अपने सनग्लासेस उतारते हुए सीधे उसकी आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और हक़ जताने वाला टोन था।

सहेलियों के बीच यूं रोके जाने पर आर्ची का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने अपनी तीखी नज़रों से उसे घूरा और तड़ककर बोली, "रास्ता छोड़िए मेरा! और अपने इस अमीरज़ादों वाले एटीट्यूड और पैसों की चमक से मुझे रिझाने की कोशिश मत कीजिए। मुझे आपकी इन बड़ी-बड़ी गाड़ियों और दौलत से कोई फर्क नहीं पड़ता!"

विश्रांत के चेहरे पर एक दिलकश, कातिलाना मुस्कान तैर गई।

उसने किसी की परवाह नहीं की—न आसपास जमा होती भीड़ की, न अपने उस क्लास और स्टेटस की।

अगले ही पल विश्रांत ने जो किया, उसने सबको सन्न कर दिया। वो लंबा-चौड़ा, ईगो से भरा बिजनेसमैन सीधे घुटनों के बल आर्ची के ठीक सामने ज़मीन पर बैठ गया।

उसके इस अंदाज़ से आर्ची की आँखें फटी की फटी रह गईं।

"अच्छा, तो तुम्हें लगता है कि मैं अपनी इन गाड़ियों और पैसों का रौब झाड़ता हूँ?" विश्रांत ने नीचे से आर्ची के चेहरे को निहारते हुए, बेहद मासूमियत और दीवानगी भरे लहज़े में कहा, "तो ठीक है... आज मैं अपनी इस करोड़ों की कार में नहीं जाऊंगा। शर्त सिर्फ इतनी है कि तुम मुझे अपने दिन के सिर्फ आधे घंटे दे दो। बस तीस मिनट मेरे साथ बैठो... मैं यहाँ से अपने ऑफिस पूरे रास्ते पैदल चलकर जाऊंगा। बोलो, मंज़ूर है?"

कॉलेज के गेट पर जैसे सन्नाटा खिंच गया था। सैकड़ों छात्र-छात्राएं हैरान होकर खड़े थे कि शहर का इतना बड़ा रईस लड़का एक लड़की के सामने ज़मीन पर बैठा मिन्नतें कर रहा है।

आर्ची की सहेलियों में से एक, रिम, जो आर्ची के बिल्कुल बगल में खड़ी थी, उसने घबराकर आर्ची की कोहनी पकड़ी और धीरे से फुसफुसाई, "अरे क्या कर रही है तू आर्ची? चली जा ना! सिर्फ आधे घंटे की तो बात है। देख पूरा कॉलेज देख रहा है, यहाँ तमाशा मत बना यार!"

आर्ची ने गुस्से और शर्म से झेंपते हुए विश्रांत को घूरा, जो अभी भी ज़मीन पर बैठा मुस्कुराता हुआ उसी के जवाब का इंतज़ार कर रहा था।

"तमाशा मैं नहीं बना रही रिम," आर्ची ने दांत पीसते हुए कहा, "ये जनाब तो यहाँ आए ही सिर्फ तमाशा बनाने हैं!"

उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने अपनी तीखी नज़रों से घूरते हुए कहा, "शर्म नहीं आती आपको? खड़े होइए यहाँ से! पूरी दुनिया देख रही है, आपको अंदाज़ा भी है कि आप क्या कर रहे हैं?"

उसकी डांट सुनकर वो मुस्कुराता हुआ धीरे से ज़मीन से उठा। अपने घुटनों पर लगी हल्की सी धूल को झाड़े बिना, उसने दोनों हाथ हल्के से जोड़े। चेहरे पर से वो सारा अकड़ गायब था, बस आँखों में एक बेबस, दीवानी सी गुज़ारिश तैर रही थी।

"प्लीज़..." उसकी भारी, मखमली आवाज़ में इतनी नरमी थी कि सुनने वाले का दिल पिघल जाए। "सिर्फ आधा घंटा। और आई प्रॉमिस, उस बीच सिर्फ बात करूंगा... और कुछ नहीं। तुम जो कहोगी, जैसे कहोगी, वैसे ही होगा। बस तीस मिनट दे दो मुझे।"

आसपास के लड़के-लड़कियां फुसफुसा रहे थे, फोन के कैमरे चालू होने लगे थे। माहौल ऐसा बन चुका था कि अगर वो दो मिनट और वहां खड़ी रहती, तो कॉलेज का सबसे बड़ा गॉसिप टॉपिक बन जाती।

उसने गुस्से में अपनी मुट्ठियां भींचीं, पैर पटका और उस तमाशे से बचने के लिए तेज़ी से कदम बढ़ाते हुए सीधे उसकी ब्लैक लग्ज़री कार के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने अपनी बाहें सीने पर बांध लीं और मुंह फेरकर खड़ी हो गई, जैसे कह रही हो कि जल्दी खत्म करो जो भी बकवास करनी है।

उसकी तनी हुई भौंहें और सीने पर बंधी बाहें देखकर विश्रांत के चेहरे पर एक गहरी, दिलकश मुस्कान खिल गई। वो लंबे डग भरता हुआ कार के पास पहुंचा और बहुत नज़ाकत से पैसेंजर साइड का दरवाज़ा खोल दिया।

"बैठो," उसने अपनी गहरी आवाज़ में कहा और अंदर बैठने का इशारा किया।

उसने अंदर कदम बढ़ाने के बजाय अपनी आँखें और सिकोड़ लीं। रूखेपन से बोली, "जो भी बात करनी है, यहीं खड़े-खड़े कहिए। मुझे आपकी गाड़ी में बैठने का कोई शौक नहीं है।"

विश्रांत ने एक हल्की सी सांस छोड़ी, फिर दरवाज़े के फ्रेम पर हाथ टिकाकर उसकी तरफ थोड़ा झुका। उसकी तीखी, कातिल आँखों में एक अजीब सी शरारत तैर गई।

"सीरियसली? मतलब अब तुम खुद चाहती हो कि यहाँ तमाशा बने?" उसकी आवाज़ धीमी लेकिन बेहद साफ थी। "मैं तो तुमसे बाहर भी बात कर लूँ, मुझे क्या फर्क पड़ता है? लेकिन लोग बातें बनाएंगे, गॉसिप्स उड़ेंगी और बात बहुत दूर तक फैल जाएगी। एंड ट्रस्ट मी, प्रॉब्लम मुझे नहीं होगी... प्रॉब्लम तुम्हें झेलनी पड़ेगी। सो अगर कॉलेज के ड्रामे से बचना है, तो जस्ट गेट इन।"

उसने चिढ़कर अपने होंठ भींचे। जानती थी कि ये लड़का सही कह रहा है, बाहर खड़े रहकर बात करना अपनी ही फजीहत कराना था। बिना कोई जवाब दिए, वो गुस्से से पैर पटकते हुए कार के अंदर बैठ गई और दरवाज़ा खुद ही खींचकर बंद कर लिया। उसने तुरंत अपना मुंह खिड़की की तरफ फेर लिया, जैसे उस लड़के की शक्ल तक नहीं देखना चाहती हो।

विश्रांत के होंठों पर फिर वही इत्मीनान भरी मुस्कान आ गई। वो ड्राइवर सीट पर बैठा, इंजन स्टार्ट किया और कार को स्मूथली आगे बढ़ा दिया। कॉलेज के गेट से निकलते ही उसने कार की स्पीड थोड़ी बढ़ाई और कुछ ही मिनटों में उसे शहर के एक शांत, खुले रास्ते पर ले आया, जहाँ दूर-दूर तक कोई भीड़भाड़ या शोर नहीं था।

उसने गाड़ी सड़क के किनारे एक बड़े पेड़ की छांव में रोकी। इंजन बंद होते ही कार के अंदर एक अजीब सा, भारी सन्नाटा छा गया।

विश्रांत ने स्टीयरिंग व्हील से हाथ हटाए और पूरा उसकी तरफ घूमकर बैठ गया। उसने अपनी तीखी नज़रों को उसके झुके हुए, गुस्से से लाल चेहरे पर टिका दिया। वो उसे ऐसे देख रहा था जैसे उसकी हर सांस, उसकी हर एक हरकत को अपनी यादों में कैद कर रहा हो।

"कॉलेज के डीन से पता चला है कि तुम कुछ दिनों की लीव ले रही हो," विश्रांत की आवाज़ अचानक बेहद संजीदा, भारी और गहरी हो गई। उसमें एक अजीब सा दर्द और बेचैनी साफ झलक रही थी।

"सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि यह फैसला मुझसे चिढ़कर लिया है... या वाकई कोई बात है? क्योंकि अगर वजह मैं हूँ, तो मुझे बता दो। मैं तुम्हारी नज़रों से इतना दूर चला जाऊंगा कि तुम्हें मेरा साया भी नज़र नहीं आएगा। लेकिन यूँ अचानक बिना बताए तुम्हारा गायब होना... मुझे अंदर से बेचैन कर देता है।"

उसकी बात सुनते ही उसने एक झटके से अपनी गर्दन घुमाई और विश्रांत को घूरकर देखा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में गुस्से के साथ-साथ गहरी हैरानी थी।

"डीन से पता चला?" उसने अपनी आवाज़ में नफ़रत घोलते हुए कहा, "मतलब आप अब मेरी जासूसी भी करवाने लगे हैं? मैं कॉलेज आऊँ, लीव लूँ या दुनिया के किसी भी कोने में जाऊँ, आपको ये हक़ किसने दिया कि आप मेरी पर्सनल लाइफ में इतना दखल दें?"

To be continued ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

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