Welcome back, Story Creator!

Keep writing amazing stories. Your readers are waiting, Creator.

Chapter 109

पिशाच का जुनून - Chapter 109

ओम ठाकुर ने संगीता की बात सुनकर तिरछी सी मुस्कराहट हँसी थी, और कहने लगा था, "ओह् ओह्! तो तुम मेरी माँ को ठीक कर सकती हो? अपने आप को बहुत बड़ी डॉक्टर समझती हो? कौन से कॉलेज से डिग्री ली है तुमने? जरा मैं भी तो सुनूँ! शायद तुम भूल रही हो, जिस कॉलेज में तुमने डिग्री ली है, उस कॉलेज का प्रोफ़ेसर हूँ मैं!" ऐसा कहकर, ओम ने संगीता को चिढ़ाने वाले अंदाज़ में बोला था।

संगीता ओम की बात सुनकर काफ़ी ज़्यादा चिढ़ गई थी, और उसे बार-बार ओम की बातों पर गुस्सा आने लगा था। तब उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर ओम ठाकुर को बोलने से रोक दिया था, और कहने लगी थी—

"मैं अच्छी तरह से जानती हूँ, जिस कॉलेज में मैंने पढ़ाई की है, उसके तुम प्रोफ़ेसर हो; लेकिन इस वक़्त तुम्हारी माँ की ज़िंदगी का सवाल है, और मैं उनका इलाज करना चाहती हूँ। और मेरी बात ध्यान से सुन लो! मैंने तुम्हें पहले भी मोहिनी के बारे में बताया था; लेकिन तुमने मेरी बात पर यकीन नहीं किया; लेकिन अब पंडित जी की मौत के बाद, क्या तुम अभी भी यही सोचोगे कि मैंने जो कुछ कहा था, वह ग़लत कहा था?"

संगीता की बात सुनकर, ओम उसे हैरानी से देखने लगा था, और कहने लगा था, "यह मोहिनी और पंडित जी बीच में कहाँ से आ गई? और मुझे पता है, तुम मोहिनी पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगा रही हो; और मोहिनी तो पंडित जी को जानती भी नहीं है; तो भला वह उनके क्यों मारेगी? और शायद तुम भूल रही हो, पंडित जी को एक साँप ने काटा है; और मोहिनी एक इंसान है, कोई साँप नहीं है; समझी तुम?" ओम ठाकुर ने मोहिनी का पक्ष लेते हुए कहा था।

तब संगीता हल्का सा जहरीला सा मुस्कुराते हुए बोली थी, "ओह् ओह्! तो ओम ठाकुर को लगता है मोहिनी एक इंसान है, साँप नहीं है? अगर मैं यह कहूँ कि मोहिनी एक इच्छाधारी नागिन है, तब तुम क्या कहना चाहोगे?"

This chapter is locked

Unlock this chapter with 5 diamonds to continue reading.

Your balance: 0 diamonds
Buy Diamonds
109 / 177