धीरे-धीरे इश्क़ हो रहा है Ch. 3

मुझे दोस्त बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है

Posted by समीक्षा • Sep 06, 2026 11:08 PM

लाइब्रेरी की उस कोने वाली मेज पर बैठे-बैठे कबीर को वक्त का अंदाजा ही नहीं रहा। जब उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी, तो शाम के चार बजने वाले थे। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी कोडिंग की किताब बंद की और उसे बैग में ठूंस लिया। पूरी दोपहर उसके दिमाग ने पढ़ाई के हर लॉजिक को रिजेक्ट कर दिया था, और इसकी वजह सिर्फ वो एक दृश्य था। कबीर समझ नहीं पा रहा था कि अयान को उसका चेहरा स्केच करने की क्या ज़रूरत थी।

​"अजीब लड़का है," कबीर ने बुदबुदाते हुए अपना बैग उठाया और लाइब्रेरी से बाहर निकल आया।

​शाम के ठीक पांच बजे, कबीर एक बार फिर अरोमा कैफे के काउंटर के पीछे खड़ा था।

​शाम की शिफ्ट सुबह से बिल्कुल अलग होती थी, सुबह जहाँ कैफे में एक शांत, ठहरा हुआ माहौल होता था, वहीं शाम को यहाँ कॉलेज के कपल्स, दोस्तों के ग्रुप्स और लैपटॉप पर काम करने वाले फ्रीलांसरों की भीड़ जुट जाती थी। कैफे में हल्की जैज़ म्यूज़िक बज रही थी, जो बर्तनों की खनक और लोगों की फुसफुसाहट के बीच एक खूबसूरत बैकग्राउंड स्कोर जैसा लग रहा था।

​कबीर के हाथ मशीन की तरह चल रहे थे, वह बिना किसी से फालतू बात किए फटाफट ऑर्डर्स तैयार कर रहा था। तभी कैफे के मालिक, मिस्टर शर्मा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

​"कबीर बेटा, ज़रा टेबल नंबर 4 पर ये ब्लू बेरी मफिन और कैपुचिनो दे आओगे? रिया अभी दूसरी तरफ व्यस्त है," मिस्टर शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा।

​"जी सर," कबीर ने ट्रे उठाई और टेबल नंबर 4 की तरफ बढ़ गया। उसने टेबल पर ऑर्डर रखा और जैसे ही वापस मुड़ने लगा, किसी ने उसका ब्लैक एप्रन पीछे से हल्का सा खींच लिया।

​कबीर ने चौंककर पीछे देखा, खिड़की के पास वाली उस टेबल पर कोई और नहीं, बल्कि अयान ही बैठा हुआ था। इस बार उसने कॉलेज की वो डेनिम जैकेट उतारकर साइड में रखी थी और अपनी सफेद शर्ट की आस्तीन को कोहनी तक मोड़ रखा था। उसके सामने वही स्केचबुक खुली हुई थी, जिसमें वो पेंसिल से कुछ बना रहा था।

​"तुमने तो दोपहर में मुझे डरा ही दिया था, कबीर! मुझे लगा मेरी आवाज़ इतनी भी बुरी नहीं है कि तुम सीधे भाग खड़े हुए!" अयान ने अपनी वही चिरपरिचित शरारती मुस्कान बिखेरते हुए कहा। इस बार उसके गाल का वो नीला रंग तो साफ हो चुका था, लेकिन उसकी आँखों की चमक वैसी ही थी।

​कबीर ने चारों तरफ देखा, कुछ कस्टमर्स उनकी तरफ ही देख रहे थे। कबीर को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। उसने अपनी आवाज को धीमा किया और थोड़ा सख्त लहजे में कहा, "मैंने आपसे दोपहर में भी कहा था कि मुझे काम था। और प्लीज, मुझे अभी अपना काम करने दीजिए।"

​"अरे, तो मैं कहाँ रोक रहा हूँ? मैं तो यहाँ एक शरीफ कस्टमर की तरह बैठा हूँ। देखो, मैंने मफिन भी ऑर्डर किया है," अयान ने मासूमियत का नाटक करते हुए अपने दोनों हाथ हवा में उठाए, "वैसे, बैठो ना दो मिनट! शाम की कॉफी अकेले पीने में मज़ा नहीं आता।"

​"मैं ड्यूटी पर हूँ," कबीर ने बेहद छोटे और नपे-तुले शब्दों में कहा, ताकि अयान को उनकी सीमाओं का अहसास हो सके।

​अयान ने एक ठंडी सांस भरी। "ड्यूटी पर हो, ठीक है! वैसे, तुम्हारी दोपहर वाली क्लास कंप्यूटर साइंस की थी ना? जेवियर्स का कंप्यूटर डिपार्टमेंट बहुत बोरिंग है, तुम लोग हर वक्त बस स्क्रीन में आँखें गड़ाए रहते हो। कभी कला की दुनिया में भी झांक कर देखो।"

​कबीर को अयान की ये बेबाकी थोड़ी अजीब और थोड़ी हैरान करने वाली लगी। वह बिना कुछ कहे मुड़ गया और वापस काउंटर पर आ गया। लेकिन काउंटर पर खड़े होकर भी उसकी नजरें बार-बार टेबल नंबर 4 की तरफ चली जाती थीं।

वहीं ​अयान अपनी धुन में मगन था, वह मफिन का एक टुकड़ा खाता, कॉफी की चुस्की लेता और फिर अपनी स्केचबुक में कुछ बनाने लगता। कबीर ने नोटिस किया कि जब अयान स्केचिंग करता था, तो उसके चेहरे की वो चंचलता गायब हो जाती थी। और उसकी आँखें बेहद गंभीर और केंद्रित हो जाती थीं। ऐसा लगता था जैसे वह रंगों और लकीरों के पीछे अपनी किसी अलग ही दुनिया में खो गया हो।

​"ये लड़का जितना दिखता है, शायद उतना लापरवाह है नहीं!" कबीर ने शायद पहली बार मन ही मन स्वीकार किया था।

​धीरे-धीरे रात के आठ बज गए, कैफे की भीड़ कम होने लगी थी। बाहर सड़क पर स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थीं और हल्की ठंडी हवा चलने लगी थी। मिस्टर शर्मा और बाकी स्टाफ निकल चुके थे। अब कैफे को बंद करने और सारा हिसाब-किताब मिलाने की ज़िम्मेदारी कबीर की थी।

​कैफे में अब सिर्फ एक ही कस्टमर अयान बचा था, ​कबीर काउंटर के पास खड़ा होकर आज की कमाई का हिसाब कंप्यूटर में फीड कर रहा था। कीबोर्ड पर उसकी उंगलियां बहुत तेजी से चल रही थीं। नंबर्स और लॉजिक्स उसके लिए हमेशा से सबसे आसान रहे थे।

​"बड़ी जल्दी-जल्दी उंगलियां चलती हैं तुम्हारी," अचानक अयान की आवाज़ बहुत करीब से आई।

​कबीर ने चौंककर देखा, अयान काउंटर के ठीक सामने खड़ा था। उसकी स्केचबुक बंद थी और वह कबीर के काम को बड़े ध्यान से देख रहा था।

​"हिसाब पूरा करना है, कैफे बंद करने का समय हो गया है," कबीर ने कंप्यूटर स्क्रीन से नजरें हटाए बिना कहा।

​"मुझे पता है! इसलिए मैं रुका हुआ था कि जब तुम फ्री हो जाओ, तो हम साथ में चलें," अयान ने बहुत ही सहजता से कहा, जैसे यह कोई बहुत आम बात हो।

​कबीर के हाथ कीबोर्ड पर रुक गए, उसने सिर उठाकर अयान की तरफ देखा, उसकी आँखों में साफ़ तौर पर उलझन थी। "साथ में? लेकिन क्यों? और आपको कैसे पता कि मैं किस रास्ते से जाता हूँ?"

कबीर की बात सुन ​अयान हंस पड़ा, "मुझे नहीं पता तुम कहाँ रहते हो, लेकिन मेरा घर भी इसी रूट पर है, मेट्रो स्टेशन तक तो रास्ता सेम ही है ना? और दूसरी बात, तुम बहुत अजीब हो कबीर। कोई तुमसे दोस्ती करना चाहता है और तुम ऐसे सवाल पूछ रहे हो जैसे मैं कोई सस्पेक्ट हूँ।"

​"मुझे दोस्त बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है," कबीर ने रूखेपन से कहा और कंप्यूटर शटडाउन कर दिया।

​"झूठ!" अयान काउंटर पर थोड़ा और आगे झुक गया, दोनों के बीच अब महज़ कुछ इंच का फासला था।

कबीर अयान के परफ्यूम की हल्की सी खुशबू महसूस कर सकता था, जो मिंट और चंदन का एक अजीब सा मिक्सचर थी।

अयान ने कबीर की आँखों में देखते हुए कहा, "इंसान दोस्त बनाने से तब मना करता है, जब या तो वह बहुत घमंडी हो... या फिर वह किसी बात से डरता हो! तुम घमंडी तो नहीं लगते, कबीर।"

​अयान की यह बात कबीर के दिल में किसी गहरे ज़ख्म को खुरच गई। कबीर का अतीत ऐसा था जिसने उसे लोगों पर भरोसा करना छोड़ना सिखाया था। स्कूल के दिनों में उसके सबसे अच्छे दोस्त ने ही उसके भरोसे का फायदा उठाया था, जिसके बाद कबीर ने अपने चारों तरफ एक ऐसी ऊंची दीवार खड़ी कर ली थी जिसे कोई पार न कर सके।

​कबीर ने अपनी भावनाओं पर काबू पाया, अपना बैग उठाया और काउंटर से बाहर आते हुए कहा, "आप जो चाहें सोच सकते हैं लेकिन मुझे देर हो रही है।"

​उसने कैफे की सारी लाइटें बंद कर दीं और अब सिर्फ बाहर की स्ट्रीट लाइट का हल्का नीला और पीला उजाला कांच की खिड़कियों से अंदर आ रहा था। कबीर ने दरवाजा लॉक किया और जैसे ही मुड़ा, उसने देखा कि अयान अपने स्केटबोर्ड को पैर से थपथपाते हुए सड़क पर उसका इंतज़ार कर रहा था।

​"चलो, कम से कम मेट्रो स्टेशन तक तो साथ चल ही सकते हैं," अयान ने कहा।

​रात की खामोशी में कबीर के पास मना करने का कोई ठोस बहाना नहीं था, दोनों सड़क पर एक साथ चलने लगे। अयान अपने स्केटबोर्ड पर धीरे-धीरे संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ रहा था और कबीर उसके बगल में अपनी आदत के मुताबिक हाथ जेब में डाले पैदल चल रहा था। सड़क के दोनों तरफ लगे पेड़ों से सूखे पत्ते गिर रहे थे, जो उनके कदमों की आवाज़ के साथ क्रंच हो रहे थे।

​"तुम्हें पेंटिंग का शौक कब से है?" कबीर ने खुद को भी हैरान करते हुए अचानक पूछ लिया। यह पहली बार था जब कबीर ने खुद से कोई बातचीत शुरू की थी।

​अयान के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई, जैसे उसे इसी पल का इंतज़ार था। "जब से होश संभाला है तब से लेकिन मेरे पापा चाहते थे कि मैं उनका बिजनेस संभालूं, लेकिन मेरे हाथों को सिर्फ रंगों से खेलना आता था। बहुत लड़ाई हुई घर में, पर आखिरकार मैं यहाँ विजुअल आर्ट्स कर रहा हूँ! और तुम? कंप्यूटर साइंस क्यों?"

​"क्योंकि कंप्यूटर कभी झूठ नहीं बोलते," कबीर ने सीधे सड़क की तरफ देखते हुए कहा। "अगर आप सही कोड लिखोगे, तो सही आउटपुट मिलेगा। इंसानों की तरह नहीं, जो अंदर कुछ और बाहर कुछ और होते हैं। बाइनरी नंबर्स की दुनिया में सब कुछ साफ़ होता है या तो 0 या 1... कोई कंफ्यूजन नहीं।"

​अयान ने कबीर की तरफ देखा, इस बार उसकी मुस्कान में वो पुरानी शरारत नहीं थी, बल्कि एक गहरी और संजीदा समझ थी, "लगता है तुम्हें किसी ने बहुत गहरा जख्म दिया है, कबीर! लेकिन याद रखना, हर इंसान का लहजा एक जैसा नहीं होता।"

​कबीर ने उसकी बात सुनी जरूर लेकिन चुप रहा, उसने कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि अयान की बातें उसके दिल के उस हिस्से को छू रही थीं जिसे उसने सालों से बंद करके रखा था। कुछ देर बाद दोनों मेट्रो स्टेशन के जगमगाते हुए गेट पर पहुँच चुके थे।

​"अच्छा, मेरा स्टेशन आ गया! मैं यहाँ से दूसरी लाइन पकड़ूंगा," अयान ने अपने स्केटबोर्ड को हाथ में लेते हुए कहा। "बाय कबीर! कल सुबह फिर मिलेंगे... उसी हार्ट वाली कॉफी के साथ।"

​अयान सीढ़ियों से नीचे उतर गया और भीड़ में कहीं ओझल हो गया। कबीर वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा, आज की रात कबीर को अहसास हुआ कि अयान नाम का यह तूफान उसकी जिंदगी की खामोशी को धीरे-धीरे बदल रहा था, और सबसे डरावनी बात यह थी कि कबीर को अब यह बदलाव उतना बुरा भी नहीं लग रहा था।

​कबीर ने मेट्रो पकड़ी और आधे घंटे बाद वह अपने छोटे से किराए के कमरे में था। कमरा बिल्कुल शांत था, सिर्फ एक सिंगल बेड, एक स्टडी टेबल और किताबों का ढेर। उसने अपना बैग रखा और बिना लाइट जलाए बेड पर लेट गया। छत की तरफ देखते हुए उसने अपने हाथ को देखा, जो सुबह कॉफी मशीन पकड़ते वक्त कांपे थे।

​"अयान..." कबीर ने अंधेरे में उस नाम को धीरे से दोहराया, उसने खुद को बार-बार याद दिलाया कि वह यहाँ सिर्फ पढ़ाई और काम करने आया है, किसी अजनबी को अपनी दीवारों को तोड़ने की इजाज़त देने नहीं। लेकिन उसके दिल के किसी कोने से एक छोटी सी आवाज़ आई कि क्या वह सच में अयान से दूर भाग रहा था, या उस अकेलेपन से जिसे उसने खुद अपना लिया था?

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आखिर क्यों कबीर को दोस्ती पर भरोसा नहीं?

ये कहानी कैसी लग रही है आप सब जरूर बताइयेगा!

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