नीलकंठ महल की आखिरी दुल्हन - Chapter 1
रात के ठीक बारह बज रहे थे।
शहर की ज्यादातर खिड़कियों में अंधेरा उतर चुका था। सड़क पर कभी-कभार गुजरती किसी गाड़ी की रोशनी कमरे की दीवार पर कुछ पल के लिए चमकती और फिर सब कुछ पहले जैसा शांत हो जाता।
लेकिन अदिति के कमरे में आज नींद का नामोनिशान नहीं था।
वह अपनी मेज पर बैठी एक पुरानी किताब पढ़ रही थी।
अचानक—
टक... टक... टक...
खिड़की पर दस्तक हुई।
अदिति ने किताब से नजर उठाई।
“इतनी रात को?”
वह धीरे-धीरे खिड़की के पास गई।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ ठंडी हवा और दूर तक फैली खामोशी।
उसने खिड़की बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसकी नजर नीचे पड़ी।
खिड़की की चौखट पर एक काला लिफाफा रखा था।
अदिति कुछ पल उसे देखती रही।
उसने लिफाफा उठाया।
उस पर उसका नाम लिखा था—
“अदिति”
लेकिन लिखावट अजीब थी।
स्याही काली नहीं, गहरे नीले रंग की थी।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि लिफाफे पर भेजने वाले का कोई नाम या पता नहीं था।
अदिति ने लिफाफा खोला।
अंदर एक मोटा, पुराना कागज था।
उस पर केवल कुछ शब्द लिखे थे—
“नीलकंठ महल में आपका स्वागत है।”
नीचे तारीख थी।
और उसके ठीक नीचे—
“आपकी शादी वीर नीलकंठ के साथ तय हो चुकी है।”
अदिति के हाथ से कागज लगभग छूट गया।
“क्या...?”
वह दोबारा पढ़ने लगी।
शब्द वही थे।
उसकी शादी?
वीर नीलकंठ?
कौन था वह?
अदिति ने तुरंत फोन उठाया और अपनी सबसे करीबी दोस्त सिया को कॉल किया।
पहली घंटी...
दूसरी...
तीसरी...
कोई जवाब नहीं।
“सिया फोन क्यों नहीं उठा रही?”
अदिति ने फोन मेज पर रखा।
तभी उसकी नजर निमंत्रण के पीछे पड़ी।
वहाँ एक छोटी-सी तस्वीर लगी थी।
एक विशाल महल।
काले पत्थरों से बना हुआ।
ऊंची दीवारें।
महल के चारों ओर घना जंगल।
और सबसे ऊपर एक नीले रंग का निशान बना था।
एक पक्षी जैसा।
उसके नीचे लिखा था—
नीलकंठ।
अदिति के भीतर अचानक अजीब बेचैनी उठी।
उसे लगा जैसे उसने यह महल पहले कभी देखा है।
लेकिन कहाँ?
उसे याद नहीं आया।
उसने तस्वीर को पलटकर देखा।
पीछे एक और वाक्य लिखा था—
“इस बार तुम्हें वापस आना ही होगा।”
अदिति का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“इस बार?”
उसने खुद से पूछा।
“मैं यहाँ पहले कब आई थी?”
अचानक कमरे की लाइट बंद हो गई।
अदिति चौंक गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।
रोशनी दीवार पर पड़ी।
और फिर उसकी सांस जैसे रुक गई।
दीवार पर एक परछाईं थी।
एक लड़की की।
लंबे बाल।
सिर पर घूंघट।
और गले में कोई पुराना हार।
अदिति ने तुरंत पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसने दोबारा दीवार की तरफ देखा।
परछाईं गायब थी।
अदिति कुछ क्षण वहीं खड़ी रही।
फिर उसने खुद को समझाया—
“शायद मेरा भ्रम है।”
लेकिन उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे।
---
अगली सुबह अदिति ने वह निमंत्रण अपनी माँ को दिखाया।
माँ ने जैसे ही कागज देखा, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
“तुम्हें यह कहाँ मिला?”
अदिति ने हैरानी से पूछा—
“खिड़की पर रखा था। आप जानती हैं इस परिवार को?”
माँ कुछ देर चुप रहीं।
फिर उन्होंने कागज उसके हाथ से लेकर तुरंत फाड़ने की कोशिश की।
“इसे फेंक दो।”
“लेकिन क्यों?”
“मैंने कहा इसे फेंक दो!”
अदिति ने पहली बार अपनी माँ की आवाज में इतना डर सुना था।
“माँ, वीर नीलकंठ कौन है?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
“और नीलकंठ महल कहाँ है?”
माँ की आंखों में अचानक आंसू आ गए।
“उस जगह का नाम दोबारा मत लेना।”
“क्यों?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि वहाँ से कोई दुल्हन वापस नहीं आती।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अदिति कुछ बोल नहीं पाई।
कुछ सेकंड बाद उसने धीरे से पूछा—
“आपको कैसे पता?”
माँ ने नजरें झुका लीं।
“बस इतना समझ लो कि तुम्हारा उस परिवार से कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए।”
“लेकिन मेरा नाम उस निमंत्रण में क्यों है?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
“माँ!”
तभी बाहर दरवाजे की घंटी बजी।
माँ चौंक गईं।
अदिति दरवाजे की तरफ बढ़ी।
लेकिन माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत खोलना।”
“क्यों?”
“क्योंकि शायद वही लोग आए हैं।”
अदिति का दिल तेज हो गया।
घंटी फिर बजी।
ट्रिन... ट्रिन...
माँ ने धीरे से कहा—
“अदिति, अगर वे पूछें कि तुम घर पर हो या नहीं... तो कहना कि तुम यहाँ नहीं रहती।”
“लेकिन मैं झूठ क्यों बोलूं?”
माँ ने उसकी आंखों में देखा।
“क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”
अदिति कुछ समझ पाती, उससे पहले बाहर से एक आवाज आई—
“नीलकंठ परिवार की तरफ से आए हैं।”
अदिति और उसकी माँ एक-दूसरे को देखने लगीं।
कुछ क्षण बाद माँ ने दरवाजा खोल दिया।
बाहर एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।
काले कपड़े।
हाथ में चांदी की छड़ी।
और चेहरे पर अजीब गंभीरता।
उसने अदिति को देखते ही सिर झुका दिया।
“दुल्हन साहिबा।”
अदिति पीछे हट गई।
“मैं किसी की दुल्हन नहीं हूँ।”
आदमी ने शांत स्वर में कहा—
“अभी नहीं।”
“तो फिर?”
उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।
“यह आपके लिए है।”
अदिति ने डिब्बा नहीं लिया।
आदमी ने उसे मेज पर रख दिया।
“वीर नीलकंठ ने भेजा है।”
अदिति का दिल एक पल को रुक-सा गया।
“मैं उनसे मिलना नहीं चाहती।”
आदमी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“आप मिलेंगी।”
“क्यों?”
उसने जवाब दिया—
“क्योंकि इस बार फैसला आपका नहीं है।”
और वह मुड़कर चला गया।
अदिति ने दरवाजा बंद किया।
उसने डिब्बे को देखा।
माँ ने तुरंत कहा—
“इसे मत खोलना।”
लेकिन अदिति के भीतर अब सवालों का तूफान था।
उसने डिब्बा खोल दिया।
अंदर एक पुराना हार था।
नीले पत्थर वाला।
जैसे ही अदिति ने उसे छुआ—
उसकी आंखों के सामने सब कुछ घूम गया।
उसे एक विशाल महल दिखाई दिया।
चारों तरफ मशालें जल रही थीं।
लोग सफेद कपड़ों में खड़े थे।
और बीच में एक लड़की लाल शादी के जोड़े में खड़ी थी।
चेहरा घूंघट से ढका था।
सामने एक युवक खड़ा था।
उसके चेहरे पर दर्द था।
लड़की ने घूंघट उठाया।
अदिति की सांस अटक गई।
वह लड़की...
अदिति जैसी दिखती थी।
फिर किसी ने चीखकर कहा—
“महल के दरवाजे बंद कर दो!”
दृश्य अचानक बदल गया।
वही युवक किसी अंधेरे कमरे में अकेला खड़ा था।
उसकी आंखों में आंसू थे।
और वह कह रहा था—
“मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा।”
अदिति ने झटके से हार छोड़ दिया।
दृश्य गायब हो गया।
वह जमीन पर बैठ गई।
“यह... मैंने क्या देखा?”
माँ दौड़कर उसके पास आईं।
हार देखते ही उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
“यह हार तुम्हारे पास कैसे आया?”
“उन्होंने भेजा है।”
माँ कुछ पल तक हार को देखती रहीं।
फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“यह वही हार है।”
“किसका?”
माँ की आंखों से आंसू निकल आए।
“तुम्हारी नानी का।”
अदिति स्तब्ध रह गई।
“लेकिन नानी का निधन तो मेरे जन्म से बहुत पहले हो गया था।”
माँ ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“तो फिर यह हार...?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
अदिति ने पहली बार महसूस किया कि उसकी माँ उससे बहुत बड़ा रहस्य छिपा रही थीं।
---
उस रात अदिति ने फैसला कर लिया।
वह नीलकंठ महल जाएगी।
माँ ने बहुत रोका।
लेकिन अदिति ने कहा—
“अगर मैं नहीं गई तो यह रहस्य कभी खत्म नहीं होगा।”
अगली सुबह वह अकेली निकल पड़ी।
कई घंटे की यात्रा के बाद शहर खत्म हो गया।
सड़कें संकरी होती गईं।
मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।
आसपास सिर्फ जंगल था।
ड्राइवर ने अचानक गाड़ी रोक दी।
“आगे नहीं जाऊंगा।”
अदिति ने पूछा—
“क्यों?”
ड्राइवर ने सामने देखा।
दूर पहाड़ी के ऊपर एक विशाल महल दिखाई दे रहा था।
उसने कहा—
“नीलकंठ महल।”
अदिति ने किराया दिया और अकेली आगे बढ़ गई।
जैसे-जैसे वह महल के करीब पहुंची, हवा ठंडी होती गई।
विशाल लोहे का दरवाजा उसके सामने था।
दरवाजा अपने आप खुल गया।
अदिति रुक गई।
अंदर से किसी की आवाज आई—
“तुम आखिर आ ही गईं।”
अदिति ने चारों ओर देखा।
कोई नहीं था।
वह धीरे-धीरे अंदर चली गई।
महल के बीचोंबीच एक लंबा गलियारा था।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।
अदिति चलते-चलते एक तस्वीर के सामने रुक गई।
उस तस्वीर में एक दुल्हन थी।
लाल जोड़ा।
नीला हार।
और चेहरा...
बिल्कुल अदिति जैसा।
तस्वीर के नीचे सिर्फ एक तारीख लिखी थी—
1926
अदिति के हाथ ठंडे पड़ गए।
तभी पीछे से एक पुरुष की आवाज आई—
“उसे मत छुओ।”
अदिति ने पलटकर देखा।
सामने एक लंबा युवक खड़ा था।
काले कपड़े।
शांत चेहरा।
गहरी आंखें।
वह कुछ क्षण अदिति को देखता रहा।
फिर धीरे से बोला—
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
अदिति ने पूछा—
“आप वीर नीलकंठ हैं?”
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
बस उसकी नजर अदिति के गले में पड़े नीले हार पर चली गई।
उसके चेहरे पर पहली बार घबराहट दिखाई दी।
“यह हार तुम्हें किसने दिया?”
अदिति ने कहा—
“आपने।”
वीर ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
अदिति चौंक गई।
“क्या मतलब?”
वीर उसके करीब आया।
लेकिन उचित दूरी पर रुक गया।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“मैंने तुम्हें यहाँ नहीं बुलाया।”
अदिति की धड़कन तेज हो गई।
“तो फिर किसने?”
वीर ने महल के अंधेरे गलियारे की तरफ देखा।
और बोला—
“जिसने तुम्हें सौ साल पहले भी बुलाया था।”
अदिति के चेहरे का रंग उड़ गया।
“आप क्या कह रहे हैं?”
वीर ने उसकी आंखों में देखा।
“तुम्हें अपने बारे में जितना बताया गया है... उससे कहीं ज्यादा तुम इस महल से जुड़ी हो।”
अचानक ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
धड़ाम!
वीर ने तुरंत ऊपर देखा।
अदिति ने पूछा—
“क्या हुआ?”
वीर ने धीमे स्वर में कहा—
“महल ने तुम्हें पहचान लिया है।”
अदिति ने पूछा—
“महल... किसी इंसान को कैसे पहचान सकता है?”
वीर ने उसकी ओर देखा।
उसकी आंखों में डर था।
“क्योंकि यह सिर्फ महल नहीं है।”
उसी क्षण गलियारे की सारी मोमबत्तियां एक साथ बुझ गईं।
अंधेरे में एक धीमी आवाज गूंजी—
“दुल्हन वापस आ गई...”
अदिति की सांस रुक गई।
और वीर ने पहली बार उसका हाथ पकड़कर उसे पीछे खींच लिया।
“अदिति...”
उसकी आवाज बेहद गंभीर थी।
“अब जो भी हो, पीछे मुड़कर मत देखना।”
लेकिन तभी अदिति के पीछे से किसी ने फुसफुसाया—
“इस बार भी तुम उसे नहीं बचा पाओगे, वीर...”
और उसी पल...
नीलकंठ महल के सभी दरवाजे अपने आप बंद हो गए।
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