Fiction Story Ch. 2

सबको शक्ति मिली, उसे सिर्फ एक कमरा मिला

Posted by Aman Aj • Aug 28, 2026 03:38 PM

दिल्ली में उस दिन बादल नहीं थे, फिर भी बारिश लाल रंग की हो रही थी। बूंदें पानी जैसी थीं, पर जमीन को छूते ही उनसे लोहे और जली हुई मिट्टी की गंध उठती थी। लोग पहले छतरियाँ खोलकर वीडियो बनाते रहे। किसी ने इसे कारखाने का प्रदूषण कहा, किसी ने मौसम विभाग को गालियाँ दीं और कुछ लोग आसमान की ओर मोबाइल उठाकर लाइव प्रसारण करने लगे। बीस वर्षीय कबीर मल्होत्रा ने कॉलेज की खिड़की से बाहर देखा तो उसे बारिश से ज्यादा डर उन पक्षियों को देखकर लगा जो बूंदों से बचने के बजाय एक ही दिशा में शहर छोड़कर भाग रहे थे।

उसका फोन कांपा। छोटी बहन नैना का संदेश था—भैया, स्कूल जल्दी बंद हो गया है। मेट्रो नहीं चल रही। मुझे लेने आ जाओ।

कबीर ने उत्तर लिखना शुरू किया, लेकिन उसी क्षण पूरी इमारत हिली। मैदान के बीच लाल पानी जमा हुआ और उसके भीतर से काले पत्थर जैसा एक स्तंभ बाहर निकला। ऐसा ही स्तंभ शहर के हर बड़े इलाके में उभरा। फिर लोगों के सामने नीली स्क्रीन चमकी।

पृथ्वी को परीक्षण क्षेत्र घोषित किया गया है।

पहला चरण सात दिन चलेगा। जीवित रहने के लिए एक प्रारंभिक शक्ति चुनें। उपलब्ध शक्तियाँ सीमित हैं। चुनाव स्थायी होगा।

स्क्रीन पर दर्जनों चिन्ह घूमने लगे। अग्नि, बिजली, बल, उपचार, अदृश्यता, धातु नियंत्रण और पशु रूपांतरण जैसी शक्तियों पर छात्रों ने बिना सोचे हाथ रख दिए। जो शक्ति जितनी आकर्षक थी, उतनी जल्दी गायब होती गई। कबीर ने भी अग्नि चुनने के लिए हाथ बढ़ाया, मगर उससे पहले सामने खड़े देवांश ने उसे छू लिया। लाल रोशनी देवांश की हथेली पर दौड़ गई और अग्नि का चिन्ह कबीर की स्क्रीन से मिट गया।

कुछ ही सेकंड में लगभग सारे अच्छे विकल्प समाप्त हो गए। आखिर में एक धूसर दरवाजे का चिन्ह बचा था। उसके नीचे लिखा था—कमरा, एफ श्रेणी।

विवरण: उपयोगकर्ता अपने आसपास तीन मीटर लंबा और तीन मीटर चौड़ा सुरक्षित कमरा बना सकता है। प्रारंभिक अवधि दस मिनट। अगला उपयोग चौबीस घंटे बाद।

कबीर ने उसे पढ़कर माथा पकड़ लिया। ऐसी शक्ति से वह नैना तक कैसे पहुँचता? दस मिनट का कमरा किसी हथियार, गति या उपचार की बराबरी नहीं कर सकता था। स्क्रीन पर चुनाव के लिए केवल पाँच सेकंड बचे थे। शक्ति न चुनने पर परीक्षण से तत्काल निष्कासन लिखा था, और निष्कासन का अर्थ शायद मृत्यु था। उसने दरवाजे के चिन्ह को छू दिया।

शक्ति स्वीकार की गई—कमरा।

अगले ही पल मैदान के काले स्तंभ में दरार पड़ी। उसके भीतर से मनुष्य जैसी आकृतियाँ निकलीं, लेकिन उनके हाथ असामान्य रूप से लंबे और चेहरे बिना आंखों के थे। उन्होंने सबसे पास खड़े छात्रों पर हमला कर दिया। चीखों के बीच देवांश ने आग फेंकी, पर पहली लपट के बाद ही उसका चेहरा पीला पड़ गया। शक्ति ने उसका शरीर नहीं बदला था; केवल उसे ऊर्जा खर्च करने का नया तरीका दिया था।

कबीर नैना तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की ओर भागा। गलियारे में भगदड़ थी। एक घायल सफाई कर्मचारी, शंभू, जमीन पर पड़ा था। बाकी लोग उसके ऊपर से कूदकर निकल रहे थे। कबीर भी आगे निकल गया, फिर नैना की याद ने उसे रोक दिया। अगर उसकी बहन किसी सड़क पर घायल पड़ी होती तो क्या वह चाहता कि लोग उसे छोड़ दें?

वह वापस लौटा, शंभू को कंधा दिया और पास की प्रयोगशाला में ले गया। दो काले जीव पीछे आ गए। दरवाजे की कुंडी टूटी हुई थी। कबीर के पास कोई हथियार नहीं था। उसने पहली बार अपनी शक्ति सक्रिय की।

कमरा।

उसके पैरों से सफेद रेखा निकली और फर्श पर नौ वर्ग मीटर का चौकोर घेरा बन गया। पारदर्शी दीवारें ऊपर उठीं। काला जीव दौड़ते हुए उनसे टकराया और जैसे लोहे की दीवार से भिड़कर पीछे जा गिरा। दूसरा जीव पंजे मारता रहा, लेकिन पारदर्शी सतह पर एक खरोंच तक नहीं आई। कमरे के भीतर लाल बारिश की गंध बंद हो गई। शंभू का खून बहना भी अचानक धीमा पड़ गया।

स्क्रीन चमकी—आपने एक असहाय व्यक्ति को स्वेच्छा से कमरे में स्थान दिया। स्थायी निवासी संख्या: एक। कमरा अनुभव प्राप्त कर रहा है।

कबीर ने पहली बार अपनी शक्ति को ध्यान से देखा। शायद उसका विवरण अधूरा था।

दस मिनट बाद दीवारें मिट गईं, पर तब तक बाहर के जीव दूसरे शिकार के पीछे जा चुके थे। शंभू ने कांपते हाथ से कबीर को प्रयोगशाला की आपातकालीन चाबी दी। दोनों पीछे की सेवा सीढ़ी से नीचे उतरे। कॉलेज के बाहर शहर पहचाना नहीं जा रहा था। गाड़ियाँ टकराई हुई थीं, लाल पानी नालियों में बह रहा था और दूर-दूर से काले स्तंभों के आसपास चीखें उठ रही थीं।

कबीर के फोन में नैना का आखिरी स्थान दिखाई दे रहा था—सात किलोमीटर दूर, लक्ष्मी नगर के एक स्कूल में। बैटरी अट्ठाईस प्रतिशत थी। उसके पास दस मिनट तक चलने वाला कमरा था, मगर वह दोबारा अगले दिन ही खुल सकता था। फिर भी वह सड़क पर निकल पड़ा। शंभू ने पूछा, “तू अकेला जाएगा?”

कबीर ने कहा, “मेरी बहन इंतजार कर रही है।”

शंभू ने प्रयोगशाला से उठाया लोहे का पाइप कसकर पकड़ा। “तो आज से दो लोग जा रहे हैं।”

मुख्य सड़क पर शक्तियों का नशा कुछ ही मिनटों में उतर चुका था। अग्नि चुनने वाले लोग हर हमला नहीं रोक सकते थे। बल पाने वालों की हड्डियाँ अब भी टूट रही थीं। जिन लोगों ने गति चुनी थी, उनमें से कई तेज दौड़ते हुए दुर्घटनाग्रस्त गाड़ियों से टकराकर घायल हो गए थे। सिस्टम ने शक्ति दी थी, समझ नहीं।

कबीर और शंभू गलियों से आगे बढ़े। रास्ते में उन्हें एक दवा की दुकान मिली जिसका शटर आधा खुला था। भीतर डॉक्टर मीरा सेन दो बच्चों के घाव बांध रही थीं। दुकान के बाहर चार काले जीव घूम रहे थे। मीरा के पास उपचार शक्ति थी, मगर वह घाव बंद कर सकती थीं, खोया हुआ खून वापस नहीं ला सकती थीं। बच्चों की मां मर चुकी थी और उनका पिता गायब था।

कबीर के लिए रुकना खतरनाक था। नैना उससे हर मिनट दूर हो सकती थी। तभी स्कूल से संदेश आया—नेटवर्क बंद होने वाला है। बच्चों को तीसरी मंजिल पर बंद किया गया है। बाहर अजीब लोग घूम रहे हैं। जल्दी आओ।

उसने मुट्ठी भींच ली। फिर दवा की दुकान के भीतर छोटे बच्चे को अपनी मृत मां का नाम पुकारते सुना। कबीर ने शंभू से कहा कि वह गली के दूसरे छोर पर खड़ी कार का अलार्म बजाए। शंभू पाइप से शीशा तोड़कर पीछे हटा। आवाज सुनकर तीन जीव कार की ओर दौड़े। चौथे को कबीर ने पत्थर मारकर अपने पीछे लगाया और दुकान से दूर खींच लिया। डॉक्टर मीरा बच्चों को लेकर बाहर निकलीं।

भागते समय एक बच्ची, तारा, गिर गई। काला जीव उसके करीब पहुँचा तो कबीर ने लोहे की छड़ उसके घुटने में फंसा दी। जीव गिरा, मगर उसके पंजे ने कबीर की बांह चीर दी। शंभू ने पाइप से उसका सिर कुचल दिया। मीरा ने तुरंत कबीर का घाव बंद किया।

सिस्टम ने सूचना दी—आपने दो असहाय बच्चों को सुरक्षित मार्ग दिया। कमरे के संभावित निवासी: तीन। स्थायी पंजीकरण के लिए उन्हें सक्रिय कमरे के भीतर स्वीकार करना होगा।

समूह अब पांच लोगों का था—कबीर, शंभू, मीरा, तारा और उसका छह वर्षीय भाई गोलू। मीरा ने कहा कि पास का सामुदायिक केंद्र मजबूत है, वहीं रुकना चाहिए। कबीर ने मना कर दिया। “मेरी बहन स्कूल में फंसी है। मैं वहां जा रहा हूं।”

मीरा ने बच्चों की ओर देखा। अकेले जाना संभव नहीं था। “तो पहले स्कूल। उसके बाद सुरक्षित जगह।”

रास्ते में उन्हें राघव मिला। वह स्थानीय जिम चलाता था और उसने एस श्रेणी की लौह-त्वचा शक्ति चुनी थी। उसकी बांहें धातु जैसी चमक रही थीं। उसके साथ बारह लोग थे। राघव ने सड़क पर किराने की दुकान घेर रखी थी और भोजन लेने के बदले लोगों से अपने समूह में शामिल होने की शर्त रख रहा था। उसने कबीर की एफ श्रेणी शक्ति सुनी तो हंस पड़ा।

“कमरा?” उसने कहा। “प्रलय में मकान बनाने निकला है?”

कबीर ने बहस नहीं की। उसने पानी की दो बोतलें खरीदने के लिए अपना बटुआ बढ़ाया। राघव ने बटुआ फेंक दिया। अब रुपये का कोई मूल्य नहीं था। बदले में उसने डॉक्टर मीरा से अपने घायल आदमी का उपचार करने को कहा। मीरा ने सहायता की, तब उन्हें पानी मिला। जाते हुए राघव ने चेतावनी दी, “रात होने से पहले मेरे ठिकाने पर आ जाना। कमजोर लोग बाहर नहीं बचेंगे।”

शंभू ने धीरे से कहा, “उसके ठिकाने में कमजोर बचेंगे या उसकी सेवा करेंगे?”

कबीर ने उत्तर नहीं दिया। सामने फ्लाईओवर के नीचे सैकड़ों लोग जमा थे। सेना की गाड़ी आने की अफवाह फैली थी। तभी स्क्रीन पर नया संदेश आया—पहली रात्रि के आरंभ में इकाई स्तर बढ़ेगा। सुरक्षित क्षेत्र केवल पंजीकृत कमरों के भीतर उपलब्ध होंगे।

भीड़ में किसी और के पास कमरा शक्ति नहीं थी। लोगों ने कबीर की स्क्रीन देखी तो उसे घेर लिया। हर कोई अपने परिवार को उसके तीन मीटर के कमरे में जगह दिलाना चाहता था। कोई पैसे दे रहा था, कोई धमकी। कबीर ने समझाया कि शक्ति अभी उपलब्ध नहीं है और कमरे में इतने लोग समा भी नहीं सकते। भीड़ सुनने को तैयार नहीं थी।

राघव ने धातु की मुट्ठी सड़क पर मारी। डामर टूट गया और लोग पीछे हट गए। उसने कबीर को प्रस्ताव दिया—“अपना कमरा मेरे नाम कर दे। मैं तय करूंगा कौन बचेगा।”

शक्ति हस्तांतरित नहीं हो सकती थी, पर राघव को इससे फर्क नहीं पड़ा। वह कबीर को अपने नियंत्रण में रखना चाहता था। उसी समय फ्लाईओवर के ऊपर खड़ी बस से एक विशाल काला जीव नीचे कूदा। उसका शरीर बाकी जीवों से तीन गुना बड़ा था। उसकी छाती में लाल पत्थर धड़क रहा था। भीड़ बिखर गई। राघव उससे भिड़ा, लेकिन जीव के पहले प्रहार ने उसकी लौह बांह मोड़ दी।

कबीर ने तारा और गोलू को कार के नीचे छिपाया। मीरा घायल लोगों को खींच रही थीं। शंभू ने देखा कि बस का ईंधन सड़क पर बह रहा है। कबीर ने योजना बनाई। राघव जीव को रोकता रहा, जबकि शंभू ने कपड़े की जलती पट्टी ईंधन तक पहुंचाई। विस्फोट से फ्लाईओवर का किनारा टूटा और कंक्रीट का बड़ा हिस्सा जीव पर गिर गया। उसकी छाती का लाल पत्थर बाहर लुढ़का।

कबीर ने उसे छुआ। कमरे ने ऊर्जा अवशोषित कर ली।

कमरा स्तर दो। नया आकार: पांच मीटर लंबा, पांच मीटर चौड़ा। अवधि: तीस मिनट। नया गुण—कमरे के भीतर सामान्य घावों का रक्तस्राव रुक जाएगा। पुनः उपयोग समय बारह घंटे।

लोगों की नजर बदल गई। अब उन्हें कबीर कमजोर नहीं लग रहा था। वह शक्ति किसी को मार नहीं सकती थी, पर पच्चीस वर्ग मीटर के भीतर लोगों को मृत्यु से रोक सकती थी। राघव ने भी यह समझ लिया। उसकी आंखों में सम्मान नहीं, लालच था।

कबीर समूह को लेकर वहां से निकल गया। पीछे राघव ने अपने लोगों को आदेश दिया, “उस लड़के पर नजर रखो। रात से पहले उसका कमरा हमारा होगा।”

लक्ष्मी नगर का स्कूल चारों ओर से काले जीवों से घिरा था। मुख्य द्वार के पास चौकीदार मृत पड़ा था और मैदान में लाल बारिश का पानी घुटनों तक जमा था। तीसरी मंजिल की खिड़की पर सफेद कपड़ा बंधा था। कबीर ने दूरबीन की जगह फोन का कैमरा बढ़ाकर देखा। नैना वहां थी। उसके साथ लगभग तीस बच्चे और दो शिक्षक थे।

समस्या यह थी कि भीतर जाने का रास्ता नहीं था। मीरा ने कहा कि वे पीछे की दीवार से चढ़ सकते हैं, लेकिन बच्चों को उसी रास्ते बाहर लाना असंभव होगा। शंभू को स्कूल के नक्शे की जानकारी थी; वर्षों पहले उसने वहां मरम्मत का काम किया था। मैदान के नीचे वर्षा जल की सुरंग थी जो पीछे के नाले तक जाती थी। उसका मुंह लोहे की जाली से बंद था।

वे नाले तक पहुंचे। दुर्गंध और लाल पानी के बीच घुटनों के बल चलना पड़ा। शंभू ने पाइप से जाली खोली। सुरंग के भीतर अंधेरा था और दीवारों पर काली नसें उग आई थीं। गोलू रोने लगा। कबीर ने उसे पीठ पर बैठाया। तारा ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “कमरा वाले भैया हमारे साथ हैं।”

यह पहली बार था जब किसी ने उसकी शक्ति का नाम मजाक के बिना लिया।

सुरंग के बीच एक मादा जीव ने रास्ता रोका। उसकी पीठ से छोटे अंडे चिपके थे। मीरा ने फुसफुसाकर कहा कि उसे छेड़ा तो सारे अंडे फूट सकते हैं। कबीर ने कमरे की उपलब्धता देखी—तीन मिनट बाकी। उसने सक्रिय किया। पांच गुणा पांच मीटर की पारदर्शी जगह ने समूह को घेर लिया। जीव ने उन्हें देखा, मगर कमरे की सीमा के भीतर उनकी गंध और आवाज बाहर नहीं जा रही थी। वह धीरे-धीरे दूसरी दिशा में चली गई।

कमरा केवल दीवार नहीं था। वह बाहर और भीतर की सूचना भी नियंत्रित कर रहा था।

समूह स्कूल के भंडार कक्ष में निकला। तीसरी मंजिल तक जाते समय उन्हें कुछ संक्रमित शिक्षक मिले। राघव होता तो सीधे हमला करता, मगर कबीर ने अग्निशामक यंत्र का धुआं फैलाकर उनकी दृष्टि रोकी और सीढ़ी का दरवाजा पीछे से बंद कर दिया। शक्ति बचाना जरूरी था।

नैना ने भाई को देखते ही गले लगा लिया। उसकी आंखों में राहत केवल एक क्षण रही। उसने बताया कि एक छात्र, करण, बुखार में है। उसके कंधे पर काटने का निशान था। बाकी लोग उसे कमरे से बाहर फेंकना चाहते थे। कबीर ने मीरा को दिखाया। संक्रमण तेजी से फैल रहा था और उपचार शक्ति उसे रोक नहीं पा रही थी।

स्क्रीन पर नियम आया—सक्रिय कमरे में प्रवेश करने वाले संक्रमित जीव को निवासी स्वीकार करने पर संक्रमण की गति स्थिर की जा सकती है। स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं। कमरे की ऊर्जा निरंतर खर्च होगी।

कमरा अभी केवल सत्ताईस मिनट बचा था। करण को स्वीकार करने से समय घटकर तेरह मिनट हो जाता। इतने में सारे बच्चों को बाहर निकालना कठिन था। शिक्षक ने कहा, “एक बच्चे के लिए बाकी सबको खतरे में मत डालो।”

कबीर ने करण को देखा। वह होश में था और कह रहा था कि उसे बाहर छोड़ दें। उसके पिता ने उसे सिखाया था कि दूसरों को बचाने के लिए कभी-कभी पीछे रहना पड़ता है। कबीर को यह साहस नहीं, किसी डरे हुए बच्चे की मजबूरी लगी।

उसने करण को निवासी स्वीकार कर लिया। कमरे की सफेद रोशनी उसके घाव पर ठहर गई। काली नसें आगे बढ़ना बंद हो गईं। सिस्टम ने चेतावनी दी कि कमरे की अवधि अब बारह मिनट बावन सेकंड है।

बच्चों को सुरंग तक ले जाने के लिए केवल इतना समय था। सभी ने रस्सी पकड़ी और पंक्ति में चलना शुरू किया। तभी मुख्य द्वार टूटने की आवाज आई। राघव अपने लोगों के साथ स्कूल में प्रवेश कर चुका था। वह कबीर की सहायता करने नहीं आया था। उसने तीसरी मंजिल पर पहुंचकर कहा कि कमरे में केवल शक्तिशाली लोगों और जरूरी बच्चों को जगह दी जाएगी। बाकी लोग जीवों का ध्यान भटकाने के काम आ सकते थे।

नैना ने उसके चेहरे पर थप्पड़ मार दिया। राघव ने हाथ उठाया, पर कबीर बीच में आ गया। धातु की मुट्ठी उसके चेहरे से कुछ इंच दूर रुक गई। कबीर जानता था कि वह मुकाबला नहीं जीत सकता। उसने केवल कहा, “मुझे मारोगे तो कमरा भी चला जाएगा।”

राघव पीछे हटा। “तो तू हमारे साथ चलेगा।”

नीचे संक्रमित दरवाजे तोड़ रहे थे। बहस का समय समाप्त हो गया। सभी को सुरंग की ओर जाना पड़ा। राघव के लोग आगे निकलने लगे और छोटे बच्चे पीछे रह गए। कबीर ने कमरे की सीमा को सीढ़ियों की चौड़ाई में लगाया। पारदर्शी दीवार संक्रमितों को रोकती रही, जबकि बच्चे एक-एक करके पीछे की ओर उतरते गए। हर निवासी के बाहर निकलते ही कमरे का भार हल्का होता, पर सीमा टूटने के करीब थी।

करण अचानक गिर पड़ा। उसकी काली नसें फिर आगे बढ़ने लगी थीं। कमरे में केवल अट्ठाईस सेकंड बचे थे। कबीर उसे कंधे पर उठाकर सुरंग में दौड़ा। पीछे पारदर्शी दीवार टूटी और जीव अंदर भर गए। शंभू ने जाली बंद की। दूसरी ओर राघव और उसके लोग पहले ही बाहर निकल चुके थे। उन्होंने नाले का ढक्कन बंद करके समूह को भीतर फंसाने की कोशिश की।

नैना ने गुस्से में कहा, “वह हमें मारना चाहता है।”

कबीर ने कमरे की आखिरी ऊर्जा लोहे के ढक्कन पर केंद्रित की। पहली बार सीमा चौकोर नहीं बनी। उसने दरवाजे के आकार में धक्का दिया और ढक्कन बाहर उछल गया।

कमरा समाप्त हुआ। करण की नसें फिर बढ़ने लगीं। लेकिन बाहर निकलते ही सिस्टम चमका—आपने कुल छत्तीस असहाय व्यक्तियों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। कमरा स्तर तीन। पंजीकृत निवासियों की सीमा: पचास। संक्रमण स्थिरता अब कमरे के बाहर भी एक घंटे तक बनी रहेगी।

करण के पास एक घंटा था। कबीर को उससे पहले अगला समाधान खोजना था।

समूह स्कूल से निकलकर पुराने मेट्रो स्टेशन की ओर बढ़ा। लाल बारिश रुक चुकी थी, लेकिन आकाश में दो चंद्रमा दिखाई दे रहे थे। दूसरा चंद्रमा असली नहीं था; वह एक विशाल लाल गोला था जो धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। सिस्टम ने उसे रात्रि द्वार कहा। उसके पूरी तरह खुलते ही दूसरे स्तर के जीव शहर में प्रवेश करते।

मेट्रो स्टेशन का प्रवेश आधा धंसा हुआ था। नीचे प्लेटफॉर्म तक पहुंचने के लिए मलबा हटाना पड़ा। वहां पहले से लगभग सौ लोग छिपे थे। उनका नेता पूर्व पुलिस अधिकारी विक्रम राणा था। उसने कबीर के बच्चों और घायल लोगों को देखकर दरवाजा बंद करने की कोशिश की। स्टेशन में भोजन सीमित था और संक्रमित करण को देखकर भीड़ भड़क गई।

कबीर ने करण को कमरे की सीमा में खड़ा किया और सबको उसकी स्थिर नसें दिखाईं। उसने वादा किया कि लड़का किसी पर हमला नहीं करेगा। विक्रम तैयार नहीं था। तभी ऊपर से राघव का समूह पहुंच गया। राघव ने कहा कि वह स्टेशन की रक्षा कर सकता है, बदले में नेतृत्व उसका होगा। भीड़ ने उसकी चमकती लौह त्वचा देखी और तुरंत सहमति जताने लगी।

राघव ने पहला आदेश दिया—करण को बाहर करो और कबीर को कमरे सहित नियंत्रण कक्ष में बंद कर दो।

विक्रम को उसका तरीका पसंद नहीं आया, पर वह भीड़ खोना नहीं चाहता था। कबीर ने लड़ने के बजाय स्टेशन की असली समस्या दिखाई। सुरंग के दोनों ओर से काली नसें प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही थीं। वे जीवों के लिए रास्ता बना रही थीं। केवल प्रवेश बंद करने से कोई नहीं बचता।

कबीर ने प्रस्ताव रखा कि सारे लोग स्टेशन को एक बड़े कमरे जैसा बनाएं। मेट्रो के टूटे दरवाजों, विज्ञापन बोर्डों और लोहे की रेलिंग से रास्ते संकरे किए जाएं। शक्तिशाली लोग सामने लड़ें, बाकी लोग पीछे जाल बनाएं, घायलों को मीरा के पास पहुंचाएं और बच्चों को मध्य प्लेटफॉर्म पर रखें।

राघव हंसा। “तेरी शक्ति ने तुझे वास्तुकार बना दिया?”

कबीर ने कहा, “दीवार केवल ईंट से नहीं बनती। सही जगह खड़े लोग भी दीवार होते हैं।”

विक्रम ने योजना स्वीकार कर ली। अगले दो घंटे सबने काम किया। शंभू ने टूटी रेलिंग से भाले बनाए। नैना और तारा ने खाली बोतलों में तेल भरकर रोशनी की व्यवस्था की। मीरा ने उपचार क्षेत्र बनाया। कबीर ने कमरे को प्लेटफॉर्म के मध्य सक्रिय किया और घायल, बच्चे तथा बुजुर्ग उसमें पंजीकृत हुए। पहली बार कमरे में पचास लोग मौजूद थे। उसकी पारदर्शी दीवारों पर सफेद नसें चमकने लगीं।

सिस्टम ने नया गुण दिखाया—साझा स्थिरता। कमरे के भीतर पंजीकृत निवासी भय और थकान का एक हिस्सा आपस में बांट सकते हैं। कोई अकेला व्यक्ति पूरी तरह नहीं टूटेगा, लेकिन दर्द सबको थोड़ा महसूस होगा।

करण का बुखार कम हुआ। उसने बताया कि संक्रमण के भीतर कोई आवाज उसे लाल गोले की ओर बुला रही है। जीव बिना सोच के हमला नहीं कर रहे थे; उन्हें आदेश मिल रहे थे। रात्रि द्वार खुलने से पहले वे सुरक्षित कमरों को ढूंढ रहे थे।

कबीर समझ गया कि उसकी शक्ति छिपी नहीं थी। हर बार कमरा मजबूत होता, दूसरी तरफ कोई उसे महसूस करता।

आधी रात को सुरंग से पहला झुंड आया। सामने छोटे जीव थे, उनके पीछे पत्थर जैसी खाल वाले शिकारी। राघव और उसके लोग संकरे रास्ते पर लड़े। कबीर की योजना काम कर रही थी। एक समय में केवल दो जीव आगे आ सकते थे। ऊपर से शंभू के भाले गिरते और मीरा घायलों को पीछे खींचती।

फिर राघव ने आदेश तोड़ दिया। उसने अपनी शक्ति दिखाने के लिए अवरोध हटाकर अकेले झुंड में छलांग लगा दी। उसकी लौह त्वचा पंजों को रोक रही थी, पर हर वार उसे प्लेटफॉर्म से दूर ले जा रहा था। बाकी लड़ाकों ने उसे बचाने के लिए मोर्चा छोड़ दिया। रास्ता खुल गया। दर्जनों जीव कमरे की ओर दौड़े।

कबीर ने सीमा मजबूत की। हर टक्कर उसके सिर में हथौड़े जैसी लगी। साझा स्थिरता के कारण कमरे के भीतर मौजूद पचास लोगों ने उस दर्द का छोटा हिस्सा महसूस किया। बच्चे रोए, बुजुर्ग गिर पड़े, लेकिन कोई भागा नहीं। विक्रम ने लोगों से कहा कि वे दीवार के पास खड़े होकर हाथ रखें। हर हथेली से सफेद रोशनी निकली और सीमा में जुड़ती गई।

कमरा अब केवल कबीर की शक्ति नहीं था। पचास लोग उसे थाम रहे थे।

राघव किसी तरह वापस आया। उसकी धातु की त्वचा जगह-जगह से फट चुकी थी। उसने कमरे में प्रवेश की मांग की। कुछ लोगों ने उसे बाहर छोड़ने को कहा। कबीर के पास बदला लेने का अवसर था। अगर राघव मर जाता तो नेतृत्व का खतरा समाप्त हो जाता। मगर कमरे का नियम शक्तिशाली और कमजोर में अंतर नहीं करता था। केवल यह पूछता था कि उपयोगकर्ता किसी को भीतर स्वीकार करता है या नहीं।

कबीर ने उसे स्वीकार कर लिया।

राघव सीमा पार करते ही गिर पड़ा। उसने पहली बार कबीर से पूछा, “क्यों?”

कबीर ने कहा, “क्योंकि कमरा मेरा है। नियम भी मेरे होंगे।”

सुबह तक पहला झुंड समाप्त हो गया। प्लेटफॉर्म खून और काले धुएं से भर गया था, पर एक भी पंजीकृत निवासी नहीं मरा। सिस्टम ने घोषणा की—कमरा स्तर चार। स्थायी क्षेत्र स्थापित करने की क्षमता उपलब्ध। शर्त: उपयोगकर्ता को एक स्थान चुनकर अगले चौबीस घंटे उसकी सीमा के भीतर रहना होगा। क्षेत्र छोड़ते ही स्थापना विफल होगी।

स्थायी कमरा बनने पर आकार दो सौ वर्ग मीटर हो जाता, पानी शुद्ध करने की क्षमता मिलती और संक्रमण चौबीस घंटे स्थिर रह सकता था। करण को बचाने का यही रास्ता था। लेकिन इसका अर्थ था कि कबीर पूरा दिन स्टेशन नहीं छोड़ सकता। उसी समय नैना ने बाहर लगे रेडियो से संदेश पकड़ा—उनकी मां जीवित थीं और यमुना पार एक अस्पताल में फंसी थीं। अस्पताल अगले बारह घंटे में खाली किया जाने वाला था।

कबीर के सामने चुनाव था। वह मां को लेने जाता तो करण और स्टेशन का स्थायी कमरा खो सकता था। वह रुकता तो मां शायद मर जातीं।

नैना ने उसका हाथ पकड़ा। “तुम यहां रहो। मां को मैं लेकर आऊंगी।”

कबीर ने तुरंत मना किया, पर नैना की आंखों में वही जिद थी जो हमेशा उसकी अपनी आंखों में रहती थी। वह अब बचाई जाने वाली बच्ची नहीं थी। उसने रास्ते में गति शक्ति का एक अवशेष पाया था जिसे केवल एक बार इस्तेमाल किया जा सकता था। विक्रम और शंभू उसके साथ जाने को तैयार हुए।

राघव ने भी उठने की कोशिश की। उसकी बांह टूट चुकी थी। “मैं जाऊंगा,” उसने कहा।

नैना ने ठंडे स्वर में पूछा, “हमें नाले में बंद करने के बाद?”

राघव ने नजर झुका ली। “इसीलिए।”

स्थापना शुरू होते ही कबीर के पैरों से सफेद रेखाएं पूरे मध्य प्लेटफॉर्म पर फैल गईं। दीवारें दिखाई नहीं दे रही थीं, पर हर प्रवेश पर एक हल्की चमक बन गई। सिस्टम ने चौबीस घंटे की उलटी गिनती शुरू की। कबीर सीमा से बाहर एक कदम भी नहीं रख सकता था।

नैना, विक्रम, शंभू और राघव अस्पताल की ओर चले गए। मीरा स्टेशन में रहीं। उन्होंने करण के खून की जांच की और पाया कि संक्रमण पूरी तरह रोग नहीं था। काले कण मानव कोशिकाओं को किसी दूसरी संरचना में बदल रहे थे। कमरे की ऊर्जा परिवर्तन को रोक रही थी, पर नष्ट नहीं कर रही थी। स्थायी क्षेत्र बनने पर उन्हें अध्ययन के लिए समय मिल सकता था।

दोपहर तक स्टेशन में नए लोग आने लगे। कबीर सभी को स्वीकार नहीं कर सकता था। स्थायी कमरे की सीमा अभी पचास निवासी थी और स्थान भर चुका था। बाहर खड़े परिवार गिड़गिड़ा रहे थे। कुछ लोग भोजन दे रहे थे, कुछ अपनी शक्तियां। कबीर को पहली बार समझ आया कि राघव जैसा बनना कितना आसान है। जब किसी के हाथ में सीमित सुरक्षा हो तो हर निर्णय उसे राजा जैसा महसूस करा सकता है।

उसने पंजीकरण का नियम बदला। जो निवासी चलने और लड़ने में सक्षम थे, वे अपनी जगह बच्चों, घायलों या बुजुर्गों को देंगे। वे कमरे की बाहरी सीमा पर स्वयंसेवी रक्षा दल बनाएंगे। इससे उनका स्थायी पंजीकरण हटेगा, पर आवश्यकता पड़ने पर वे थोड़े समय के लिए भीतर आ सकेंगे। कई लोग डर गए, मगर बारह युवाओं ने स्वेच्छा से अपनी जगह छोड़ दी।

कमरे ने प्रतिक्रिया दी—स्वैच्छिक त्याग दर्ज। नया अस्थायी गुण: सीमा साझा करना। पंजीकृत निवासी कमरे की मुख्य सीमा से अधिकतम पचास मीटर दूर एक छोटी सुरक्षा रेखा बना सकता है।

कबीर ने बारह स्वयंसेवकों को छोटे सफेद चिह्न दिए। अब वे स्टेशन के प्रवेशों पर कमजोर अवरोध बना सकते थे। कमरा सच में इमारत नहीं, लोगों के संबंधों से बढ़ रहा था।

शाम को अस्पताल से टूटा संदेश आया। नैना का समूह अस्पताल पहुंच गया था, लेकिन निकासी वाहन नष्ट हो चुके थे। वहां दो सौ मरीज और कर्मचारी फंसे थे। उनकी मां, सुजाता, आईसीयू में थीं। रात्रि द्वार का दूसरा चरण छह घंटे में खुलने वाला था।

कबीर सीमा नहीं छोड़ सकता था। उसने स्क्रीन में सहायता विकल्प खोजे। स्तर चार के नीचे एक बंद क्षमता दिखाई दी—मार्ग-द्वार। स्थायी कमरे से जुड़े किसी पंजीकृत निवासी के स्थान पर तीन मिनट के लिए दूसरा दरवाजा खोला जा सकता था। आवश्यकता: कमरे के आधे निवासियों की स्वीकृति और कुल ऊर्जा का अस्सी प्रतिशत। असफल होने पर स्थापना रुक जाती।

अगर वह दरवाजा खोलता तो करण की सुरक्षा कमजोर होती और स्टेशन पर हमला आया तो सभी मर सकते थे। अगर नहीं खोलता तो अस्पताल के लोग निश्चित रूप से फंस जाते। कबीर ने निर्णय अकेले नहीं लिया। उसने कमरे के भीतर सबको सच बताया। मतदान हुआ। कुछ लोग विरोध में थे, लेकिन तारा सबसे पहले आगे आई। उसने कहा, “जब हम दुकान में थे तब भैया हमें छोड़ सकते थे। अगर उन्होंने तब हिसाब लगाया होता तो हम यहां नहीं होते।”

एक-एक करके हाथ उठे। पचास में से इकतालीस लोगों ने स्वीकृति दी।

कबीर ने मार्ग-द्वार सक्रिय किया। प्लेटफॉर्म की दीवार पर सफेद चौखट बनी। दूसरी ओर अस्पताल का अंधेरा गलियारा दिखाई दिया। नैना ने आश्चर्य से उसका नाम पुकारा। दरवाजा केवल तीन मिनट खुला था और आकार इतना छोटा कि एक समय में एक स्ट्रेचर निकल सकता था। दो सौ लोगों को निकालना असंभव था।

राघव ने अस्पताल की ऑक्सीजन ट्रॉलियां एक साथ बांधीं। विक्रम ने मरीजों को प्राथमिकता के क्रम में लगाया। शंभू ने पहियों पर तेल डाला। तीन मिनट में केवल छत्तीस लोग और सुजाता बाहर आ सके। नैना दूसरी ओर रह गई। कबीर चिल्लाया, लेकिन दरवाजा बंद हो गया।

स्क्रीन पर ऊर्जा दो प्रतिशत बची थी। स्थायी स्थापना डगमगाने लगी। उसी समय अस्पताल की दिशा में आसमान लाल हुआ। रात्रि द्वार खुल रहा था। नैना का अंतिम संदेश आया—हम बाकी लोगों को छोड़कर नहीं आएंगे। दूसरा रास्ता ढूंढ रहे हैं। मां को संभालना।

सुजाता बेहोश थीं। मीरा ने जांचकर कहा कि उन्हें लगातार ऑक्सीजन चाहिए। स्टेशन का पुराना बिजली तंत्र बंद था। कबीर ने कमरे की बची ऊर्जा से केवल पानी शुद्ध किया था; बिजली की क्षमता अभी नहीं मिली थी। राघव ने अपनी लौह त्वचा हटाकर सामान्य हाथों से जनरेटर ठीक करने की कोशिश की। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। शंभू के बिना वह मशीन नहीं समझ पा रहा था।

करण ने धीरे से कहा कि वह मदद कर सकता है। संक्रमण उसे काली नसों की कंपन सुनने देता था। जमीन के नीचे ऊर्जा बह रही थी। अगर उस ऊर्जा को जनरेटर तक मोड़ा जाए तो बिजली मिल सकती थी, मगर उसके लिए करण को कमरे से बाहर जाकर संक्रमित सुरंग छूनी पड़ती। स्थिरता हटते ही वह बदल सकता था।

कबीर ने मना किया। करण ने कहा, “आपने मुझे चुनने का मौका दिया था। अब मुझे भी चुनने दीजिए।”

कमरे की सबसे बड़ी कीमत ऊर्जा नहीं थी। वह यह स्वीकार करना था कि बचाए गए लोग हमेशा उसके आदेश में नहीं रहेंगे। वे अपने जोखिम स्वयं चुनेंगे।

कबीर ने करण को अस्थायी सीमा का चिह्न दिया। लड़का प्लेटफॉर्म के किनारे गया और काली नस पर हाथ रखा। उसकी बांह तुरंत काली होने लगी। सफेद चिह्न ने परिवर्तन धीमा किया। राघव ने केबल नस के पास रखी। काली ऊर्जा जनरेटर में दौड़ी और पूरा स्टेशन नीली रोशनी से भर गया। ऑक्सीजन मशीन चल पड़ी।

करण वापस कमरे में गिरा। संक्रमण अड़सठ प्रतिशत तक पहुंच चुका था, पर वह अभी भी स्वयं था। कमरे ने नया संदेश दिया—विपरीत ऊर्जा का सफल एकीकरण। स्थायी स्थापना में नया गुण जोड़ा गया: परिवर्तित ऊर्जा शोधन।

अब कमरे में संक्रमण को रोकने के साथ धीरे-धीरे साफ करने की क्षमता भी थी। करण की काली नसें पहली बार पीछे हटने लगीं।

लेकिन राहत कुछ सेकंड ही रही। सुरंगों में हजारों पैरों की आवाज गूंजी। लाल द्वार से निकला दूसरा स्तर का झुंड स्टेशन की ओर बढ़ रहा था। कमरे की ऊर्जा केवल पांच प्रतिशत थी और स्थापना पूरी होने में अभी चार घंटे बाकी थे। कबीर बाहर नहीं जा सकता था। नैना अस्पताल में फंसी थी। और जीव सीधे उसी स्थान की ओर आ रहे थे जिसे उसने बचाने के लिए चुना था।

विक्रम ने स्टेशन की रक्षा करने वालों को दोनों सुरंगों पर बांट दिया। पांच प्रतिशत ऊर्जा से मुख्य कमरा एक बड़ा हमला भी नहीं रोक सकता था। कबीर ने नक्शा देखा। प्लेटफॉर्म के ऊपर अधूरा मेट्रो निर्माण था, जहां से पुराने वेंटिलेशन शाफ्ट अस्पताल की दिशा तक जाते थे। इंसान उनमें नहीं चल सकते थे, लेकिन कमरे की सीमा शायद दीवार और जमीन की शर्तों से बंधी नहीं थी।

उसने सीमा साझा करने वाले बारह सफेद चिह्नों को एक पंक्ति में लगाया। हर स्वयंसेवक अगले व्यक्ति से पचास मीटर दूर खड़ा होता तो सुरक्षा रेखा स्टेशन से लगभग छह सौ मीटर बाहर पहुंच सकती थी। यह अस्पताल तक पर्याप्त नहीं था, पर निर्माण स्थल की संचार केबल तक पहुंच सकता था। कबीर ने अपनी शक्ति को कमरे की चार दीवारों की तरह नहीं, एक लंबी संकरी सुरंग की तरह कल्पना की। सफेद रोशनी स्वयंसेवकों के पैरों से जुड़ती गई।

सिस्टम ने चेतावनी दी—कमरे की स्वीकृत संरचना बदली जा रही है। सुरक्षा घनत्व घटेगा।

कबीर ने परिवर्तन स्वीकार किया। मुख्य कमरे की दीवार लगभग पारदर्शी हो गई, मगर सफेद रेखा सुरंग में आगे दौड़ी। निर्माण स्थल की केबल सक्रिय हुई और अस्पताल के रेडियो से संपर्क जुड़ गया। नैना की आवाज सुनाई दी। उसने बताया कि अस्पताल की छत पर अग्निशमन विभाग का पुराना हेलीकॉप्टर था। पायलट घायल था, लेकिन मशीन चल सकती थी। समस्या यह थी कि छत तक जाने वाली सीढ़ी संक्रमितों से भरी थी।

कबीर ने उसे वेंटिलेशन शाफ्ट का रास्ता बताया। शंभू को अस्पताल के रखरखाव नक्शे याद थे। वह नैना को रेडियो पर मोड़ बताता गया। राघव चुपचाप जनरेटर के पास बैठा सुन रहा था। आखिर उसने कबीर से कहा, “तुम यहां बंद हो, फिर भी बाहर के लोगों को चला रहे हो। मैं बाहर रहकर भी केवल खुद को देखता रहा।”

कबीर ने उत्तर दिया, “बदलना है तो अगली लड़ाई में दिखाना।”

लड़ाई उसी क्षण शुरू हो गई। सुरंग से पत्थर-खाल जीवों की पहली पंक्ति निकली। उनके पीछे एक लंबा जीव था जिसके सिर पर लाल सींग और हाथों में हड्डियों के हथौड़े थे। करण ने उसकी आवाज सुनी और बताया कि वही झुंड का मार्गदर्शक है। उसके मरते ही बाकी जीव कुछ समय के लिए दिशाहीन हो जाएंगे।

राघव ने आगे जाने की अनुमति मांगी। उसकी लौह-त्वचा पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी। कबीर ने उसे कमरे का अस्थायी चिह्न दिया, जिससे पचास मीटर दूर तक एक कमजोर परत उसकी रक्षा कर सकती थी। राघव ने पहली बार शक्ति को कवच नहीं, उधार मिली जिम्मेदारी समझकर पहना।

विक्रम और स्वयंसेवकों ने छोटे जीव रोके। राघव सींग वाले मार्गदर्शक तक पहुंचा, मगर उसके हथौड़े ने लौह-त्वचा तोड़ दी। वह घुटनों पर गिरा। पुराना राघव वहीं बाकी लोगों को अपनी ढाल बनाता। इस बार उसने मार्गदर्शक की कमर पकड़कर उसे मेट्रो पटरी पर रोके रखा और चिल्लाया, “अब!”

कबीर ने कमरे की लंबी सीमा एक क्षण के लिए पटरी पर मोड़ दी। सफेद दीवार चलती ट्रेन जैसी मार्गदर्शक से टकराई। वह राघव सहित पीछे फेंका गया। मीरा ने राघव को सीमा के भीतर खींच लिया, जबकि विक्रम ने लाल सींग पर वार किया। मार्गदर्शक मरा तो बाकी झुंड सचमुच रुक गया। कुछ जीव एक-दूसरे पर हमला करने लगे।

कमरे की ऊर्जा शून्य पर पहुंच गई। दीवार गायब हो गई। स्थापना की उलटी गिनती फिर भी चल रही थी, पर अब लोगों के सामने कोई सुरक्षा नहीं थी। कबीर ने सोचा सब खत्म हो गया। तभी तारा ने उसका हाथ पकड़ा। उसके बाद गोलू, मीरा, करण और बाकी निवासी एक-दूसरे का हाथ पकड़ते गए। साझा स्थिरता का हल्का प्रकाश उनकी हथेलियों में था।

सिस्टम ने पूछा—क्या निवासी अपनी निजी ऊर्जा स्वेच्छा से स्थायी कमरे को देंगे? योगदान के दौरान शक्तियां निष्क्रिय रहेंगी।

हर व्यक्ति के सामने हां और नहीं का विकल्प था। पहले बच्चों ने हां चुना, फिर घायलों ने, फिर वे लोग जिन्होंने सुबह अपनी जगह दूसरों के लिए छोड़ी थी। अंत में राघव ने भी हां दबाया। उसकी लौह त्वचा बुझ गई, मगर कमरे की दीवार फिर उठने लगी।

अब दीवार कबीर की ऊर्जा से नहीं, एक सौ सत्रह लोगों की इच्छा से खड़ी थी।

झुंड ने अंतिम हमला किया। हर टक्कर का दर्द सबमें बंटा। कोई पूरी तरह सुरक्षित नहीं था, लेकिन कोई अकेला भी नहीं था। लोग गिरते और फिर उठते रहे। करण ने परिवर्तित ऊर्जा खींचकर कमरे में भेजी। काली रोशनी सफेद होकर दीवार में जुड़ती गई। उलटी गिनती के अंतिम दस सेकंड में सीमा टूटने लगी। कबीर ने आंखें बंद करके केवल एक बात सोची—कमरा वह जगह नहीं जहां खतरा कभी न आए। कमरा वह जगह है जहां खतरा आने पर कोई अकेला न रह जाए।

गिनती शून्य हुई।

स्थायी कमरा स्थापित। आकार: दो सौ वर्ग मीटर। पंजीकृत निवासी सीमा: दो सौ। पानी शोधन सक्रिय। ऊर्जा शोधन सक्रिय। मार्ग-द्वार सक्रिय। नया विशेष गुण—चलती सीमा। निवासी सामूहिक स्वीकृति से स्थायी कमरे की बाहरी सीमा धीरे-धीरे विस्तारित कर सकते हैं।

पारदर्शी दीवार स्टेशन से बाहर फैल गई। उसने दोनों सुरंगों को पीछे धकेला, काली नसों को जलाया और बचे हुए जीवों को लाल धूल में बदल दिया। पहली बार शहर के अंधेरे में एक सफेद प्रकाश स्थायी रूप से जल उठा।

स्थायी कमरा बनते ही मार्ग-द्वार दोबारा उपलब्ध हुआ। इस बार चौखट छोटी नहीं थी। कबीर ने अस्पताल की छत को लक्ष्य बनाया। सफेद दरवाजा खुला और दूसरी ओर नैना हेलीकॉप्टर के पास खड़ी दिखाई दी। उसके पीछे मरीज, नर्स और शंभू थे। हेलीकॉप्टर का इंजन चल रहा था, मगर ईंधन कम था। उन्हें उड़ान भरने की आवश्यकता नहीं पड़ी। लोग सीधे दरवाजे से स्टेशन में आने लगे।

नैना सबसे अंत में आई। उसके कपड़ों पर काला खून था और हाथ घायल था। कबीर ने उसे गले लगाते हुए डांटा कि वह पीछे क्यों रही। नैना हंसी और बोली, “कमरा वाले भैया की बहन हूं। दरवाजा बंद होने से पहले सबको अंदर लाना पड़ता है।”

अस्पताल से एक सौ छियासी लोग आए। कमरे की सीमा दो सौ थी। फिर वही कठिन चुनाव सामने था। कबीर ने स्क्रीन देखी, लेकिन इस बार सिस्टम ने नया रास्ता दिखाया। चलती सीमा को बढ़ाने के लिए कमरे के बाहर सुरक्षित गलियारे और नए केंद्र बनाए जा सकते थे। हर केंद्र की स्थापना ऐसे व्यक्ति को करनी होगी जो अपनी शक्ति का एक हिस्सा स्थायी रूप से कमरे को दे।

राघव आगे आया। उसने अपनी लौह-त्वचा का आधा भाग कमरे को दिया। स्टेशन के प्रवेश पर धातु जैसी सफेद दीवार बन गई। मीरा ने उपचार शक्ति का हिस्सा दिया तो चिकित्सा क्षेत्र सक्रिय हुआ। करण ने अपने संक्रमण की परिवर्तित ऊर्जा दी और शोधन केंद्र बन गया। विक्रम ने कोई जादुई शक्ति नहीं चुनी थी, फिर भी सिस्टम ने उसकी अनुशासन क्षमता स्वीकार की और रक्षा नियंत्रण कक्ष खुल गया।

कमरा लोगों की शक्तियां छीन नहीं रहा था। वह उन्हें ऐसी जगह दे रहा था जहां एक व्यक्ति का लाभ सबका लाभ बन सके।

अगली सुबह लाल बारिश बंद हो गई। दूसरा चंद्रमा छोटा होने लगा। सात दिन का परीक्षण अभी समाप्त नहीं हुआ था, पर शहर में पहली सुरक्षित बस्ती जन्म ले चुकी थी। लोग मेट्रो स्टेशन की सफाई करने लगे। खाली डिब्बे रहने की जगह बने, टिकट कार्यालय भोजन भंडार और प्लेटफॉर्म का एक भाग स्कूल। तारा ने दरवाजे के ऊपर हाथ से लिखा बोर्ड लगाया—कबीर का कमरा।

कबीर ने बोर्ड बदल दिया। उसने “कबीर का” काटकर केवल “कमरा” रहने दिया।

तीसरे दिन दूसरे इलाकों से संदेश आने लगे। कहीं अग्नि शक्ति वाला नेता भोजन रोककर बैठा था, कहीं उपचार करने वालों को कैद किया गया था और कहीं लोगों ने छोटे सुरक्षित समूह बनाए थे। हर कोई मेट्रो स्टेशन के सफेद प्रकाश के बारे में पूछ रहा था। मार्ग-द्वार की दूरी सीमित थी, इसलिए कबीर सबको तुरंत नहीं ला सकता था। उसने चलती सीमा को गलियों में फैलाना शुरू किया। हर सौ मीटर पर नया केंद्र बनता और कोई व्यक्ति अपनी क्षमता का हिस्सा साझा करता।

राघव अब रक्षा दल का सबसे आगे चलने वाला सदस्य था, नेता नहीं। लोग उस पर तुरंत भरोसा नहीं करते थे और वह शिकायत नहीं करता था। शंभू निर्माण दल संभालता। नैना मार्ग-द्वार अभियानों की अगुवाई करती। मीरा और करण संक्रमण का उपचार खोजते। सुजाता स्वस्थ होने लगीं।

सातवें दिन सिस्टम ने अंतिम घोषणा की—पहला चरण समाप्त। जीवित मानव प्रतिशत: सत्रह। अगले चरण में सुरक्षित क्षेत्रों को आपस में प्रतिस्पर्धा करनी होगी। केवल दस क्षेत्र पृथ्वी के आधिकारिक नगर बनेंगे। असफल क्षेत्रों की सुरक्षा हट जाएगी।

लोगों में फिर भय फैल गया। दूसरे सुरक्षित क्षेत्रों के पास सेना, हथियार और उच्च श्रेणी शक्तियां थीं। उनके पास केवल एक पुराना मेट्रो स्टेशन और एफ श्रेणी का कमरा था।

कबीर की स्क्रीन पर निजी संदेश चमका—आपकी शक्ति का वास्तविक नाम उपलब्ध है।

उसने पढ़ा: सभ्यता-कक्ष। श्रेणी निर्धारित नहीं की जा सकती। यह शक्ति उपयोगकर्ता की ताकत से नहीं, उन लोगों की संख्या से बढ़ती है जो स्वेच्छा से एक-दूसरे की रक्षा चुनते हैं।

कबीर ने नाम बदलने से मना कर दिया। उसके लिए वह अब भी कमरा था। वही साधारण शब्द जिसे सुनकर लोग हंसे थे। वही तीन मीटर की जगह जो पहले केवल दस मिनट टिकती थी। फर्क केवल इतना था कि अब उसकी सीमा स्टेशन, गलियों और उन सभी लोगों से होकर गुजरती थी जिन्होंने किसी अजनबी के लिए दरवाजा खुला रखने का निर्णय लिया था।

दूर शहर के दूसरे छोर पर एक विशाल किला नीली आग में चमका। उसके नेता की स्क्रीन पर कबीर के क्षेत्र का नाम प्रकट हुआ। उसने अपने सैनिकों से कहा कि अगले चरण में सबसे पहले कमरे को नष्ट किया जाएगा, क्योंकि हथियारों से बने नगर खरीदे या जीते जा सकते थे, मगर विश्वास से बना नगर लोगों को विद्रोह करना सिखाता था।

मेट्रो स्टेशन के ऊपर कबीर ने सफेद सीमा को क्षितिज की ओर बढ़ते देखा। नैना ने पूछा, “अगली बार कितने लोगों को जगह देंगे?”

कबीर ने शहर में जलती हजारों सहायता रोशनियों की ओर देखा।

“जितने लोगों के लिए दरवाजा खोल सकें,” उसने कहा। “और फिर कमरे को थोड़ा और बड़ा कर देंगे।”

सफेद रेखा आगे बढ़ी। उसके पीछे बच्चे हंस रहे थे, घायल सुरक्षित सांस ले रहे थे और वे लोग दीवारें बना रहे थे जिन्हें कभी कमजोर कहकर बाहर छोड़ दिया गया था। प्रलय ने दुनिया को छोटे-छोटे समूहों में तोड़ दिया था। कबीर की सबसे कमजोर शक्ति उन्हें फिर से जोड़ रही थी।

पहली रात उसे केवल तीन मीटर का कमरा मिला था। सातवें दिन वही कमरा एक शहर बनने की राह पर था।

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