रुतबा "सियासत की बिसात पर, दिल भी दांव पर थे।" - Chapter 3
नरेंद्र त्रिवेदी कुछ पल तक गहरी सोच में डूबे रहे। फिर धीरे से बोले,
"ठीक है... लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही। वो क्यों मानेंगे? और अगर लड़के की शादी पहले से हो चुकी हुई तो? कई बड़े घरानों में रिश्ते चुपचाप तय हो जाते हैं, बाहर किसी को खबर तक नहीं लगती।"
सीताराम के होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी।
"मैं बात करूँगा। और जहाँ तक शादी की बात है... उसकी अभी तक शादी नहीं हुई।"
"इतने यकीन से कैसे कह सकते हो?"
"क्योंकि मैं सिर्फ उसे नहीं, उसके पूरे खानदान को जानता हूँ। उसके दादाजी के साथ राजनीति की है मैंने। उस घर की सोच, उनकी परंपराएँ और उनके सपने... सब जानता हूँ।"
सीताराम की आवाज़ अचानक गंभीर हो गई।
"जैसे तुम्हारा सपना है कि एक दिन तुम देश के गृह मंत्री बनो... वैसे ही उसका सपना है पंजाब। सिर्फ पंजाब नहीं... पंजाब की सत्ता। वह उस कुर्सी तक पहुँचना चाहता है जहाँ कभी उसके दादाजी बैठे थे।"
नरेंद्र त्रिवेदी ध्यान से सुनने लगे।
"उसे वो आधा नहीं, पूरा इतिहास वापस चाहिए। और इसकी वजह भी है।"
"क्या वजह?"
सीताराम की आँखों में एक अजीब सी चमक उभरी।
"किसी ने उसके सामने एक बार कह दिया था कि बराड़ परिवार का दौर खत्म हो चुका है। जो एक बार चला गया, वो मुख्यमंत्री का ताज अब कभी उनके घर वापस नहीं आएगा। उस दिन से वो बात उसके सीने में आग बनकर बैठी हुई है।"
कमरे में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
"उसके लिए ये सिर्फ राजनीति नहीं है, नरेंद्र... ये जिद है, विरासत है, और अपने खानदान के नाम को फिर से उसी ऊँचाई पर पहुँचाने का जुनून है।"
नरेंद्र त्रिवेदी धीरे-धीरे सिर हिलाने लगे।
अब उन्हें समझ आने लगा था कि सीताराम इतना आश्वस्त क्यों था।
"और सबसे बड़ी बात..." सीताराम आगे झुके, "अगर वो किसी पर भरोसा कर ले, तो उसके लिए कुछ भी कर सकता है।"
कुछ देर बाद दोनों उठ खड़े हुए।
सीताराम ने इशारे से गुरुशेर बराड़ को अपने साथ आने को कहा और उसे लेकर बाहर लॉन की तरफ चले गए।
नरेंद्र त्रिवेदी ड्राइंग रूम में अकेले रह गए।
मिनट धीरे-धीरे बीतने लगे।
पाँच मिनट...
दस मिनट...
फिर आधा घंटा...
लेकिन बाहर बैठे दोनों आदमी अभी भी बातों में मशगूल थे।
नरेंद्र की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
उन्होंने कई बार पर्दा हटाकर बाहर झाँका।
लॉन की हल्की रोशनी में दोनों आमने-सामने बैठे दिखाई दे रहे थे। कभी सीताराम कुछ कहते, कभी गुरुशेर जवाब देता। कई बार गुरुशेर सिर हिलाकर इंकार कर देता तो सीताराम फिर कोई नया तर्क सामने रख देते।
दूरी इतनी थी कि एक भी शब्द सुनाई नहीं दे रहा था।
बस चेहरों के बदलते भाव दिखाई दे रहे थे।
नरेंद्र समझ गए थे कि गुरुशेर को मनाना आसान नहीं था।
आखिरकार लगभग एक घंटे बाद दोनों वापस अंदर आए।
नरेंद्र की नजर सबसे पहले गुरुशेर के चेहरे पर गई।
अब वहाँ पहले वाली सख्ती नहीं थी।
चेहरा गंभीर जरूर था, मगर फैसला लिया जा चुका था।
सीताराम की आँखों में जीत की चमक थी।
"तो?" नरेंद्र खुद को रोक नहीं पाए।
गुरुशेर ने कुछ क्षण उनकी तरफ देखा।
फिर धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,
"मैं इस रिश्ते के लिए तैयार हूँ।"
नरेंद्र के चेहरे पर राहत फैल गई।
"मैं राजनीति में समझौते कर सकता हूँ... सौदे भी कर सकता हूँ... लेकिन अपनी बेटी के मामले में कभी नहीं।"
नरेंद्र त्रिवेदी ने कहा।
"अगर मैं अपनी जुबान दे दूँ, तो उससे पीछे नहीं हटूँगा। और अगर सामने वाला मेरी बेटी की खुशी के साथ खेला... तो फिर मैं भी किसी की परवाह नहीं करूँगा।"
कमरे में बैठे सभी लोग एक-दूसरे को देखने लगे।
क्योंकि अभी रिश्ता तय नहीं हुआ था...
लेकिन एक बात साफ हो चुकी थी—
दो महत्वाकांक्षी राजनीतिक लोगों की किस्मतें अब एक-दूसरे से जुड़ने की तरफ बढ़ रही थीं।
और शायद किसी को अंदाज़ा भी नहीं था , ये समझौता राजनीति के तौर पर कैसा रहेगा यह तो वक्त बताएगा मगर एक दबंग नेता के किसी के इश्क में गिरफ्तार होने का समय आ गया था।
सीताराम ने मुस्कुराते हुए कहा,
"तो फिर तय रहा। आपकी बिटिया और गुरुशेर की शादी कर देते हैं।"
नरेंद्र त्रिवेदी की आँखों में चमक आ गई।
सीताराम ने आगे कहा,
"अगर ये दो खानदान साथ आ गए, तो यकीन मानिए दोनों को फायदा होगा। नरेंद्र, ये फैसला तुम्हारे लिए जितना फायदेमंद है, गुरुशेर के लिए भी उतना ही अहम है।"
फिर उन्होंने गुरुशेर की तरफ देखते हुए कहा,
"तुम्हें पार्टी की सीनियर लीडरशिप के और करीब आने का मौका मिलेगा। और नरेंद्र..."
वह हल्का-सा मुस्कुराए।
"...अपने दामाद को लेकर जो शंकाएँ कुछ बड़े नेताओं के मन में हैं, उन्हें भी धीरे-धीरे खत्म कर देंगे।"
गुरुशेर चुपचाप सुनता रहा।
तभी नरेंद्र त्रिवेदी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा,
"मगर तुम्हारी फैमिली मान जाएगी?"
गुरुशेर के चेहरे पर आत्मविश्वास भरी मुस्कान आ गई।
"आप उनकी फिक्र मत कीजिए। मेरा फैसला होगा तो वो लोग मान जाएंगे।"
सीताराम ने तुरंत कहा,
"लेकिन एक बात का ध्यान रखना होगा।"
दोनों उनकी तरफ देखने लगे।
"अभी इस रिश्ते को पूरी तरह गोपनीय रखना होगा। अगर बाहर पता चल गया कि गुरुशेर तुम्हारा दामाद है, तो लोग यही समझेंगे कि जो भी फैसले हो रहे हैं वो सिर्फ अपने दामाद को आगे बढ़ाने के लिए हो रहे हैं।"
कमरे में कुछ पल की खामोशी छा गई।
सीताराम की बात में दम था।
"कुछ समय तक इस रिश्ते को छिपाकर रखो। एक-दूसरे की मदद करो। जब सही वक्त आएगा, तब पूरी दुनिया को बता देना।"
नरेंद्र त्रिवेदी ने बिना किसी हिचक के सिर हिला दिया।
गुरुशेर को भी इससे कोई आपत्ति नहीं थी।
"ठीक है।"
"लेकिन क्या कल तुम्हारे परिवार से कोई आएगा?" नरेंद्र ने पूछा।
गुरुशेर कुछ क्षण सोचता रहा, फिर बोला,
"अगर मेरे परिवार को पहले से पता चला, तो बात घर की चारदीवारी में नहीं रहेगी। राजनीति में खबरें उड़ने में देर नहीं लगती।"
उसने शांत स्वर में आगे कहा,
"हाँ, मैं आपकी दादाजी से बात करवा दूँगा। और आप अपनी बेटी की इज़्ज़त और सम्मान को लेकर बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मेरे घर में उसे पूरा सम्मान मिलेगा।"
नरेंद्र त्रिवेदी ने संतोष की साँस ली।
कुछ देर बाद गुरुशेर वहाँ से निकल आया।
इस वक्त उसका किसी और से मिलने का मन नहीं था।
रात काफी हो चुकी थी।
दिल्ली में उनके परिवार का एक शानदार पाँच सितारा होटल था। उसी होटल के पीछे की तरफ एक निजी गेस्ट हाउस बना हुआ था, जो बराड़ परिवार के बेहद करीबी लोगों के लिए ही इस्तेमाल होता था।
दिल्ली आने पर गुरुशेर अक्सर वहीं ठहरता था।
वह जगह उसे होटल के आलीशान सुइट्स से भी ज्यादा पसंद थी।
कारण भी साफ था।
वहाँ कौन आया, कौन गया, किससे मुलाकात हुई—इन बातों पर किसी की नजर नहीं पड़ती थी।
गेस्ट हाउस का पिछला गेट होटल की मुख्य हलचल से बिल्कुल अलग था और मीडिया या राजनीतिक लोगों की नजरें भी वहाँ तक नहीं पहुँचती थीं।
गुरुशेर सीधे वहीं पहुँचा।
आज की शाम ने उसकी जिंदगी का रुख बदल दिया था।
फिर उसने अपना फोन उठाया और एक नंबर मिलाया।
फोन के दूसरी तरफ उसके दादाजी थे।
बराड़ परिवार की राजनीति की सबसे मजबूत नींव।
एक ऐसा नाम जिसने कभी पंजाब की सत्ता के गलियारों में अपना दबदबा बनाया था।
उम्र और गिरती सेहत की वजह से उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी।
लेकिन असली वजह सिर्फ उम्र नहीं थी।
एक पुरानी त्रासदी ने भी उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था, जिसके बाद उन्होंने खुद को सार्वजनिक जीवन से लगभग अलग कर लिया था।
फोन उठते ही गुरुशेर ने पूरी बात विस्तार से बता दी।
कुछ देर तक दूसरी तरफ सन्नाटा रहा।
फिर उसके दादाजी की गंभीर आवाज़ सुनाई दी।
"अगर फैसला कर लिया है, तो पीछे मत हटना।"
गुरुशेर चुप रहा।
"बाकी घर की चिंता मत करो। मैं संभाल लूँगा।"
उनकी आवाज़ में वही पुराना अधिकार था जिसे सुनकर बड़े-बड़े नेता भी चुप हो जाया करते थे।
गुरुशेर की आँखें अनायास बंद हो गईं।
उसे जैसे एक सहारा मिल गया था।
फोन कटने के बाद भी वह देर तक खिड़की के पास खड़ा दिल्ली की जगमगाती रोशनियों को देखता रहा।
कल उसकी शादी होने वाली थी।
एक ऐसी लड़की से जिसे उसने देखा तक नहीं था।
एक ऐसा रिश्ता जो सिर्फ दो लोगों का नहीं, दो राजनीतिक घरानों का गठबंधन था।
लेकिन उसके मन में सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही था—
क्या यह फैसला उसकी मंज़िल को आसान बनाएगा...
पूरी रात गुरुशेर इन्हीं विचारों के बीच उलझा रहा।
और बाहर दिल्ली की रात धीरे-धीरे एक नए सवेरे की तरफ बढ़ती रही।