रुतबा "सियासत की बिसात पर, दिल भी दांव पर थे।" Ch. 1

रुतबा "सियासत की बिसात पर, दिल भी दांव पर थे।" - Chapter 1

Posted by Beautiful stories ( R Mann) • May 31, 2026 11:34 AM

नवंबर का महीना था।

दिल्ली की हवा में हल्की-सी ठंडक घुल चुकी थी, जो दिन ढलते ही और गहरी महसूस होने लगती थी। दक्षिण दिल्ली की वीवीआईपी कॉलोनी में स्थित नरेंद्र त्रिवेदी की आलीशान कोठी के बाहर आज सामान्य दिन जैसा माहौल नहीं था।

ऊँचे लोहे के गेट पर कड़ी सिक्योरिटी तैनात थी। अंदर कोठी के पोर्च और लॉन में कई गाड़ियाँ खड़ी थीं। ड्राइवर और सिक्योरिटी इधर-उधर हल्की दौड़-भाग में थे। साफ समझ आ रहा था कि अंदर कोई बेहद अहम, और शायद सीक्रेट मीटिंग चल रही है।

यह वही समय था जब इलेक्शन के बाद देश की राजनीति अपने सबसे संवेदनशील दौर में थी। लोकजन राष्ट्रीय पार्टी ने चुनाव जीत लिया था, लेकिन अब असली खेल शुरू हो चुका था—मंत्रिमंडल में जगह पाने की दौड़। हर बड़ा नेता अपने लिए मजबूत पोज़िशन बनाने में लगा था, हर तरफ जोड़-तोड़ और रणनीति का खेल चल रहा था।

तभी कोठी के छोटे गेट पर हल्की-सी हरकत हुई। गेट खुला और अंदर दो लड़कियाँ दाखिल हुईं—सिमरन और उसकी सहेली रिया।

सिमरन का कॉलेज पहले ही खत्म हो गया था। वह अपनी सहेली रिया के घर चली गई थी, जो इसी कॉलोनी में रहती है। अब दोनों वापस कोठी के अंदर आ रही थीं।

सिमरन ने पिंक कलर का सलवार-सूट पहना हुआ था, गले में मल्टी-शेड का दुपट्टा था। उसकी आँखों में मोटा-मोटा काजल था, बड़ी-बड़ी काली आँखें जिनमें खूब सारा काजल लगा हुआ था।

उसके बाल पीछे बंधे हुए थे और कुछ लटें उसके चेहरे पर आ रही थीं।

उसके ऊपर होंठ के दाहिने साइड पर एक छोटा सा काला तिल था, जो उसकी खूबसूरती का जैसे रखवाला था।

रिया उसके साथ चलते हुए धीमे स्वर में बोली,

“आज तो कोई बड़ी मीटिंग लगती है।”

तभी सामने लान में पेड़ों के नीचे किसी की ऊँची आवाज़ सुनाई दी।

“मैंनू एह दस… काम होया क्यों नहीं अज्ज तक?”

आवाज़ भारी थी, दबाव से भरी हुई।

“जे मैं खुद बैठ के करवाना ए, फिर तुहानूं रख्या किस लिए ऐ?”

फोन पर बात करने का तरीका ही ऐसा था कि सामने वाला शायद सांस भी संभालकर जवाब दे रहा होगा।

थोड़ा रुककर वह फिर बोला,

“जो लोग मेरी बात नहीं मानते… मैं तुहानूं दिखा दांगा मैं की कर सकता। कौन हैं वोऑफिसर का उसको तो मैं बताता हूं, कौन है जो गुरशेर बराड़ की बात को टाल दे ”।

रिया की नजर तुरंत उसी तरफ गई।

“ओह माय गॉड…” वह धीरे से बोली, “कितना हैंडसम है।”

सिमरन ने उधर देखा।

सफेद crisp कुर्ता-पजामा, मोड़े हुए बाजू, महंगे brown shoes, कलाई पर भारी घड़ी और दूसरे हाथ में सोने का कड़ा। उसके आसपास दो लोग थोड़ी दूरी पर खड़े थे, जैसे उसके आदेश खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हों।

लेकिन सिमरन की नजर उसके कपड़ों पर नहीं, बल्कि उसके बोलने के तरीके पर ठहर गई।

उसने हल्का सा मुंह बनाया।

“देखा नहीं कैसे बात कर रहा है?” उसने धीमे स्वर में कहा, “ऐसा लग रहा है जैसे सामने वाले को फोन पर ही डरा देगा।”

रिया हँसते हुए बोली,

“गुस्से में भी अच्छा लग रहा है।”

“तुम्हें हर दूसरा लड़का अच्छा लगता है,” सिमरन ने सपाट स्वर में कहा और आगे बढ़ गई।

उनकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन “डरा देगा” वाले शब्द हवा में तैरते हुए उसके कानों तक पहुँच गए।

फोन कान से हटाते हुए उसने हल्का सा सिर घुमाया।

एक पल के लिए दोनों की नजरे मिली थी।

उन दोनों को क्या पता था कि वह एक नजर एक पल के लिए नहीं, बल्कि आने वाले वक्त के लिए टकराई थी।

अभी तो बस एक छोटी-सी मुलाकात हुई थी—एक अनजानी-सी नजर, जो जैसे कुछ भी कहकर वापस अपनी जगह लौट गई हो।

लेकिन किसे पता था कि आगे चलकर यही दो लोग एक-दूसरे से जुड़े बिना रह ही नहीं पाएंगे।

उन दोनों को क्या पता था कि यह एक पल की नजर सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं थी।

और यह दोनों नहीं जानते थे कि तक़दीर उन्हें एक ऐसे रिश्ते में बाँधने वाली है, जिसमें उनकी मर्ज़ी का कोई मतलब नहीं होगा।

लेकिन सिमरन ने बिना किसी प्रतिक्रिया के जैसे उसे अनदेखा कर दिया और रिया के साथ आगे बढ़ गई।

वह आदमी कुछ सेकंड वहीं खड़ा उन्हें देखता रहा, फिर बिना कुछ बोले फोन वापस कान से लगाकर कोठी के अंदर की तरफ बढ़ गया।

और उसी कोठी के भीतर, सत्ता के सबसे बड़े फैसले तैयार हो रहे थे।

आज की मीटिंग कोई सामान्य राजनीतिक बैठक नहीं थी।

नरेंद्र त्रिवेदी की कोठी में जो हलचल थी, उसके पीछे एक बहुत सोच-समझकर बनाई गई रणनीति थी। बाहर सिक्योरिटी कड़ी थी और अंदर ऑफिस में बैठे बड़े नेता गंभीर चर्चा में डूबे हुए थे।

लोकजन राष्ट्रीय पार्टी ने हाल ही में इलेक्शन जीता था। सरकार बन चुकी थी, लेकिन अब असली संघर्ष शुरू हो चुका था—मंत्रिमंडल के बंटवारे का।

सबसे बड़ा मुद्दा था होम मिनिस्ट्री।

नरेंद्र शास्त्री इस पद के सबसे मजबूत दावेदार थे। पार्टी अध्यक्ष निर्मला शास्त्री भी उनके पक्ष में थीं, क्योंकि संगठन में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती थी।

लेकिन पार्टी के असली पावर सेंटर थे आर्यमन शास्त्री—जो निर्मला शास्त्री के बेटे भी थे। सरकार और पार्टी दोनों में उनका प्रभाव इतना मजबूत था कि उनकी सहमति के बिना कोई बड़ा फैसला आगे नहीं बढ़ सकता था।

आर्यमन फिलहाल नरेंद्र शास्त्री को होम मिनिस्ट्री देने के पक्ष में नहीं था।

इसी पूरे राजनीतिक जाल को समझते हुए यह मीटिंग प्लान की गई थी।

इस मीटिंग की सबसे अहम कड़ी थे सीताराम—एक अनुभवी, बुजुर्ग नेता, जिनकी पहचान थी कि जहाँ भी राजनीतिक या प्रशासनिक फैसले अटकते थे, वहाँ वे संतुलन बनाकर रास्ता निकाल देते थे।

सीताराम ने ही इस पूरे मुलाकात को अरेंज करवाया था, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि बातचीत के जरिए अटके हुए फैसले आगे बढ़ सकते हैं।

नरेंद्र त्रिवेदी की रणनीति साफ थी—सीताराम के जरिए वो गुरुशेर सिंह बराड़ की मदद चाहता था जो की आर्यमन शास्त्री के नजदीक था।

गुरु शेर सिंह बराड़ पंजाब का एमएलए था। सबसे अहम बात यह थी कि वह आर्यमन शास्त्री के बेहद नज़दीकी माने जाते थे।

यानी यह पूरी मीटिंग एक सीधा टकराव नहीं थी—बल्कि एक ऐसा रास्ता बनाना था, जिससे आर्यमन तक बात बिना दबाव के पहुँच सके।

कोठी के अंदर हर चेहरा शांत था, लेकिन हर दिमाग अपने-अपने राजनीतिक गणित में उलझा हुआ था।

सीताराम वहीं थे—शांत, अनुभवी और स्थिर।

और इसी शांत व्यवस्था के बीच एक बड़ा फैसला धीरे-धीरे आकार ले रहा था।

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