बेबाक सिमरन का दीवानापन Ch. 2

बेबाक सिमरन का दीवानापन - Chapter 2

Posted by Shukla Gyan Sagar • Sep 13, 2026 03:15 PM

कोई बात नहीं सिमरन, उसने अपनी चुलबुली नीली आँखों को चमकाते हुए खुद से फुसफुसाया, आज नहीं तो कल, यह विशाल कैंपस कितना भी बडा क्यों न हो, अर्जुन कब तक अपनी' पत्नी' से छुपकर भागेगा?

उसने अपना बैग कंधे पर और कसकर संभाला, अपने नंगे नितंबों को चाल की ताल पर मटकाते हुए Collage के मुख्य द्वार की ओर कदम बढा दिए. उसके चेहरे पर वही चिर- परिचित नटखटपन, बेबाकी और एक नए कल की शरारती उम्मीद पूरी तरह से कायम थी.

अध्याय सत्रह: कैंपस की धूप और थिरकते कदम

कैंपस का सेंट्रल Garden दोपहर की सुनहरी धूप से नहाया हुआ था. हरे- भरे कालीन की तरह बिछी घास के बीचों- बीच एक पोर्टेबल ब्लूटूथ स्पीकर से तेज बीट्स पर संगीत गूंज रहा था. वहाँ का माहौल किसी मिनी फेस्टिवल से कम नहीं था.

Collage का वही बेपरवाह और रईस लडका रॉकी अपनी तीन खूबसूरत और स्टाइलिश गर्लफ्रेंड्स के घेरे में खडा था. वे सभी म्यूजिक की ताल पर थिरक रहे थे. रॉकी के चेहरे पर वही पुरानी घमंड भरी मुस्कान थी और वह बिना किसी संकोच के बारी- बारी अपनी गर्लफ्रेंड्स को अपनी ओर खींचकर उनके साथ बोल्ड मूव्स कर रहा था. आसपास से गुजरते छात्रों की निगाहें बार- बार उस मस्ती भरे झुंड पर जा टिकती थीं.

तभी गलियारे की बर्फीली हवा को पीछे छोडते हुए सिमरन उस Garden की तरफ बढी.

उसके चेहरे पर वही नटखट और शरारती मुस्कान वापस लौट आई थी. ब्रा और थ्रोंग के बेहद कम कपडों में ढकी सिमरन की चाल में गजब का अल्हडपन और बेफिक्री थी. हर कदम पर उसकी मटकती हुई कमर और हवा से टकराती बेबाकी, Garden में मौजूद बाकी लडकियों के लुक्स पर भारी पड रही थी.

जैसे ही उसकी नीली, शरारती नजरें रॉकी और उसकी गर्लफ्रेंड्स पर पडीं, उसके मन में खुराफात का नया तूफान उठ खडा हुआ. सिमरन को इस बात से रत्ती भर फर्क नहीं पडता था कि रॉकी के साथ कौन खडा है या लोग क्या सोचेंगे; वह तो बस जिंदगी को अपने अंदाज में जीने की धुन में थी.

अपनी नटखट चाल से मटकती हुई, सिमरन सीधी उस डांस कर रहे ग्रुप के बीच में जा पहुंची.

बिना किसी झिझक के, उसने रॉकी की एक Girlfriend को चुटकी बजाते हुए एक तरफ होने का इशारा किया और झटके से रॉकी का हाथ थाम लिया. म्यूजिक की बीट्स पर उसने तुरंत अपनी कमर को ऐसे मटकाना शुरू किया कि वहाँ मौजूद हर किसी की सांसें थम गईं. उसके हर एक मूव में गजब की **** और एक बिंदास खिलखिलाहट थी.

रॉकी एक पल के लिए सिमरन के इस अचानक और बिंदास आक्रमण से हैरान रह गया, लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर वही जानी- पहचानी रंगीन मुस्कान फैल गई. सिमरन की बेबाकी पर फिदा होकर उसने अपनी बाहें आगे बढाईं और सिमरन को अपनी ओर खींच लिया.

ओहो रॉकी जी! अकेले- अकेले डांस? मुझे इतनी जल्दी भूल गए क्या? सिमरन ने अपनी बेहद चुलबुली और रसीली आवाज में कहा. उसने अपनी नीली आंखें मटकाईं और अपने दोनों नाजुक हाथ सीधे रॉकी के मजबूत कंधों पर रख दिए.

रॉकी की गर्लफ्रेंड्स सिमरन के इस नटखट और बोल्ड अंदाज को देखकर ठिठक गईं, पर सिमरन ने उनकी तरफ एक नजर तक नहीं डाली. वह पूरी बेफिक्री के साथ रॉकी के बिल्कुल करीब आ चुकी थी. उसके ****ों का हल्का सा स्पर्श रॉकी की छाती से हुआ, पर सिमरन के चेहरे पर घबराहट के बजाय एक नटखट हंसी बिखरी हुई थी.

तुम्हे भुलाना इतना आसान है क्या, जानू? रॉकी ने हंसते हुए उसकी पतली कमर पर अपनी पकड मजबूत की और उसे अपने साथ थिरकाने लगा.

सिमरन ने अपनी गर्दन को थोडा पीछे की तरफ झुकाया, अपने बिखरे हुए बालों को उंगलियों से संवारा और खिलखिलाते हुए बोली, तुस्सी बहुत तेज हो रॉकी जी! लेकिन आज मेरी नजरें पूरे कैंपस में भटक रही हैं. मस्ती भी जारी रहेगी और मेरी तलाश भी!

उसके इस बिंदास डायलॉग पर रॉकी जोर- जोर से हंस पडा और Garden में खडे बाकी छात्र भी ठहाके लगाने लगे. म्यूजिक की धुन तेज हो रही थी, और सिमरन रॉकी की बाहों में मटकते हुए अपनी शरारती आंखों से पूरे Garden में घूम- घूमकर हर गुजरते चेहरे को टटोल रही थी—यह देखने के लिए कि क्या उसका childhood' पति' अर्जुन इस महफिल का हिस्सा था.

सिमरन के नटखट मन पर तो जैसे शरारत का कोई नया खुमार सवार हो चुका था. संगीत की बीट्स तेज हो रही थीं और माहौल में मस्ती का पारा चढता जा रहा था. रॉकी की बाहों में थिरकते- थिरकते सिमरन की नीली आँखों में अचानक एक नई चमक कौंध गई.

बिना एक पल की देरी किए, उसने रॉकी के कंधों से अपने हाथ हटाए और बेहद नजाकत के साथ अपने दोनों नाजुक, रसीले हाथों को उठाकर रॉकी के चेहरे पर टिका दिया. उसने अपनी उंगलियों की हल्की सी गिरफ्त से उसके गालों को थाम लिया.

रॉकी कुछ समझ पाता या अपनी अगली हरकत के बारे में सोच पाता, उससे पहले ही सिमरन ने अपनी नटखट चाल में थोडा सा उचककर अपने गुलाबी और गीले होंठ सीधे रॉकी के होंठों पर टिका दिए.

Garden की खिली हुई धूप में यह नजारा किसी तूफान से कम नहीं था. सिमरन ने अपनी आँखें हौले से मूँद लीं और बेहद मिठास और बेबाकी के साथ रॉकी को अपने होंठों का रस पिलाने लगी. उसकी सांसों की गरमाहट सीधे रॉकी के चेहरे से टकरा रही थी. सिमरन का यह अंदाज न सिर्फ बिंदास था, बल्कि उसमें एक अजीब सी मासूम रंगीनी भी घुली हुई थी.

रॉकी एक पल को सिमरन की इस अचानक और बेबाक पहल से सन्न रह गया. लेकिन अगले ही पल, उसके रसीले होंठों की मिठास और उस अचानक हुए अहसास के जादू में वह खुद को पूरी तरह से भूल बैठा. उसकी बाहें खुद- ब- खुद सिमरन की पतली कमर के चारों ओर कस गईं, और वह भी सिमरन के इस गहरे, मीठे और कातिलाना Kiss का घूँट भरने लगा.

आसपास डांस कर रही उसकी गर्लफ्रेंड्स और बाकी स्टूडेंट्स का झुंड यह नजारा देखकर दहल गया. फिर अगले ही पल पूरे Garden में सीटी बजाने और शोर मचाने का एक नया दौर शुरू हो गया.

वूप- वूप! रॉकी भाई, क्या बात है!

छात्रों के ठहाके और तालियाँ बजने लगीं, लेकिन सिमरन को इस पूरे ड्रामे से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड रहा था. वह तो बस अपनी मस्ती की धुन में डूबी, रॉकी के होंठों से चिपकी रही. ब्रा और थ्रोंग के बेहद कम लिबास में ढकी उसकी देह रॉकी की छाती से सटी हुई थी, और उसकी उंगलियाँ हौले- हौले रॉकी के बालों को सहला रही थीं.

कई लम्हों तक Garden के उस चकाचौंध माहौल के बीच सिमरन उसे अपने होंठों का मीठा रस पिलाती रही. जब उसने धीरे से अपने होंठ पीछे हटाए, तो उसके होंठों पर वही चिर- परिचित, नटखट और चुलबुली मुस्कान खिल रही थी.

उसने अपनी नीली आँखें मटकाईं, सांसों को थोडा संभाला और रॉकी की गाल पर एक हल्की सी थपकी देते हुए चुलबुले अंदाज में बोली, कैसा लगा जानू? लंच का स्पेशल डेजर्ट!

रॉकी, सिमरन के इस बेबाक और रसीले Kiss के जादू में पूरी तरह से खो चुका था. Garden का शोर और संगीत जैसे उसके लिए अब बेमानी हो चुके थे. सिमरन के गुलाबी और मीठे होंठों का रस पीते- पीते उसकी बेताबी और उत्तेजना अब काबू से बाहर हो रही थी.

उसने सिमरन की पतली कमर से अपने हाथों को थोडा और नीचे खिसकाया. बिना एक पल की झिझक के, रॉकी ने अपने दोनों मजबूत हाथों में सिमरन के सुडौल और नंगे नितंबों को थाम लिया. थ्रोंग की पतली स्ट्रैप के बीच से उभरते उसके मांसल नितंबों पर रॉकी की उंगलियों की पकड मजबूत हो गई. वह सिमरन को अपने और करीब खींचते हुए उसके नितंबों को अपनी हथेलियों में कसकर दबाने लगा.

रॉकी की इस अचानक और बोल्ड हरकत पर सिमरन जरा भी नहीं घबराई. उसके **** में एक मीठी सी सिहरन जरूर दौडी, लेकिन उसके चुलबुले और नटखट अंदाज में रत्ती भर भी कमी नहीं आई. उसने हौले से अपनी आँखें खोलीं और रॉकी के बेहद करीब होते हुए भी अपनी वही जानी- पहचानी शरारती मुस्कान बिखेरी.

रॉकी अभी भी पागलों की तरह उसके होंठों को चूस रहा था. सिमरन ने अपनी नजाकत और बेफिक्री को बरकरार रखते हुए अपने दोनों नाजुक हाथों को ऊपर उठाया. उसने रॉकी की गरदन के चारों ओर अपनी बाहें नहीं डालीं, बल्कि बेहद चुलबुले अंदाज में अपनी उंगलियां रॉकी के घने और बिखरे हुए बालों में फंसा दीं.

वह रॉकी के बालों को हौले- हौले सहलाने लगी, मानो उसे और दुलार दे रही हो. रॉकी उसके नितंबों को दबाते हुए उसके होंठों का रस पीता रहा, और सिमरन अपने हाथों से उसके बालों में अपनी बेबाक मस्ती का जादू जगाती रही. आसपास जमा छात्रों का झुंड उनकी इस खुलेआम रंगीनी को देखकर और भी उत्तेजित हो गया, और पूरा Garden सीटियों और ठहाकों से गूंज उठा.

रॉकी ने जब सिमरन के होंठों का सारा रस पूरी तरह निचोड लिया, तब जाकर उसने धीरे से अपने होंठ पीछे हटाए. उसकी सांसें तेज चल रही थीं और आँखों में एक अजीब सा खुमार तैर रहा था. सिमरन के गुलाबी होंठ अब थोडे और रसीले और लाल नजर आ रहे थे.

सिमरन ने भी अपनी आँखें खोलीं, अपनी गहरी सांस को संभाला और रॉकी की छाती पर अपने दोनों हाथों से एक हल्की सी थपकी दी. उसके चेहरे पर वही चिर- परिचित बेबाक, चुलबुली और शरारती मुस्कान फिर से खिल उठी.

उसने अपनी नीली आँखें मटकाईं, रॉकी के बालों से अपनी उंगलियां निकालीं और हंसते हुए बोली, बस भी करो रॉकी जी! सारा रस आज ही पी जाओगे क्या? थोडा सा सब्र भी रखा करो!

उसका यह चुलबुला अंदाज सुनकर आसपास खडा छात्रों का झुंड एक बार फिर ठहाकों से गूंज उठा. रॉकी भी सिमरन की इस नटखट अदा पर फिदा होकर जोर से हंस पडा, हालांकि उसने सिमरन के नितंबों पर अपनी पकड थोडी ढीली कर दी थी.

सिमरन ने बिना किसी संकोच के अपने बिखरे हुए बालों को पीछे झटका और अपने कंधे पर बैग को संभालते हुए एक शरारती नजर पूरे Garden पर दौडाई—क्योंकि उसके दिल में अब भी वही एक सवाल था कि उसका असली' पति' अर्जुन आखिर Kiss कोने में खडा यह सब देख रहा होगा.

Collage के विशाल मुख्य द्वार को पीछे छोडते हुए, सिमरन ने बाहर की खुली सडक पर कदम रखा. दोपहर ढल चुकी थी और सूरज की किरणें अब हल्की और सुनहरी हो चली थीं. कैंपस की चारदीवारी के अंदर का शोर और रोमांस अब पीछे छूट गया था, लेकिन उसके बदन पर लगी रॉकी के होंठों की गरमाहट और उसके नितंबों पर उंगलियों का दबाव अभी भी महसूस हो रहा था.

सिमरन ने एक गहरी सांस ली. Collage का पहला दिन—अठारहवें जन्मदिन का यह खास तोहफा—सचमुच उम्मीद से कहीं ज्यादा बेबाक और रोमांचक रहा था. उसने अपने कंधे पर टिके बैग के स्ट्रैप को थोडा संभाला और अपने बिखरे हुए बालों को उंगलियों से पीछे झटक दिया.

चलते- चलते उसके गुलाबी होंठों पर वही चिर- परिचित चुलबुली और नटखट मुस्कान फिर से तैरने लगी. उसके चलने के अंदाज में गजब की बेफिक्री और अल्हडपन था. ब्रा और थ्रोंग के बेहद कम लिबास में ढका उसका सुडौल बदन सडक पर चलती हल्की हवा के थपेडों को महसूस कर रहा था.

थ्रोंग की पतली स्ट्रैप के बीच से उभरते उसके मांसल और नंगे नितंब, सिमरन की हर चाल के साथ एक गजब की ताल मिलाते हुए दाएं और बाएं ओर मटक रहे थे. यह एक ऐसी बेबाक और आत्मविश्वास से भरी रफ्तार थी, जिसे देखकर सडक पर चलते राहगीर, ऑटो वाले और बाइक सवार एक पल के लिए ठिठक जाते थे. कई नजरें उसके खुले **** पर टिक जाती थीं, लेकिन सिमरन को इन सब बातों की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी.

उसका पूरा ध्यान तो अपने घर के रास्ते पर था, और दिमाग में अब भी वही एक नाम गूंज रहा था—अर्जुन.

जानू रॉकी तो सच में बहुत नॉटी है, उसने मन ही मन सोचा और खिलखिलाकर हंस पडी. उसकी हंसी की आवाज सडक के शोर में घुल गई. लेकिन असली मजा तो तब आएगा जब अर्जुन मुझे इस हाल में देखेगा. क्या वह भी रॉकी की तरह बेताब हो जाएगा, या अपने बचपन की' पत्नी' को देखकर शर्मा जाएगा?

इस शरारती खयाल ने सिमरन के कदमों को और तेज कर दिया. उसके मटकते नितंबों की रफ्तार थोडी और बढ गई. वह अपनी धुन में मग्न, गजब के आत्मविश्वास और बेबाकी के साथ शाम की ढलती रोशनी में अपने घर की ओर बढती जा रही थी. उसे न तो किसी का डर था, न किसी की टोक का इंतजार; वह तो बस अपने अठारह साल की आजादी का हर एक लम्हा जी रही थी.

अध्याय बीस: घर की दहलीज और नए अरमान

सडक का सफर तय करते हुए सिमरन आखिरकार अपने घर की परिचित इमारत के सामने पहुंच गई. थ्रोंग और ब्रा में ढके उसके बदन पर शाम की ठंडी हवा एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी. मटकते नितंबों की रफ्तार पर विराम लगाते हुए, उसने अपनी चुलबुली नजरें घर के मुख्य दरवाजे पर टिकाईं.

उसने जेब से चाबी निकाली और अपने नटखट अंदाज में दरवाजे का ताला खोला. जैसे ही दरवाजा खुला और वह अंदर दाखिल हुई, घर की शांति ने उसका स्वागत किया. जूते एक तरफ पटककर उसने बैग को सोफे पर फेंका और सीधे हॉल में लगे बडे से आईने की ओर बढ गई.

ब्रा और थ्रोंग में खुद को निहारते हुए, उसके होंठों पर वही शरारती और कातिलाना मुस्कान वापस आ गई. Collage के पहले दिन की बेबाक मस्ती, रॉकी का दुलार और अर्जुन की अनजानी झलक—सब कुछ उसके दिमाग में एक रंगीन फिल्म की तरह घूम रहा था.

तो पहला दिन काफी धमाकेदार रहा, सिमरन! उसने आईने में देखकर खुद से फुसफुसाया और अपने बिखरे बालों को संवारते हुए खिलखिलाकर हंस पडी.

उसने अपने कपडों को बदलने का कोई इरादा नहीं बनाया; उसे तो बस इस आजादी और बेफिक्री का आनंद लेना था. अब उसकी निगाहें अगली सुबह पर टिकी थीं, जब वह एक बार फिर इसी बेबाकी के साथ अर्जुन के सामने जाकर अपनी' पत्नी' होने का हक जताने वाली थी.

अध्याय इक्कीस: घर का एकांत और सुबह का इंतजार

आईने के सामने खडी सिमरन ने एक गहरी सांस ली. Collage के पहले दिन की भागदौड और लगातार मटकते रहने के बाद उसके **** में थोडी थकान उतर आई थी, लेकिन उसके मन की मस्ती और बेबाकी अब भी बरकरार थी.

उसने हॉल से निकलकर सीधे अपने बेडरूम का रुख किया. थ्रोंग की पतली स्ट्रैप में ढके उसके नितंब अब भी हल्की चाल के साथ दाएं- बाएं मटक रहे थे. कमरे में पहुँचकर उसने पंखा फुल स्पीड पर चलाया और सीधे अपने गद्देदार बिस्तर पर पीठ के बल ढह गई.

बर्फीली हवा जब उसके ब्रा और थ्रोंग में ढके खुले बदन से टकराई, तो उसके गुलाबी होंठों से एक हल्की सिसकी निकल गई. उसने आँखें मूँद लीं.

दिन भर की सारी घटनाएँ एक- एक करके उसकी आँखों के सामने तैरने लगीं—रॉकी के साथ खुलेआम की गई मस्ती, उसकी बाहों का कसाव, और फिर क्लासरूम में कबीर द्वारा दिया गया वह सरप्राइज कि अर्जुन वहीं पहली बेंच पर बैठा था.

अर्जुन. सिमरन के होंठों पर एक नटखट और बेहद मीठी मुस्कान बिखर गई. उसने करवट ली और तकिए को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया.

उसका बचपन का' पति' अब उसके इतने करीब था. आज तो वह उससे सीधे बात नहीं कर पाई थी, लेकिन कल का दिन उसका अपना था. उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि कल वह और भी ज्यादा बेबाक अंदाज में Collage जाएगी और अर्जुन के सीधे सामने जाकर उसके सारे होश उडा देगी.

इसी शरारती खयाल के साथ, मुस्कुराते हुए सिमरन की आँखें धीरे- धीरे नींद के आगोश में ढलने लगीं. बेडरूम के एकांत में थोडी देर आराम करने के बाद, सिमरन की सुस्ती धीरे- धीरे दूर होने लगी. उसके पेट में हल्की सी भूख का अहसास होने लगा था, जिसने उसे बिस्तर से उठने पर मजबूर कर दिया.

उसने अपनी जानी- पहचानी चुलबुली अदा दिखाते हुए अपने बदन से वह ब्रा और थ्रोंग भी उतार फेंके, जिन्हें उसने पूरे दिन पहन रखा था. उन कपडों को एक किनारे करीने से रखने के बाद, वह पूरी तरह से आजाद और बेपरवाह अंदाज में **** अवस्था में ही बेडरूम से बाहर निकली और सीधे किचन की तरफ बढ गई.

किचन की ठंडी टाइल्स पर उसके नंगे पाँव पड रहे थे. रसोई के अंदर पहुँचकर उसने गैस ऑन की और बर्तन टटोलने लगी. आज उसका मूड कुछ खास बनाने का था, इसलिए वह अपने ही धुन में गुनगुनाती हुई खाना तैयार करने में जुट गई.

जब वह कभी चूल्हे की तरफ झुकती तो कभी मसालों के डिब्बे उठाने के लिए आगे बढती, तो उसके सुडौल और नंगे नितंब हर हरकत के साथ मटकते और थिरकते रहते थे. उस खाली घर में उसकी यह बेबाक मस्ती और नटखट अंदाज अपने पूरे चरम पर था. डिनर की खुशबू धीरे- धीरे पूरे घर में फैलने लगी, और सिमरन अपने ही ख्यालों में खोई हुई, मुस्कुराते हुए खाने को अंतिम रूप देने लगी.

खाना पकने की खुशबू और किचन में गूंजती गुनगुनाहट के बीच अचानक खिडकी पर एक हल्की सी खटखट की आवाज गूंजी. सिमरन ने चौंककर अपनी गर्दन मोडी. खिडकी के उस पार उनके पडोसी मिश्रा जी खडे थे, जो अक्सर किसी न किसी बहाने से इस तरफ आ जाया करते थे.

सिमरन के चेहरे पर जरा भी घबराहट या झेंप नहीं आई; बल्कि उसके होंठों पर वही जानी- पहचानी, शरारती और चुलबुली मुस्कान तैर गई. वह बिना किसी परवाह के, अपनी उसी मस्त चाल में अपने नंगे नितंबों को हल्का सा मटकाती हुई खिडकी के पास पहुँची.

उसकी **** अवस्था और सामने की तरफ झूलते हुए उसके सुडौल **** साफ नजर आ रहे थे. जैसे ही मिश्रा जी की नजर सिमरन के इस बेबाक और खुले रूप पर पडी, उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं और चेहरे पर एक अजीब सी खुशी व संतुष्टि का भाव उभर आया. वे एक पल के लिए अपनी सुध- बुध खो बैठे.

सिमरन ने उनकी इस हालत को भांपते हुए अपनी नीली आँखें मटकाईं और बेहद कैजुअल और नटखट अंदाज में खिडकी खोल दी.

अरे मिश्रा जी, इतनी शाम को किचन की खिडकी पर कैसे दस्तक दे डाली? कहीं डिनर की खुशबू खींच लाई क्या? सिमरन ने अपनी खिलखिलाती आवाज में मजे लेते हुए पूछा.

मिश्रा जी अपनी नजरें उसके बदन से हटाने की कोशिश करते हुए भी खुद को रोक नहीं पा रहे थे, और हकलाते हुए बोले, वो. बेटा. बस ऐसे ही जरा तुमसे कुछ जरूरी बात करनी थी. कल के Collage के बारे में पूछ रहा था.

सिमरन अपनी खिडकी के फ्रेम पर कोहनी टिकाकर खडी हो गई, जिससे उसके **** और अधिक आकर्षित रूप में झूलने लगे. वह अपनी चिर- परिचित मस्ती भरी अदा में मिश्रा जी से बातें करने लगी, और मिश्रा जी उसकी हर एक बात पर मंत्रमुग्ध होकर वहीं खिडकी के पास टिके रहे.

बिना किसी संकोच के, सिमरन ने अपने चिर- परिचित चुलबुले अंदाज में खिडकी बंद की और सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ गई. उसने दरवाजा खोलकर मिश्रा जी को अंदर आमंत्रित कर लिया.

मिश्रा जी, जो अभी भी उसके खुले और **** रूप के जादू से बाहर नहीं निकल पाए थे, सकुचाते हुए अंदर आए और हॉल से होते हुए डाइनिंग टेबल की तरफ बढे. सिमरन ने अपनी बेपरवाह चाल से चलते हुए उनके लिए भी कुर्सी खींची और खुद उनके सामने वाली कुर्सी पर आराम से बैठ गई.

डाइनिंग टेबल पर गरमा- गरम डिनर परोसा जा चुका था. **** अवस्था में बैठी सिमरन की हर एक अदा में एक अजीब सी मस्ती और आत्मविश्वास झलक रहा था. मिश्रा जी कभी खाने की प्लेट पर तो कभी सिमरन के सुडौल बदन पर अपनी नजरें टिका रहे थे.

सिमरन ने मुस्कुराते हुए अपनी प्लेट उठाई और बेहद दोस्ताना और नटखट अंदाज में बातचीत करते हुए मिश्रा जी के साथ डिनर का लुत्फ उठाने लगी. उस शांत घर में दोनों की बातें और डिनर का यह माहौल एक अलग ही रंग में रंग चुका था.

डाइनिंग टेबल पर रोशनी थोडी धीमी और मद्धिम थी, जो उस माहौल में एक अलग ही नशा घोल रही थी. सिमरन पूरी तरह से बेपरवाह और अपनी ही मस्ती में डूबी हुई थी. उसके खुले हुए और सुडौल **** मेज के पास हल्की सी हरकतों के साथ झूल रहे थे, जबकि बैठने के दौरान उसके मांसल नितंब कुर्सी के किनारों पर टिके हुए थे.

मिश्रा जी के लिए खाने पर ध्यान केंद्रित करना लगभग असंभव हो रहा था. उनकी नजरें बार- बार भटककर सिमरन के पूरे **** पर टिक जाती थीं. कभी वे उसके हिलते हुए ****ों को निहारते, तो कभी उसके खुले और सुडौल नितंबों की बनावट पर उनकी नजरें ठहर जातीं. बीच- बीच में जब भी सिमरन कुर्सी पर थोडी बदलती या हल्की सी हरकत करती, तो मिश्रा जी की नजरें उसकी देह के सबसे निजी और गुप्त अंग—उसकी नाजुक पंखुडी—पर जा टिकती थीं.

उसकी इस खुली नग्नता और बेबाक अंदाज ने मिश्रा जी के होश उडा रखे थे, लेकिन सिमरन के चेहरे पर वही चिर- परिचित, नटखट और चुलबुली मुस्कान बनी हुई थी. वह बडे आराम से बातें करते हुए डिनर का एक- एक कौर ले रही थी, और मिश्रा जी बस उसकी हर एक अदा और उसके खुले बदन के सम्मोहन में डूबे हुए खाना खाने का नाटक कर रहे थे.

डाइनिंग टेबल पर माहौल धीरे- धीरे और भी ज्यादा सहज और खुशनुमा होता गया. मिश्रा जी और सिमरन के बीच हल्की- फुल्की बातचीत के साथ- साथ ठहाकों का दौर भी चलता रहा. सिमरन अपनी चिर- परिचित चुलबुली और नटखट शैली में Collage के पहले दिन के किस्से और अपनी बेबाक बातें मिश्रा जी को सुना रही थी, जिस पर मिश्रा जी बीच- बीच में खिलखिलाकर हंस पडते थे.

पूरी तरह से **** बैठी सिमरन की बेफिक्री और उसका यह दोस्ताना अंदाज मिश्रा जी के सारे संकोच को धीरे- धीरे मिटा रहा था. दोनों ने मिलकर आराम से डिनर खत्म किया, और उस शांत कमरे में उनकी हंसी की आवाजें गूंजती रहीं. खाना पूरा होने के बाद भी वे दोनों काफी देर तक मेज पर बैठकर एक- दूसरे से बातें करते रहे, और शाम का वह वक्त पूरी तरह से एक रंगीन और खुशनुमा माहौल में बदल गया.

डिनर समाप्त होने के बाद सिमरन किचन में चली गई और इस्तेमाल किए गए बर्तनों को धोने लगी. रसोई के बेसिन पर खडे होकर बर्तन साफ करते वक्त उसकी हर एक हरकत के साथ उसके सुडौल और नंगे **** आगे की तरफ झुक रहे थे, और उसके मांसल नितंब हल्के से मटक रहे थे.

मिश्रा जी डाइनिंग एरिया से ही खडे होकर या वहीं पास में टिक कर सिमरन के इस खुले और आकर्षक रूप को लगातार निहार रहे थे. उनकी नजरें एक पल के लिए भी सिमरन के हिलते हुए ****ों और मटकते नितंबों से नहीं हट रही थीं.

सिमरन पानी के छीटों और बर्तनों की खडखड के बीच भी पूरी तरह बेपरवाह और मस्ती में थी. वह किचन के काम में व्यस्त रहते हुए भी मिश्रा जी से लगातार हंस- हंसकर बातें करती जा रही थी, और मिश्रा जी उसकी हर एक बात का जवाब देते हुए उसके इस बेबाक व **** सौंदर्य के सम्मोहन में डूबे हुए थे.

बर्तन धोने के बाद सिमरन ने किचन को समेटा और अपने हाथ धोए.

मिश्रा जी अभी भी वहीं पास में खडे होकर उसकी हर एक अदा और बेबाक अंदाज को निहार रहे थे. सिमरन ने अपनी जानी- पहचानी नटखट मुस्कान के साथ मुडकर मिश्रा जी की ओर देखा और हल्के से कंधे उचकाते हुए कहा, चलिए मिश्रा जी, डिनर तो हो गया, अब थोडा आराम किया जाए या कोई और गपशप बाकी है?

उसकी इस खिलखिलाती और दोस्ताना बात पर मिश्रा जी ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, और फिर कुछ देर और सामान्य बातचीत करने के बाद वे अपने घर के लिए विदा हुए. सिमरन ने मुस्कुराते हुए दरवाजा बंद किया और अपने बेडरूम की तरफ बढ गई, जहाँ अठारह साल की इस नई जिंदगी और बेफिक्र आजादी का अगला दिन उसका इंतजार कर रहा था.

रात का यह अनोखा और दिलचस्प सफर अब थमने लगा था. मिश्रा जी के जाने के बाद घर में एक बार फिर से खामोशी छा गई, लेकिन सिमरन के भीतर की ऊर्जा और उसका चुलबुलापन अभी भी पूरी तरह से कायम था.

वह अपने कदमों से चलकर वापस बेडरूम में पहुँची. दिनभर के लंबे सफर, Collage की मस्ती, रॉकी के साथ बिताए गए पल और फिर मिश्रा जी के साथ हुए इस बेबाक डिनर के बाद, उसके **** में एक हल्की सी सुस्ती घुलने लगी थी.

उसने बिस्तर पर लेटकर अपनी आँखें मूँद लीं. कल का सूरज उसके लिए एक नया सवेरा लेकर आने वाला था, और Collage के उस कैंपस में अर्जुन का सामना करने का खयाल उसके दिल में एक बार फिर से सिहरन पैदा कर रहा था. इसी मीठे रोमांच और अगली सुबह की उत्सुकता के साथ, सिमरन धीरे- धीरे गहरी नींद में उतर चली.

सुबह की पहली किरण के साथ ही खिडकियों से छनकर सुनहरी धूप पूरे घर में फैल गई. नई सुबह की ताजी हवा के साथ ही सिमरन की आँख खुली, और उसके चेहरे पर वही पुरानी, चुलबुली और नटखट मुस्कान तैर गई.

बिना एक पल गंवाए, वह अपनी जानी- पहचानी बेपरवाह अदा में बिस्तर से उठी और सीधे बाथरूम की तरफ बढ गई. पूरी तरह से **** अवस्था में, अपने खुले बालों को झटके देते हुए उसने शावर ऑन कर दिया.

बाथरूम के ठंडे पानी की बौछार जब उसके सुडौल और कोमल बदन पर पडी, तो एक मीठी सी सिहरन उसके पूरे **** में दौड गई. वह शावर के नीचे खडे होकर कभी अपने बदन पर हाथ फेरती, तो कभी पानी की बूंदों के बीच खिलखिलाकर हंसने लगती. उसकी इस बेबाक मस्ती और नटखट हरकतों से पूरा बाथरूम गूंज उठा, और वह अपने ही अंदाज में एक नए और रोमांचक दिन की शुरुआत करने के लिए पूरी तरह तैयार होने लगी.

शावर के नीचे अपनी ही मस्ती में नहाते हुए सिमरन के कानों में अचानक मुख्य दरवाजे पर पडी तेज दस्तक पडी. पानी की आवाज के बीच भी वह खटखट साफ सुनाई दे रही थी.

उसने शावर बंद किया और अपने गीले बदन पर पानी की बूंदों को छोडते हुए मुस्कुरा दी. सुबह- सुबह इतनी बेफिक्री से दरवाजा कौन खटखटा सकता है, यह समझने में उसे जरा भी देर नहीं लगी. सिमरन ने बिना किसी झिझक के बस एक बेहद छोटी और हल्की टॉवेल अपने **** के इर्द- गिर्द लपेटी, जिससे उसका आधा से ज्यादा सुडौल और गीला बदन खुला हुआ था और उसके पैर व कंधे साफ नजर आ रहे थे.

अपने उसी चिर- परिचित, चुलबुले और नटखट अंदाज में, वह गीले पैरों से चलती हुई हॉल की तरफ बढी. उसके चलने के साथ टॉवेल की सीमा से बाहर झांकते उसके मांसल नितंब हल्के से मटक रहे थे और बालों से टपकती पानी की बूंदें उसकी पीठ पर फिसल रही थीं.

उसने खिलखिलाते हुए चुटीले अंदाज में मुख्य दरवाजे की कुंडी घुमाई और दरवाजा खोल दिया. सामने खडे मिश्रा जी, जो सुबह- सुबह ही वहां आ पहुंचे थे, सिमरन के इस बेहद मादक और अर्धनग्न रूप को देखते ही एक पल के लिए अपनी सांसें रोक बैठे.

दरवाजे पर खडे मिश्रा जी, सिमरन के उस छोटी सी टॉवेल में लिपटे और पानी से भीगे हुए रूप को देखकर कुछ पल के लिए शब्दहीन रह गए थे. सिमरन ने अपनी नटखट हंसी के साथ हल्का सा कंधा उचकाया और रास्ता देते हुए कहा, आइए न मिश्रा जी, सुबह- सुबह बाहर खडे- खडे पहरा क्यों दे रहे हैं?

मिश्रा जी संकोच और उत्तेजना के मिले- जुले भाव के साथ अंदर दाखिल हुए और हॉल में रखे सोफे पर बैठ गए. उनकी नजरें अभी भी सिमरन के खुले हुए पैरों और टॉवेल के किनारे से झलकती उसकी देह पर टिकी हुई थीं.

सिमरन ने अपनी जानी- पहचानी बेपरवाह चाल से चलते हुए कहा, बैठिए, मैं आपके लिए गरमा- गरम चाय और नाश्ता लेकर आती हूँ.

यह कहकर वह सीधे किचन की तरफ बढ गई. रसोई में पहुँचकर उसने गैस जलाई और अपने चुलबुले अंदाज में गुनगुनाते हुए नाश्ता तैयार करने में जुट गई. टॉवेल में लिपटे होने के बावजूद उसकी हर एक हरकत—कभी चाय चढाने के लिए झुकना, तो कभी ब्रेड या मक्खन उठाने के लिए आगे बढना—उसके सुडौल अंगों और मटकते नितंबों को साफ जाहिर कर रही थी. पूरे घर में नाश्ते की महक के साथ- साथ एक अजीब सा मादक और खुला हुआ माहौल फिर से छा गया था.

किचन से आती चाय की सोंधी खुशबू और बर्तनों की हल्की खडखड के बीच, मिश्रा जी खुद को रोक नहीं पाए और अपने कदम बढाते हुए रसोई के दरवाजे तक आ पहुँचे. उन्होंने झांककर देखा तो उनके कदम वहीं थम गए और सांसें जैसे अटक गईं.

सिमरन ने अपनी सारी झिझक और उस छोटी सी टॉवेल को भी एक किनारे उठा कर रख दिया था. वह पूरी तरह से **** अवस्था में, अपनी ही मस्ती में चूर होकर गैस के पास खडी थी. नाश्ता तैयार करते वक्त जब वह आगे- पीछे झुक रही थी, तो उसके खुले और सुडौल **** गुरुत्वाकर्षण के साथ आगे की ओर झूल रहे थे, और उसकी हर एक हलचल के साथ वे आपस में टकराते हुए हिल रहे थे.

यही नहीं, उसके खडे होने और रसोई में हल्का सा मटकने के अंदाज से उसके मांसल नितंबों की गहरी रेखा और भी ज्यादा स्पष्ट नजर आ रही थी. सिमरन इस बात से पूरी तरह बेपरवाह थी कि कोई उसे देख रहा है, या शायद वह जानबूझकर अपनी इस बेबाक अदा का आनंद ले रही थी. वह गुनगुनाते हुए अपने काम में व्यस्त थी, जबकि मिश्रा जी उसकी इस खुली और सम्मोहक खूबसूरती को पलकें झपकाए बिना निहार रहे थे.

किचन का माहौल धीरे- धीरे एक अजीब से और मादक सन्नाटे में बदल गया था, जिसे सिर्फ सिमरन की गुनगुनाहट और गैस की हल्की सी सुगबुगाहट ही तोड रही थी. कुछ ही पलों में गरमा- गरम नाश्ता और चाय बनकर तैयार हो गई.

सिमरन ने बिना किसी संकोच के, अपनी उसी पूरी तरह से **** और बेपरवाह अवस्था में ट्रे उठाई और डाइनिंग टेबल की तरफ बढ गई. उसके हर एक कदम के साथ उसके सुडौल **** और मांसल नितंब एक लय में थिरक रहे थे. उसने बडे सलीके से नाश्ता मेज पर सजाया और अपनी कुर्सी पर आराम से बैठ गई. मिश्रा जी, जो अभी भी रसोई के दरवाजे पर खडे उसके इस खुले रूप के सम्मोहन में डूबे हुए थे,

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