धीरे-धीरे इश्क़ हो रहा है Ch. 2

अयान और कबीर की दूसरी मुलाकात

Posted by समीक्षा • Sep 05, 2026 07:06 PM

सुबह के पौने नौ बज चुके थे, कैफे के ओनर मिस्टर शर्मा अंदर आए, तो कबीर ने उन्हें अपनी शिफ्ट सौंपी, अपनी ब्लैक एप्रन उतारी और अपना बैग उठाकर कॉलेज की तरफ निकल पड़ा।

​सेंट जेवियर्स कॉलेज कैफे से महज़ दस मिनट की दूरी पर था। जब कबीर कॉलेज के बड़े लोहे के गेट से अंदर घुसा, तो हमेशा की तरह वहाँ छात्रों की भारी भीड़ थी। कोई कॉरिडोर में खड़ा हंस रहा था, तो कोई कैंटीन की तरफ जा रहा था। कबीर ने अपने बैग के स्ट्रैप को कसकर पकड़ा और सीधे अपनी क्लास,  की तरफ बढ़ने लगा। उसे लोगों के बीच रहना, फालतू की बातें करना और सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बनना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसका सीधा सा नियम था, क्लास अटेंड करो, लाइब्रेरी में पढ़ाई करो और वापस अपने काम पर लौट जाओ।

​लेकिन आज कॉलेज का माहौल थोड़ा बदला हुआ लग रहा था। लॉबी में नोटिस बोर्ड के पास लड़कियों और लड़कों का एक बड़ा ग्रुप इकट्ठा था और सब किसी बात को लेकर बेहद एक्साइटेड थे। कबीर पास से गुजर रहा था कि उसे कुछ आवाजें सुनाई दीं।

​"यार, तुमने देखा? अयान आज फिर लेट आया, लेकिन उसकी एंट्री कितनी कूल थी!"

"हाँ ना! वह स्केटबोर्ड पर आते हुए कितना हॉट लग रहा था। और उसकी वो स्माइल..."

​कबीर के कदम वहीं थम गए, "अयान... स्केटबोर्ड..." कबीर के दिमाग ने तुरंत दोनों कड़ियों को जोड़ लिया, तो वह लड़का जिसके बारे में पूरे कॉलेज की लड़कियाँ दीवानी थीं, वही आज सुबह उसके कैफे में आया था? कबीर ने एक बार उस भीड़ की तरफ देखा, अपनी शर्ट के कॉलर को ठीक किया और सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गया। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए था कि अयान कौन है।

​वह अपनी क्लास में जाकर सबसे पीछे वाली बेंच पर बैठ गया। कुछ देर बाद प्रोफेसर अंदर आए और उन्होंने लैक्चर शुरू कर दिया। जिसके बाद कबीर ने अपनी नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि उसका ध्यान कोडिंग के फॉर्मूलों पर नहीं लग रहा था। जब भी वह खिड़की से बाहर देखता, उसे सुबह की वो चमकदार धूप और अयान की वो आवाज याद आ जाती, "अपनी हार्ट वाली कॉफी तैयार रखना!"

​"क्या बकवास है," कबीर ने खुद से धीरे से कहा और अपने सिर को झटक कर वापस बोर्ड की तरफ देखने लगा।

​दोपहर के एक बजे जब कबीर की क्लासेस खत्म हुईं, तो वह लाइब्रेरी जाने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था। तभी अचानक कॉलेज के मेन लॉन से बहुत तेज़ शोर और गिटार की आवाजें आने लगीं। वहाँ कोई इवेंट चल रहा था या शायद कोई स्ट्रीट प्ले। कबीर को उस शोर से बचना था, इसलिए उसने लाइब्रेरी का शॉर्टकट रास्ता चुना जो आर्ट्स डिपार्टमेंट के पीछे से जाता था।

​यह रास्ता आमतौर पर सुनसान रहता था, कबीर तेजी से चल रहा था कि तभी उसे एक दीवार के पीछे से किसी के हंसने की आवाज़ आई। वह आवाज़ बहुत जानी-पहचानी थी।

​कबीर ने अनजाने में ही अपने कदम धीमे कर लिए और मुड़कर देखा। वहाँ आर्ट्स डिपार्टमेंट की खुली गैलरी में, कई सारे कैनवस और रंगों के बीच अयान खड़ा था। उसके हाथ में एक पेंट ब्रश था, और उसके गाल पर नीले रंग का एक छोटा सा दाग लगा हुआ था। उसके आस-पास तीन-चार लड़के-लड़कियां खड़े थे जो उसकी किसी बात पर जोर से हंस रहे थे। अयान पूरी तरह से अपनी दुनिया में मस्त था, वो बेहद आत्मविश्वासी और खुश लग रहा था।

​तभी, जैसे किसी छठी इंद्री ने काम किया हो, अयान ने अचानक अपनी नजरें घुमाईं और सीधे उस रास्ते की तरफ देखा जहाँ कबीर खड़ा था।

​दोनों की नजरें मिलीं जिससे कबीर सकपका गया। उसे लगा कि उसे चोरी-छिपे देखते हुए पकड़ लिया गया है। उसने तुरंत अपनी नजरें चुराईं और भागने ही वाला था कि पीछे से एक तेज़ आवाज़ आई।

​"अरे! मिस्टर कॉफी बॉय! कबीर!" अयान अपना ब्रश वहीं रखकर, कॉरिडोर की रेलिंग पर झुकते हुए ज़ोर से चिल्लाया। उसके आस-पास खड़े उसके दोस्त हैरान होकर कभी अयान को तो कभी कबीर को देखने लगे।

​कबीर के पैर जैसे ज़मीन में जम गए, उसका पूरा शरीर कड़ा हो गया। वह मन ही मन सोच रहा था,"हे भगवान, ये लड़का मुझे कहीं भी चैन से जीने नहीं देगा।"

​कबीर का दिल सीने में इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं आस-पास के लोग उसकी आवाज़ न सुन लें। अयान के दोस्तों की उत्सुक नजरें सीधे कबीर के चेहरे पर टिकी हुई थीं। कबीर को सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बनना वैसे भी ज़हर लगता था, और इस वक्त पूरा आर्ट्स डिपार्टमेंट जैसे उसे ही देख रहा था।

​"ओह, तो यह वही कॉफी बॉय है?" अयान के पास खड़ी एक लंबी लड़की ने अपनी पेंटिंग पैलेट को साइड में रखते हुए पूछा। इस वक़्त उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी।

​"हाँ, यही है! और इसके हाथ की कॉफी... भाई साहब, जन्नत है!" उस लड़की को अयान ने बताया।

फिर अयान ने गैलरी की रेलिंग पर दोनों हाथ टिकाते हुए नीचे खड़े कबीर से कहा। "कबीर! ऊपर आओ ना? तुम्हें अपना डिपार्टमेंट दिखाता हूँ।"

​कबीर ने गहरी सांस ली, और उसने अपने बैग के स्ट्रैप को और कसकर पकड़ा। उसकी अंतरात्मा कह रही थी कि यहाँ से तुरंत भाग जाना ही समझदारी है, लेकिन अगर वह इस वक्त बिना कुछ कहे भागा, तो अयान अगले दिन कैफे में उसका और मज़ाक उड़ाएगा। कबीर ने अपने चश्मे को ठीक किया, फिर अयान की तरफ देखा और बेहद सपाट लहजे में कहा, "नहीं, थैंक यू! मुझे लाइब्रेरी जाना है।"

​"अरे यार, लाइब्रेरी तो कहीं भागी नहीं जा रही! ज़रा ऊपर तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूँ," अयान ने ज़िद करते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसा खिंचाव था जिसे मना करना कबीर के लिए मुश्किल हो रहा था।

​कबीर ने एक पल के लिए सोचा, फिर भारी कदमों से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। जब वह आर्ट्स डिपार्टमेंट की उस गैलरी में पहुँचा, तो वहाँ चारों तरफ बिखरे हुए रंगों, आधे-अधूरे कैनवस और मिट्टी की मूर्तियों की महक आ रही थी। यह कबीर की कोडिंग और कंप्यूटर वाली दुनिया से बिल्कुल अलग, बहुत ही रंगीन और बेतरतीब दुनिया थी।

​अयान कबीर को देखते ही मुस्कुराया, उसके गाल पर लगा वो नीले रंग का दाग अब और भी साफ़ दिख रहा था।

​"देखो, मैं क्या बना रहा हूँ," अयान ने कबीर को थोड़ा आगे खींचते हुए अपने कैनवस की तरफ इशारा किया।

​कबीर ने कैनवस पर देखा, तो वहाँ किसी कैफे का एक धुंधला सा स्केच बना हुआ था। खिड़की से छनकर आती धूप, एक लकड़ी का काउंटर और काउंटर के पीछे खड़ा एक लड़का, जिसका चेहरा अभी साफ़ नहीं था लेकिन उसकी रूपरेखा कबीर से बहुत मिलती-जुलती थी।

​कबीर ने हैरान होकर अयान को देखा। "ये... ये क्या है?"

​"ये सुबह का अरोमा कैफे है," अयान ने अपनी ब्रश को एक कपड़े से साफ़ करते हुए कहा। उसकी आवाज़ में इस वक्त कोई मज़ाक नहीं था, बल्कि एक अजीब सा सुकून था, "जब मैं सुबह वहाँ बैठा था, तो मुझे वो माहौल इतना खूबसूरत लगा कि मैंने कॉलेज आते ही इसे कैनवस पर उतारना शुरू कर दिया। बस इस काउंटर के पीछे वाले लड़के का चेहरा ठीक से नहीं बन पा रहा है। तुम थोड़ा सीधे खड़े होगे? मुझे आईडिया मिल जाएगा।"

​कबीर का चेहरा एक बार फिर हल्का सा गर्म होने लगा, उसने तुरंत अपनी नजरें कैनवस से हटाईं बोला, "मेरे पास इस सब के लिए वक्त नहीं है, अयान जी! और मुझे आपकी सीनियर-जूनियर वाली रैगिंग में कोई दिलचस्पी नहीं है।"

​"अयान जी?" अयान ज़ोर से हंस पड़ा, जिससे उसके दोस्त भी मुस्कुराने लगे। "यार, जी मत लगाओ, ऐसा लगता है जैसे मैं कोई अस्सी साल का बुड्ढा हूँ। सिर्फ अयान काफी है और रही बात रैगिंग की, तो मैं तो बस दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा हूँ।"

​"मुझे दोस्त बनाने का शौक नहीं है," कबीर ने रूखेपन से कहा, और फिर मुड़ा और बिना किसी का इंतज़ार किए तेज़ी से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

​पीछे से अयान ने चिल्लाकर कहा, "ठीक है मिस्टर इंट्रोवर्ट! देखते हैं तुम्हारी ये दीवार कब तक टिकी रहती है! एकबार फिर शाम को मिलते हैं!"

​कबीर ने अयान की बात का कोई जवाब नहीं दिया। वह सीधे लाइब्रेरी की तरफ भागा और एक कोने वाली मेज पर जाकर बैठ गया। उसने अपनी कोडिंग की किताब खोली, लेकिन अगले दो घंटे तक उसने एक पन्ना भी नहीं पलटा। उसके दिमाग में बार-बार वह कैनवस और अयान की वो बातें घूम रही थीं। कबीर खुद से चिढ़ रहा था कि आखिर एक अजनबी लड़का उसकी लाइफ के सेट पैटर्न को इतनी आसानी से कैसे हिला पा रहा था।

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