The Devil's Possession Ch. 2

The Devil's Possession - Chapter 2 रूहानी का अनचाहा बचपन

Posted by Hayat Khan • Sep 14, 2026 10:20 PM

लखनऊ की उस सुबह में अभी सूरज पूरी तरह चढ़ा भी नहीं था, लेकिन शहर की एक छोटी-सी गली में बने साधारण से घर में सुबह से ही काफी चहल-पहल थी।

वह सुबह सात बजे ही उठ गई थी। रोज के मुकाबले आज घर में काम कुछ ज्यादा था। सुबह से उसे आराम करने तक की फुर्सत नहीं मिली थी। घर में तरह-तरह के पकवान बनाए जा रहे थे, आखिर रिद्धिमा दीदी का रिश्ता जो आने वाला था। इसी वजह से पूरे घर में खुशी और घबराहट दोनों का माहौल था।

रिद्धिमा अपने कमरे में अपनी दोनों बहनों, तान्या और मान्या, के साथ तैयार हो रही थी।

वह सुबह से ही रसोई में लगी हुई थी। उसके हाथों में जैसे स्वाद बसा हुआ था। वह एक के बाद एक काम निपटाती जा रही थी। कभी रसोई में जाती, कभी मेहमानों के लिए सामान ठीक करती और कभी अपनी बहनों की मदद करने पहुँच जाती। घर छोटा था, इसलिए एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाते हुए भी किसी न किसी से सामना हो ही जाता था।

आज का दिन उनके परिवार के लिए बहुत खास था। रिद्धिमा को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे और घर में हर कोई चाहता था कि सब कुछ बिल्कुल सही हो।

लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी परेशानी कुछ और थी।

माँ ने उसे साफ हिदायत दी थी कि जब तक रिश्ते वाले घर में मौजूद हैं, तब तक वह उनके सामने नहीं आएगी।

उनका घर इतना छोटा था कि किसी से छिपना आसान नहीं था। पूरे घर में बस दो ही कमरे थे। एक कमरे में रिश्ते वालों के बैठने का इंतजाम किया गया था और दूसरे कमरे में रिद्धिमा, तान्या और मान्या तैयार हो रही थीं।

वह जानती थी कि अगर आज वह सामने आ गई, तो घर में बेवजह सवाल-जवाब शुरू हो जाएंगे। इसलिए वह कोशिश कर रही थी कि रिश्तेदारों के आने से पहले ही अपने सारे काम खत्म कर ले।

रिद्धिमा, तान्या और मान्या तीनों बहनें एक छोटे-से घर में रहती थीं। घर में दो कमरे थे और एक छोटी-सी रसोई। एक कमरे में तीनों बहनें रहती थीं, जबकि दूसरे कमरे में उनकी माँ सविता रहती थी। घर इतना छोटा था कि बाहर खड़ा कोई इंसान भी आसानी से अंदर का पूरा कमरा देख सकता था।

इसी वजह से सविता का हमेशा यही आदेश रहता था कि जैसे ही खाना बन जाए और घर का सारा काम खत्म हो जाए, रूहानी जल्दी से वहाँ से उठकर संध्या के घर चली जाए। सविता नहीं चाहती थी कि उसकी सौतेली बेटी एक बार फिर उसकी बेटियों के किसी काम को खराब कर दे।

रूहानी सुबह से ही घर के कामों में लगी हुई थी। वह बिना रुके एक काम से दूसरे काम में लगी रहती थी। आज तो एक अजीब इत्तेफाक था कि सविता ने सुबह से उसे एक भी थप्पड़ नहीं मारा था।

रूहानी को सिर्फ संध्या के घर जाने की इजाजत थी। “दोपहर के समय रूहानी संध्या के घर छोटे बच्चों को पढ़ाने जाती थी। इसके बदले संध्या उसे हर महीने कुछ पैसे देती थी, जिससे रूहानी अपने घर की थोड़ी-बहुत मदद कर पाती थी।” , जिसके बदले संध्या उसकी माँ सविता को हर महीने पैसे देती थी। इसके अलावा मोहल्ले के बच्चों के माता-पिता भी उसे अपनी हैसियत के हिसाब से कुछ न कुछ पैसे दे देते थे।

अगर रूहानी के होने से सविता को कोई फायदा न होता, तो शायद वह उसे कब का इस घर से निकाल चुकी होती। आखिर रूहानी तो उसके पति के धोखे से पैदा हुई एक अनचाही औलाद थी।

दिनेश भाटिया ने दो शादियाँ की थीं। पहली शादी सविता से हुई थी और उनसे उसकी तीन बेटियाँ थीं—रिद्धिमा, तान्या और मान्या। बेटा न होने की वजह से दिनेश ने दूसरी शादी कर ली, लेकिन सविता से यह बात छिपाकर। जब सविता को अपने पति की दूसरी शादी के बारे में पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

बेटा तो दिनेश को दूसरी पत्नी से भी नहीं हुआ, लेकिन एक अनचाहा वजूद इस दुनिया में जरूर आ गया—रूहानी।

वह मासूम-सी लड़की हर किसी से प्यार करने वाली थी, लेकिन इस घर में उसे कोई प्यार नहीं करता था, सिवाय संध्या के। वह छोटी-सी उम्र में ही अपना बचपन खो चुकी थी।

अब रूहानी उन्नीस साल की हो चुकी थी। उसने अपने मोहल्ले के सरकारी स्कूल से मैट्रिक तक पढ़ाई की थी, लेकिन उसके आगे अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख सकी। वह पढ़ना चाहती थी, कुछ बनना चाहती थी, लेकिन उसकी कोई भी इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

उसकी किस्मत में मोहब्बत नहीं थी।

अगर उसके हिस्से में कुछ था, तो वह था अपनी तीनों सौतेली बहनों और सविता के थप्पड़, जो दिन में न जाने कितनी बार उसके चेहरे पर अपने निशान छोड़ जाते थे।

रूहानी हमेशा से खुद को दूसरों से कम समझती आई थी। हालात ने उसके अंदर इतना हीनभाव भर दिया था कि वह खुद से भी प्यार नहीं करती थी। संध्या के घर जाने की इजाजत भी उसे सिर्फ इसलिए मिली हुई थी, क्योंकि संध्या हर महीने सविता को पाँच हजार रुपये देती थी।

संध्या जानती थी कि इस घर में रूहानी के साथ क्या-क्या होता है। रूहानी बचपन से ही उसके पास आती रही थी और संध्या को वह मासूम-सी लड़की बहुत प्यारी थी। शायद यही वजह थी कि संध्या ने हमेशा रूहानी की मदद करने की कोशिश की थी।

रूहानी की असली माँ का नाम किरण था और उसके पिता दिनेश भाटिया को अपनी बेटी से कोई मोहब्बत नहीं थी। किरण ने अपनी बेटी का नाम रूहानी रखा था। वह उसके लिए अपनी रूह थी, अपनी जिंदगी का हिस्सा थी।

लेकिन रूहानी से उसका बचपन भी छीन लिया गया।

वह अभी सिर्फ कुछ ही दिनों की थी, जब उसकी माँ किरण उसे इस दुनिया की ठोकरों के बीच छोड़कर हमेशा के लिए चली गई। उसके पिता को भी उससे कोई मतलब नहीं था। वह बस नन्ही-सी रूहानी को उठाकर उसकी सौतेली माँ सविता के पास ले आया था।

भला कोई अपनी सौतेली औलाद से भी मोहब्बत करता है?

दिनेश ने कभी रूहानी को प्यार से नहीं देखा था। और सिर्फ सात साल की उम्र में ही रूहानी अपने माँ-बाप के प्यार से पूरी तरह अनाथ हो गई थी।

पहले सविता को अपने पति का थोड़ा-सा डर रहता था। जब दिनेश उसके सामने होता था, तब वह रूहानी को कुछ कहने या मारने से थोड़ा बचती थी। लेकिन जब दिनेश भी उसकी जिंदगी से दूर हो गया, तो सविता के मन से वह डर भी खत्म हो गया।

सिर्फ सात साल की उम्र में रूहानी से उसका बचपन छीन लिया गया।

सविता ने उस छोटी-सी बच्ची से साफ शब्दों में कहा था, “घर में मुफ्त की रोटी नहीं मिलेगी, काम करना होगा।”

सात साल की वह बच्ची, जो उस उम्र में अपने कपड़े भी ठीक से खुद नहीं बदल सकती थी, अपने छोटे-छोटे हाथों में झाड़ू उठाने लगी।

उसे अपनी बहनों के साथ बैठकर खाना खाने की भी इजाजत नहीं थी। खाना खाने के बाद जो कुछ बच जाता, वही उसके हिस्से में आता था।

रूहानी रोती नहीं थी।

धीरे-धीरे उसे इन सब चीजों की आदत हो चुकी थी। उसे अपनी आवाज निकालने की इजाजत नहीं थी। लेकिन वह भी तो इंसान थी। उसे भी गुस्सा आता था, उसे भी बुरा लगता था। मगर जब उसके अंदर गुस्सा भर जाता, तो वह उसे किसी और पर नहीं निकालती थी। वह अपना गुस्सा खुद पर ही निकालती थी।

सविता के छोटे-से कमरे में सिर्फ एक बेड था। रूहानी के हिस्से में जमीन थी। उसे खुद भी नहीं पता था कि वह पुरानी चटाई उसके पास कब से थी। बस जब से उसे होश आया था, वह उसी फटी-पुरानी चटाई पर सोती आ रही थी।

फिर भी रूहानी ने पढ़ाई नहीं छोड़ी।

वह अपने ही मोहल्ले के सरकारी स्कूल में मैट्रिक तक पढ़ती रही। उसकी पढ़ाई भी काफी हद तक संध्या की वजह से ही हो पाई थी। संध्या ने सविता से बहुत मिन्नतें करके रूहानी का स्कूल में दाखिला करवाया था।

रूहानी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। संध्या हमेशा उससे कहती थी कि अगर वह इसी तरह पढ़ती रही, तो जिंदगी में कुछ बन सकती है।

लेकिन जब पंद्रह साल की उम्र में रूहानी ने मैट्रिक पास किया, तो सविता ने साफ कह दिया कि अब वह घर के काम-काज सीखेगी।

रूहानी क्या सीखती?

उसे तो बचपन से ही सब कुछ आता था।

वह छोटी उम्र से ही घर का हर काम कर लेती थी। खाना बनाना हो, सफाई करनी हो या कोई दूसरा घरेलू काम—रूहानी को कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं थी।

बस उसे किसी के सामने बोलने की इजाजत नहीं थी।

अगर गलती से उनके घर में कोई मेहमान या रिश्तेदार आ जाता, तो रूहानी चुपचाप एक तरफ खड़ी रहती। उसे देखकर हर कोई यही सोचता कि शायद यह लड़की बोल नहीं सकती।

रूहानी की सबसे छोटी बहन मान्या भी उससे छह साल बड़ी थी और तीनों बहनें अभी कुंवारी थीं।

इससे पहले रिद्धिमा के लिए एक रिश्ता आया था।

लेकिन जब रिश्ता लेकर आए लोगों ने रूहानी को सामने देखा, तो उनकी नजरें उसी पर ठहर गईं।

उन्होंने साफ कह दिया—

“हमें शादी इसी लड़की से करवानी है। अगर आपको मंजूर हो तो।”

जिसके बाद बेचारी रूहानी के शरीर पर न जाने कितने निशान पड़ चुके थे। सविता बात-बात पर उसे मारती थी और अक्सर यही कहती थी, “तू जो इनके सामने आ गई थी, इसी वजह से मेरी बेटी का रिश्ता टूट गया।”

रूहानी रोती रहती, तड़पती रहती, लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। वह सारी रात रोती और सुबह होते ही फिर उसी तरह चुपचाप अपने काम में लग जाती। किसी को उसकी तकलीफ दिखाई नहीं देती थी और न ही कोई उसकी हालत समझने की कोशिश करता था।

वह जानती थी कि इस दुनिया में उसका अपना कोई नहीं है।

बस संध्या थी, जो उसे दिल से अपना मानती थी। रूहानी संध्या के घर बच्चों को पढ़ाने जाती थी और इसके बदले संध्या हर महीने उसकी हथेली पर पाँच हजार रुपये रख देती थी, जिन्हें सविता अपने पास रख लेती थी। रूहानी को सिर्फ एक घंटे के लिए घर से बाहर रहने की इजाजत थी और वह भी केवल संध्या के घर जाने की।

उसे कहीं और जाने की इजाजत नहीं थी।

रूहानी को भी संध्या के अलावा किसी और के सामने अपना दुख कहने की हिम्मत नहीं होती थी। इसलिए जब भी उसका दिल बहुत भारी हो जाता, वह संध्या के पास जाकर अपने मन की सारी बातें कह देती।

रूहानी के शरीर पर पड़े चोटों के निशान देखकर संध्या का दिल अक्सर भर आता था। वह इतनी दयालु औरत थी कि रूहानी की हालत देखकर उसकी आँखों में भी आँसू आ जाते। संध्या जानती थी कि इस मासूम लड़की ने बचपन से ही बहुत कुछ सहा है।

वह अक्सर रूहानी को समझाती, “बेटा, हिम्मत रखो। एक दिन तुम्हारी जिंदगी जरूर बदलेगी। तुम्हारे हिस्से में भी खुशियाँ आएँगी।”

रूहानी उसकी बातें सुनकर हल्का-सा मुस्कुरा देती, लेकिन उसके दिल में उसे खुद भी यकीन नहीं था कि उसकी जिंदगी कभी बदल सकती है।

उसकी जिंदगी में fairy tail जैसी कोई कहानी नहीं थी। अगर कोई राजकुमार उसकी जिंदगी में आता भी, तो शायद वह भी उसकी बुरी किस्मत की वजह से उससे दूर चला जाता।

संध्या ने रूहानी को हमेशा अपनी बेटी की तरह माना था। जब भी उसे चोट लगी होती, वह उसके जख्मों पर दवा लगाती और उसे प्यार से समझाती। रूहानी भी उसके सामने अपने दिल की सारी बातें कह देती थी।

इसी बीच घर में रिद्धिमा के रिश्ते की बात चल रही थी। रिद्धिमा को लेकर सविता पहले ही काफी परेशान थी। उसे डर था कि कहीं फिर से कोई बात बिगड़ न जाए।

लेकिन उस दिन घर में कुछ और ही माहौल था।

खाने की मेज पर तरह-तरह की चीजें रखी हुई थीं। मेहमानों के लिए अच्छे और महंगे पकवान बनाए गए थे। सविता चाहती थी कि लड़के वालों पर उसके घर और उसकी बेटियों का अच्छा प्रभाव पड़े।

तान्या खाने की तरफ देखते हुए मन ही मन सोच रही थी कि आखिर इतना परेशान होने की जरूरत क्या है। उसे पूरा भरोसा था कि रिद्धिमा का रिश्ता हो जाएगा।

तभी वह अपनी माँ सविता से बोली, “अरे माँ, परेशान मत हो। मुझे तो लगता है ये रिश्ता हो जाएगा। अब मेरी बहन ही इतनी खूबसूरत है, तो भला कोई उसे कैसे पसंद नहीं करेगा?”

मान्या भी चुपचाप खाना देख रही थी। इतने सारे पकवान देखकर उसके मन में भी खाने की इच्छा हो रही थी। लेकिन वह कुछ कह नहीं रही थी।

तभी तान्या की नजर रूहानी पर पड़ी। वह जिस तरह चुपचाप सबके लिए खाना बना रही थी, उसे देखकर तान्या के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

वह अपनी माँ से बोली, “वैसे माँ, एक बात आपने notice की? उन लोगों ने सिर्फ खाने की ही तारीफ नहीं की, बल्कि ये भी कहा कि खाना बहुत स्वादिष्ट बना है।”

तान्या ने यह कहते हुए रूहानी की तरफ देखा।

रूहानी हमेशा की तरह चुपचाप खड़ी थी।

उसे क्या पता था कि जिस खाने की तारीफ आज घर में हो रही है, उसे बनाने वाली वही लड़की थी जिसे इसी घर में सबसे कम समझा जाता था।

और शायद यही रूहानी की जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना थी—उसके हाथों से बनी चीजों की कीमत सब समझते थे, लेकिन उसकी खुद की कीमत कोई नहीं समझता था।

लेकिन शायद रूहानी की जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहने वाली नहीं थी...

क्योंकि आने वाला वक्त उसकी जिंदगी में कुछ ऐसा मोड़ लाने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। क्या रूहानी की किस्मत कभी बदलेगी? क्या उसे भी कभी अपने हिस्से की खुशी मिलेगी? या फिर उसकी जिंदगी में दर्द का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए मिलते हैं अगले chapter में… क्योंकि रूहानी की कहानी अभी शुरू हुई है। ❤️

अगर आपको आज का chapter पसंद आया हो तो Like जरूर करें, Comment करके बताएं कि आपको रूहानी के साथ हो रहा व्यवहार कैसा लगा और आगे की कहानी को लेकर अपनी theories भी जरूर बताएं।

मिलते हैं अगले chapter में…

तब तक के लिए,

Bye Dear Readers! ❤️

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