नीलकंठ महल की आखिरी दुल्हन Ch. 2

नीलकंठ महल की आखिरी दुल्हन - Chapter 2

Posted by Amit Rajput • Aug 13, 2026 09:18 PM

नीलकंठ महल के सारे दरवाजे एक साथ बंद होते ही पूरा गलियारा अंधेरे में डूब गया।

अदिति की सांसें तेज हो गईं।

उसने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की, लेकिन वीर ने तुरंत उसका हाथ रोक लिया।

“मैंने कहा था पीछे मत देखना।”

“लेकिन वहाँ कोई है!”

“मुझे पता है।”

“तो फिर आप उसे रोक क्यों नहीं रहे?”

वीर कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि जो यहाँ है, उसे रोकना मेरे बस में नहीं है।”

अदिति ने उसका हाथ छुड़ा लिया।

“मुझे पहेलियों में जवाब नहीं चाहिए। मुझे सच चाहिए।”

अंधेरे में वीर की आवाज आई—

“सच तुम्हें मिल जाएगा।”

“कब?”

“जब तुम उसे सहने के लिए तैयार होगी।”

अचानक गलियारे के दूसरे छोर पर एक नीली लौ जल उठी।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

एक-एक करके पूरा गलियारा नीली रोशनी से भर गया।

अदिति ने सामने देखा।

कुछ कदम दूर एक विशाल दरवाजा था।

उस दरवाजे पर वही निशान बना था जो उसने निमंत्रण पर देखा था।

नीलकंठ पक्षी।

वीर उस दरवाजे की ओर बढ़ा।

“मेरे साथ आओ।”

अदिति ने पूछा—

“उसके पीछे क्या है?”

वीर ने दरवाजे पर हाथ रखा।

“तुम्हारे सारे सवाल।”

दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

---

कमरे के भीतर धूल की मोटी परत थी।

दीवारों पर पुराने चित्र और लकड़ी की अलमारियां थीं।

बीच में एक बड़ी मेज रखी थी।

उस पर दर्जनों पुरानी किताबें थीं।

अदिति ने एक किताब उठाई।

उसके पहले पन्ने पर लिखा था—

“नीलकंठ वंश की दास्तान।”

उसने किताब खोली।

पहले कुछ पन्नों पर परिवार की पीढ़ियों के नाम लिखे थे।

फिर एक जगह आकर उसके हाथ रुक गए।

एक नाम के सामने लाल निशान बना था।

“मृणालिनी नीलकंठ।”

अदिति ने पूछा—

“यह कौन थी?”

वीर ने जवाब नहीं दिया।

अदिति ने किताब उसकी ओर कर दी।

“मैंने पूछा यह कौन थी?”

वीर ने कुछ क्षण किताब को देखा।

फिर बोला—

“मेरी परदादी।”

अदिति ने अगला पन्ना पलटा।

वहाँ एक तस्वीर थी।

मृणालिनी नीलकंठ के साथ एक युवक खड़ा था।

लेकिन तस्वीर के दूसरे व्यक्ति का चेहरा काला कर दिया गया था।

अदिति ने पूछा—

“इसका चेहरा क्यों मिटाया गया?”

वीर ने कहा—

“क्योंकि उसका नाम लेना मना है।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह इस महल का सबसे बड़ा रहस्य है।”

अदिति की जिज्ञासा और बढ़ गई।

“नाम क्या था?”

वीर चुप रहा।

अदिति ने किताब बंद कर दी।

“अगर आप मुझे सच नहीं बताएंगे तो मैं खुद ढूंढ लूंगी।”

वह कमरे से बाहर जाने लगी।

वीर ने उसका रास्ता नहीं रोका।

बस इतना कहा—

“उसका नाम था... अर्णव।”

अदिति रुक गई।

“अर्णव?”

वीर ने सिर हिलाया।

“और वह इस परिवार का हिस्सा नहीं था।”

“फिर कौन था?”

वीर ने उसकी ओर देखा।

“मृणालिनी का प्रेम।”

अदिति के चेहरे पर हैरानी आ गई।

“तो इसमें इतना बड़ा रहस्य क्या है?”

वीर ने धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि अर्णव की मौत शादी की रात हुई थी।”

कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई।

अदिति ने पूछा—

“कैसे?”

वीर ने जवाब देने के बजाय एक दूसरी किताब उठाई।

उसमें केवल एक पन्ना था।

उस पर लिखा था—

“जिस रात दुल्हन ने महल छोड़ा, उसी रात अर्णव गायब हो गया।”

अदिति ने कहा—

“गायब?”

“उसका शरीर कभी नहीं मिला।”

“तो शायद वह मरा नहीं था।”

वीर ने उसकी ओर देखा।

“यही तो डर है।”

---

अचानक कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

ठक... ठक... ठक...

अदिति और वीर दोनों चुप हो गए।

कदमों की आवाज दरवाजे के बाहर आकर रुक गई।

फिर एक धीमी आवाज आई—

“वीर...”

अदिति ने वीर की तरफ देखा।

“कौन है?”

वीर ने होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने का इशारा किया।

आवाज फिर आई—

“वीर... दरवाजा खोलो।”

वीर का चेहरा अचानक कठोर हो गया।

अदिति ने फुसफुसाकर पूछा—

“कौन है?”

वीर ने बहुत धीमे कहा—

“मेरी माँ।”

अदिति चौंक गई।

“तो दरवाजा खोलिए।”

“मेरी माँ तीन साल पहले मर चुकी हैं।”

अदिति के चेहरे का रंग उड़ गया।

बाहर से फिर आवाज आई—

“वीर... मैं तुम्हें लेने आई हूँ।”

दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

वीर ने अदिति को पीछे हटने का इशारा किया।

“किसी भी हालत में आवाज मत करना।”

अदिति ने सिर हिला दिया।

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

फिर बाहर से कदमों की आवाज दूर जाने लगी।

वीर ने राहत की सांस ली।

लेकिन तभी अदिति की नजर कमरे की दूसरी दीवार पर पड़ी।

वहाँ एक पुराना आईना लगा था।

आईने में वीर दिखाई दे रहा था।

अदिति भी दिखाई दे रही थी।

लेकिन उनके बीच...

एक तीसरी लड़की खड़ी थी।

लाल शादी के जोड़े में।

अदिति का दिल जोर से धड़क उठा।

उसने तुरंत पीछे देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

फिर आईने की तरफ देखा।

लड़की अभी भी वहाँ थी।

उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

और आईने के अंदर से अदिति को देखकर मुस्कुराई।

अदिति पीछे हट गई।

“वीर!”

वीर ने आईने की तरफ देखा।

उसका चेहरा बदल गया।

“यह संभव नहीं है।”

“कौन है यह?”

वीर कुछ नहीं बोला।

आईने में लड़की ने अपना हाथ उठाया।

उसकी उंगली अदिति की तरफ थी।

फिर उसने अपने होंठ हिलाए।

आवाज आईने से बाहर नहीं आई।

लेकिन अदिति ने उसके होंठ पढ़ लिए।

“मुझे बचाओ।”

अदिति के कदम अपने आप आईने की तरफ बढ़े।

वीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं!”

“वह मदद मांग रही है।”

“वह तुम्हें बुला रही है।”

“तो?”

“और अगर तुम उसके पास गईं तो शायद वापस नहीं आओगी।”

अदिति रुक गई।

आईने में लड़की का चेहरा अचानक बदलने लगा।

अब वह मुस्कुरा नहीं रही थी।

उसकी आंखों में डर था।

उसने फिर कुछ कहा।

इस बार अदिति ने साफ देखा—

“वह झूठ बोल रहा है।”

अदिति ने तुरंत वीर की ओर देखा।

वीर का चेहरा शांत था।

बहुत शांत।

“आपने मुझसे क्या छिपाया है?”

वीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

अदिति ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

“आप जानते हैं यह लड़की कौन है।”

वीर चुप रहा।

“वीर!”

उसने आखिरकार कहा—

“हाँ।”

“कौन है?”

वीर ने आईने की तरफ देखा।

“वही जिसे तुमने सौ साल पहले खोया था।”

अदिति के भीतर जैसे कुछ टूट गया।

“मैंने?”

“हाँ।”

“लेकिन मैं तो कभी यहाँ आई ही नहीं।”

वीर ने धीमे स्वर में कहा—

“तुम्हें याद नहीं।”

अदिति ने सिर हिलाया।

“मुझे कुछ याद नहीं।”

“यही श्राप है।”

---

रात और गहरी हो चुकी थी।

अदिति को महल के एक कमरे में ठहराया गया।

कमरे में एक बड़ी खिड़की थी, लेकिन बाहर सिर्फ घना अंधेरा दिखाई दे रहा था।

वह बिस्तर पर बैठी थी और दिनभर की घटनाओं के बारे में सोच रही थी।

नीलकंठ महल।

वीर।

सौ साल पुरानी तस्वीर।

आईने वाली लड़की।

और वह रहस्यमयी हार।

उसने हार हाथ में लिया।

जैसे ही उसकी उंगलियां नीले पत्थर पर पड़ीं, कमरे की हवा ठंडी हो गई।

दीवार पर एक हल्की चमक दिखाई दी।

अदिति उठकर उसके पास गई।

दीवार पर धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे।

“पहली रात...”

फिर दूसरा वाक्य—

“जब दुल्हन को अपने पिछले जन्म की पहली याद आएगी, तब महल का पहला दरवाजा खुलेगा।”

अदिति पीछे हट गई।

तभी कमरे का दरवाजा अपने आप खुल गया।

बाहर गलियारा खाली था।

लेकिन फर्श पर एक लाल रिबन पड़ा था।

अदिति ने उसे उठाया।

रिबन पर एक नाम कढ़ा हुआ था—

मृणालिनी।

अचानक उसके सिर में तेज दर्द उठा।

और फिर उसे एक दृश्य दिखाई दिया।

एक लड़की महल की बालकनी में खड़ी थी।

वह रो रही थी।

उसके सामने एक युवक था।

अर्णव।

वह कह रहा था—

“मृणालिनी, मेरे साथ चलो।”

लड़की ने सिर हिलाया।

“मैं नहीं जा सकती।”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्होंने मुझे वचन दिया है।”

“किस बात का?”

लड़की ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

“अगर मैं महल छोड़ दूंगी तो किसी एक की जान जाएगी।”

अर्णव ने पूछा—

“किसकी?”

मृणालिनी ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हारी।”

दृश्य अचानक टूट गया।

अदिति ने आंखें खोल दीं।

वह जमीन पर बैठी थी।

दरवाजे के बाहर वीर खड़ा था।

उसने पूछा—

“तुमने क्या देखा?”

अदिति ने उसकी ओर देखा।

“मृणालिनी और अर्णव।”

वीर चुप हो गया।

“उन्होंने क्या वादा किया था?”

वीर ने नजरें झुका लीं।

“मुझे नहीं पता।”

“झूठ।”

अदिति की आवाज पहली बार इतनी कठोर थी।

“तुम सब जानते हो।”

वीर कुछ क्षण उसे देखता रहा।

फिर उसने कहा—

“ठीक है।”

वह कमरे में आया और दरवाजा बंद कर दिया।

“मैं तुम्हें सच बताऊंगा।”

अदिति शांत हो गई।

वीर उसके सामने खड़ा था।

“सौ साल पहले मृणालिनी की शादी अर्णव से नहीं, किसी और से तय हुई थी।”

“किससे?”

वीर ने जवाब दिया—

“नीलकंठ परिवार के वारिस से।”

अदिति ने धीरे से पूछा—

“और वह वारिस कौन था?”

वीर की आंखें अदिति पर टिक गईं।

“अर्णव नहीं।”

कुछ पल का सन्नाटा।

फिर वीर ने कहा—

“वह मैं था।”

अदिति स्तब्ध रह गई।

“क्या?”

वीर ने धीमे स्वर में कहा—

“जिस व्यक्ति को तुम आज वीर नीलकंठ के नाम से जानती हो... उसका चेहरा नया है।”

अदिति समझ नहीं पाई।

“क्या मतलब?”

वीर ने कहा—

“लेकिन आत्मा वही है।”

अदिति की धड़कन रुक-सी गई।

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

वीर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

“मैं वही हूँ... जिसने सौ साल पहले तुम्हें खोया था।”

अदिति के हाथ से नीला हार नीचे गिर गया।

उसी पल महल के अंदर कहीं एक विशाल घंटी बजी।

टन...

एक बार।

फिर दूसरी बार।

और तीसरी बार।

वीर ने घबराकर दरवाजे की तरफ देखा।

“यह घंटी नहीं बजनी चाहिए थी।”

अदिति ने पूछा—

“क्यों?”

वीर ने दरवाजा खोला।

गलियारे के अंत में एक विशाल पत्थर का दरवाजा धीरे-धीरे खुल रहा था।

उसके पीछे गहरा अंधेरा था।

और अंधेरे से किसी लड़की की आवाज आई—

“अदिति... अगर तुम सच जानना चाहती हो, तो अकेली अंदर आओ।”

वीर ने अदिति का हाथ पकड़ लिया।

“तुम कहीं नहीं जाओगी।”

लेकिन अदिति की नजर उस अंधेरे दरवाजे पर टिकी थी।

क्योंकि वहाँ से वही आवाज फिर आई—

“वीर पर भरोसा मत करना...”

और इस बार आवाज सुनते ही वीर का चेहरा बदल गया।

अदिति ने पहली बार उसकी आंखों में साफ डर देखा।

क्योंकि वह आवाज किसकी थी—यह वीर जानता था।

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