नीलकंठ महल की आखिरी दुल्हन - Chapter 3
नीलकंठ महल की घंटी की आखिरी गूंज अभी तक गलियारों में तैर रही थी।
अदिति उस विशाल पत्थर के दरवाजे को देख रही थी, जो कुछ ही क्षण पहले अपने आप खुला था।
उसके पीछे घना अंधेरा था।
इतना गहरा कि नीली मशालों की रोशनी भी उसके भीतर कुछ कदम से आगे नहीं जा पा रही थी।
और उसी अंधेरे से आवाज आई थी—
“वीर पर भरोसा मत करना...”
अदिति ने धीरे से वीर की तरफ देखा।
वीर का चेहरा बिल्कुल बदल चुका था।
उसकी आंखों में वह शांत भाव नहीं था, जो अब तक दिखाई देता था।
वहाँ डर था।
सच्चा डर।
अदिति ने पूछा—
“यह आवाज किसकी थी?”
वीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
“वीर।”
“मुझे नहीं पता।”
“आप झूठ बोल रहे हैं।”
वीर ने उसकी तरफ देखा।
“अगर मैं झूठ बोल रहा होता, तो तुम्हें इस दरवाजे से दूर रहने को कहता।”
अदिति ने पूछा—
“तो फिर?”
वीर ने कुछ क्षण अंधेरे को देखा।
“यह दरवाजा सौ साल से बंद था।”
“और अब खुल गया।”
“हाँ।”
“क्यों?”
वीर ने धीमे स्वर में कहा—
“क्योंकि तुम यहाँ आई हो।”
अदिति ने दरवाजे की ओर देखा।
“उस आवाज ने मेरा नाम लिया।”
वीर ने सिर हिलाया।
“यही सबसे बड़ी समस्या है।”
अचानक अंधेरे के भीतर से हवा का तेज झोंका आया।
दीवार पर लगी मशालें एक साथ बुझ गईं।
अदिति पीछे हट गई।
लेकिन वीर ने तुरंत एक मशाल जला दी।
“हमें यहाँ से जाना होगा।”
“नहीं।”
अदिति ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा—
“मैं इतने दूर सिर्फ सवालों के जवाब पाने आई हूँ।”
“और अगर जवाब तुम्हारी जिंदगी बदल दे?”
“तो बदलने दीजिए।”
वीर कुछ क्षण उसे देखता रहा।
फिर उसने कहा—
“ठीक है। लेकिन एक बात याद रखना—जो कुछ भी इस कमरे में दिखाई दे, उसे सच मत मान लेना।”
अदिति ने पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि यह कमरा यादें दिखाता है।”
“और यादें झूठी भी हो सकती हैं?”
वीर ने दरवाजे के भीतर कदम रखते हुए कहा—
“कभी-कभी यादें सच से भी ज्यादा खतरनाक होती हैं।”
अदिति उसके पीछे अंदर चली गई।
---
अंदर की हवा बेहद ठंडी थी।
दीवारें पत्थर की थीं।
फर्श पर पुराने चिन्ह बने हुए थे।
हर कुछ कदम पर दीवार में छोटी-छोटी नीली रोशनियां जल रही थीं।
अदिति ने देखा कि उन रोशनियों के भीतर छोटे-छोटे दृश्य दिखाई दे रहे थे।
कहीं एक महल का आंगन।
कहीं शादी की तैयारी।
कहीं रोती हुई एक लड़की।
और कहीं एक युवक अकेला खड़ा था।
अदिति अचानक रुक गई।
“यह वही है।”
वीर ने पूछा—
“क्या?”
“वही लड़की।”
दीवार की रोशनी में एक युवती दिखाई दे रही थी।
लाल शादी का जोड़ा।
गले में वही नीला हार।
चेहरा अदिति जैसा।
वह किसी कमरे में बंद थी।
उसके सामने एक वृद्ध व्यक्ति खड़ा था।
वृद्ध ने कहा—
“अगर तुमने महल छोड़ा, तो नीलकंठ वंश समाप्त हो जाएगा।”
लड़की ने जवाब दिया—
“मुझे इस श्राप से कोई मतलब नहीं।”
वृद्ध ने कहा—
“तुम्हें होना पड़ेगा।”
दृश्य धुंधला हो गया।
अदिति ने वीर की तरफ देखा।
“वह कौन था?”
“मेरे पूर्वज।”
“और वह लड़की?”
वीर चुप रहा।
अदिति ने उसकी तरफ देखा।
“तुम जानते हो।”
“हाँ।”
“कौन थी?”
वीर ने धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हारी पिछली जिंदगी।”
अदिति कुछ क्षण बिल्कुल शांत रही।
उसे नहीं पता था कि इस बात पर विश्वास करे या नहीं।
लेकिन तभी उसके हाथ में पकड़ा नीला हार गर्म होने लगा।
दीवार पर एक नया दृश्य उभर आया।
इस बार एक युवक दिखाई दिया।
वह अर्णव था।
वह महल के एक कमरे में किसी पुरानी किताब को पढ़ रहा था।
उसके पीछे वही वृद्ध खड़ा था।
वृद्ध ने कहा—
“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”
अर्णव ने जवाब दिया—
“मृणालिनी को जबरदस्ती शादी के लिए मजबूर किया जा रहा है।”
वृद्ध ने कहा—
“यह परिवार का निर्णय है।”
“परिवार का निर्णय किसी की जिंदगी तय नहीं कर सकता।”
वृद्ध ने गुस्से में कहा—
“तुम समझते नहीं। वह लड़की इस महल की चाबी है।”
अर्णव चौंका।
“किस चीज की चाबी?”
वृद्ध ने कोई जवाब नहीं दिया।
दृश्य अचानक समाप्त हो गया।
अदिति ने वीर की तरफ देखा।
“मृणालिनी को चाबी क्यों कहा गया?”
वीर ने कहा—
“मुझे नहीं पता।”
“फिर हमें पता लगाना होगा।”
दोनों आगे बढ़े।
कुछ दूरी पर एक गोलाकार कमरा था।
उसके बीच में पत्थर का एक चबूतरा बना था।
चबूतरे के ऊपर एक बंद संदूक रखा था।
संदूक पर वही नीलकंठ का निशान था।
वीर उसे देखकर रुक गया।
“यह यहाँ कैसे?”
अदिति ने पूछा—
“क्या हुआ?”
“यह संदूक मेरे दादा के कमरे में होना चाहिए था।”
“तो यहाँ क्यों है?”
वीर ने संदूक को ध्यान से देखा।
उस पर एक छोटा-सा ताला लगा था।
अदिति ने कहा—
“इसे खोलिए।”
“चाबी नहीं है।”
अदिति ने अपने गले से नीला हार उतारा।
हार के पीछे एक छोटा धातु का टुकड़ा लगा था।
उसने उसे ताले के पास रखा।
टक।
ताला खुल गया।
वीर ने हैरानी से अदिति की तरफ देखा।
“यह संभव नहीं है।”
अदिति ने संदूक खोला।
अंदर तीन चीजें थीं—
एक पुरानी डायरी।
एक चांदी की अंगूठी।
और एक मुड़ा हुआ पत्र।
अदिति ने सबसे पहले पत्र उठाया।
उस पर लिखा था—
“उसके लिए, जो एक दिन वापस आएगी।”
अदिति के हाथ कांप गए।
उसने पत्र खोला।
अंदर लिखा था—
“अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ में है, तो इसका मतलब है कि नीलकंठ महल ने तुम्हें फिर बुला लिया है।
तुम्हें यह याद रखना होगा कि पिछली बार तुम्हारी सबसे बड़ी गलती किसी पर भरोसा करना नहीं थी।
तुम्हारी सबसे बड़ी गलती थी—
सच पर विश्वास न करना।
महल का श्राप किसी दुल्हन की मौत से नहीं जुड़ा।
यह एक अधूरे वचन से जुड़ा है।
जिस दिन वह वचन पूरा होगा, नीलकंठ महल का रहस्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
लेकिन उस वचन को पूरा करने के लिए दो लोगों को एक ही सच स्वीकार करना होगा।
एक—जो लौटकर आई है।
दूसरा—जो अब भी उसका इंतजार कर रहा है।”
पत्र यहीं खत्म हो गया।
अदिति ने धीरे से वीर की तरफ देखा।
“यह किसने लिखा?”
वीर ने पत्र अपने हाथ में लिया।
उसकी नजर आखिरी पंक्ति पर टिक गई।
“अर्णव।”
“तुम्हें कैसे पता?”
वीर ने पत्र के नीचे बने एक छोटे निशान की तरफ इशारा किया।
“यह उसकी पहचान थी।”
अदिति ने पूछा—
“अगर अर्णव ने यह लिखा था, तो वह कहाँ गया?”
वीर ने जवाब नहीं दिया।
अचानक डायरी अपने आप खुल गई।
पन्ने तेजी से पलटने लगे।
एक पन्ने पर आकर रुक गए।
उस पर सिर्फ एक तारीख थी—
14 अगस्त 1926
और नीचे लिखा था—
“आज दुल्हन को सच्चाई बताई जाएगी।”
अदिति ने तारीख पढ़ते ही अजीब बेचैनी महसूस की।
उसी समय कमरे की दीवार पर एक दरवाजा दिखाई दिया।
वीर ने उसे देखा।
“यह यहाँ पहले नहीं था।”
दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।
अंदर से किसी के चलने की आवाज आई।
ठक... ठक... ठक...
अदिति ने फुसफुसाकर पूछा—
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर एक लड़की की आवाज आई—
“अदिति...”
अदिति का चेहरा बदल गया।
“फिर वही आवाज।”
वीर ने उसे रोकना चाहा।
लेकिन इस बार अदिति पीछे नहीं हटी।
वह दरवाजे के भीतर चली गई।
वीर उसके पीछे था।
कमरे के बीच में एक पुराना आईना रखा था।
आईने में अदिति अकेली दिखाई दे रही थी।
वीर दिखाई नहीं दे रहा था।
अदिति ने धीरे से पूछा—
“आप इसमें दिखाई क्यों नहीं दे रहे?”
वीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
आईने में अदिति की परछाईं ने अपना हाथ उठाया।
लेकिन असली अदिति ने हाथ नहीं उठाया था।
परछाईं ने अपने पीछे इशारा किया।
वहाँ एक बंद दरवाजा था।
फिर उसने दीवार पर कुछ लिखना शुरू किया।
अक्षर धीरे-धीरे उभरे—
“जिसे तुम वीर समझ रही हो, वह पूरा सच नहीं है।”
अदिति ने तुरंत पीछे देखा।
वीर वहीं खड़ा था।
“तुम मुझसे क्या छिपा रहे हो?”
वीर ने आंखें बंद कर लीं।
“मैंने कहा था, यहाँ दिखाई देने वाली हर चीज सच नहीं होती।”
“लेकिन कुछ चीजें सच होती हैं।”
वीर ने सिर उठाया।
“हाँ।”
“तो बताओ।”
लंबी खामोशी के बाद वीर बोला—
“मैं अर्णव नहीं हूँ।”
अदिति चौंक गई।
“लेकिन तुमने कहा था—”
“मैंने कहा था कि मेरी आत्मा उस व्यक्ति से जुड़ी है।”
“इसका मतलब?”
“मुझे पूरी यादें नहीं हैं। मुझे सिर्फ टुकड़े-टुकड़े याद हैं।”
अदिति शांत हो गई।
वीर ने कहा—
“मुझे इतना याद है कि सौ साल पहले इस महल में कुछ हुआ था।”
“क्या?”
“एक आग।”
अदिति की आंखें फैल गईं।
“और उस आग के बाद...”
वीर रुक गया।
“क्या?”
“अर्णव गायब हो गया।”
“और मृणालिनी?”
वीर ने उसकी तरफ देखा।
“वह भी।”
अचानक कमरे के बाहर जोरदार आवाज हुई।
धड़ाम!
दोनों बाहर आए।
गलियारे में दीवार पर लगी सभी तस्वीरें जमीन पर गिर चुकी थीं।
सिर्फ एक तस्वीर दीवार पर बची थी।
अदिति उसके पास गई।
तस्वीर में मृणालिनी खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसके साथ कोई युवक नहीं था।
उसके पीछे एक छोटा बच्चा खड़ा था।
अदिति ने ध्यान से देखा।
बच्चे के हाथ में वही नीला हार था।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
“रहस्य की शुरुआत यहीं से हुई।”
अदिति ने वीर की तरफ देखा।
“यह बच्चा कौन है?”
वीर कुछ कह पाता, उससे पहले पीछे से किसी वृद्ध व्यक्ति की आवाज आई—
“वह बच्चा... नीलकंठ परिवार का आखिरी वारिस था।”
दोनों ने पीछे देखा।
एक वृद्ध व्यक्ति गलियारे में खड़ा था।
उसके हाथ में पुरानी चांदी की छड़ी थी।
अदिति ने उसे पहचान लिया।
वही व्यक्ति जिसने उसके घर पर निमंत्रण दिया था।
वृद्ध ने आगे बढ़ते हुए कहा—
“और अगर तुम सच जानना चाहती हो, अदिति...”
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला—
“तो तुम्हें उस बच्चे को ढूंढना होगा।”
अदिति ने पूछा—
“वह अब कहाँ है?”
वृद्ध के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान आई।
“यही तो नीलकंठ महल का सबसे बड़ा रहस्य है।”
और तभी महल की सारी घड़ियां एक साथ बज उठीं।
बारह बार।
वृद्ध ने घड़ी की तरफ देखा।
“बहुत देर हो चुकी है।”
अदिति ने पूछा—
“किसके लिए?”
वृद्ध ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे लिए।”
उसी पल महल के मुख्य दरवाजे के बाहर किसी वाहन के रुकने की आवाज आई।
वीर ने खिड़की से बाहर देखा।
उसका चेहरा गंभीर हो गया।
अदिति ने पूछा—
“कौन आया है?”
वीर ने धीरे से कहा—
“जिसका नाम इस महल में पिछले सौ सालों से लेने पर पाबंदी है।”
अदिति ने पूछा—
“कौन?”
वीर ने खिड़की से नजर हटाई।
और पहली बार उसके चेहरे पर साफ घबराहट दिखाई दी।
“अर्णव।”
दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक... ठक... ठक...
और बाहर से एक आवाज आई—
“वीर... अब समय आ गया है कि तुम उसे पूरा सच बता दो।”
✨ अगर हमारी कहानी ने आपके दिल को छुआ है, आपको रोमांच, प्यार और रहस्य की इस दुनिया में मज़ा आया है, तो हमारे चैनल को अभी Follow करें! ❤️
📚 हर नए पार्ट का सबसे पहले नोटिफिकेशन पाने के लिए Follow करना न भूलें।
💖 अपने दोस्तों और परिवार के साथ इस कहानी को Share करें, ताकि वे भी इस शानदार सफर का हिस्सा बन सकें।
💬 कमेंट करके ज़रूर बताइए कि आपको हमारी कहानी कैसी लगी, आपका पसंदीदा किरदार कौन है, और आगे की कहानी में आप क्या देखना चाहते हैं।
🌟 आपका एक Follow, एक Share और एक Comment हमें और भी बेहतरीन कहानियाँ लिखने की प्रेरणा देता है।
🙏 धन्यवाद! अगले रोमांचक भाग में फिर मिलेंगे... ✨📖❤️