Beyhadh Wala Ishq - Chapter 2
संध्या जल्दी से तैयार होकर बाहर जाती है।
“गुड मॉर्निंग डैड, मोम, भाई और मेरी प्यारी दादी मां।”
और उनके गले लगती है। दादी संध्या का माथा चुमती है।
रंजन – वैसे मैडम, आज ख्वाबों में कौन आया, सलमान खान?
संध्या – कहाँ भैया, ऐसी किस्मत कहाँ। सलमान खान भले ना मिले, पर कोई मेरा सलमान ही आ जाए, जिसे देख दिल दिवाना बोले, होले होले…
तभी मां संध्या के सर पर पीछे से मारती है और कहती है,
“जब देखो यही बातें।”
दादी – अरे बच्ची बातें ही करती है, क्यों डांट रही है। बातें होगी तभी तो कोई आएगा ना। सपने तो देखेगी ही ना।
संध्या – वाह दादी, सो स्वीट… और वैसे भी ख्वाब पूरे देखने कहाँ देते हो, पहले ही उठा देते हो। पता ही नहीं चलता कौन आया होगा… (हँसते हुए कहती है)।
रंजन – ना फिक्र कर, सलमान नहीं होगा…
संध्या – मुझे तो मेरा बेहद इश्क चाहिए बस, चाहे वो शाहरुख हो या सलमान, बस…
मां (नीतू) – थोड़ी तो शर्म करो बेटा। आप सब ने सर चढ़ा रखा है इसे, पापा के सामने भी…
ऋषि – क्या पापा के सामने?
संध्या – पापा ही तो ढूंढ कर लाएंगे ना अपनी राजकुमारी के लिए राजकुमार, क्यों पापा?
ऋषि – हाँ, ये तो है…
और सब हँसते हैं।
वैसे संध्या, पर मेहरबानी तुम्हारी है। तुम ही ने इसके वक्त मूवी गानों का शौक पाला था, असर तो होना ही था।
नीतू – इतना असर होगा, पता नहीं था। जब गाने सुनकर पेट में किक मारती थी, खुश होती थी, तभी समझ जाना था।
तभी अक्षित का फिर फोन आता है।
संध्या – ओह नो! आप सब की बातों में तो भूल ही गई। पहला दिन लेट करवा दिया ना। बातें कम किया करो। ओके बाय, मैं चलती हूं।
दादी – अरे बेटा, कुछ खाकर तो जाओ।
संध्या – टाइम नहीं है अभी।
नीतू – एक पराठा तो खा लो बेटा।
संध्या – (ऐपल उठाते हुए) ये खा लूंगी और कॉलेज में कुछ खा लेंगे। अभी लेट हो रहा है।
कहकर संध्या चली जाती है।
नीतू – ये लड़की भी ना… पहले लेट उठती है, फिर तूफान की तरह भागती है…
अपनी स्कूटी लेकर संध्या कॉलेज के लिए निकलती है और अक्षित को ड्रॉप करती है।
अक्षित – तू अब आ रही है? कब से वेट कर रहा हूं यार। अब तक तो कॉलेज पहुंच जाता मैं।
संध्या – सॉरी मेरी जान। वैसे कौन सी कॉलेज में तुम्हारी गर्लफ्रेंड वेट कर रही है, जो इतनी जल्दी है मेरे अक्षित को?
अक्षित संध्या की ओर देख मुस्कुराते हुए कहता है –
ऐसी किस्मत कहाँ, जो मेरी गर्लफ्रेंड बने… और हम दोनों साथ कॉलेज जाएंगे। भूल गई? डिसाइड हुआ था ना।
संध्या (हँसते हुए) – हम्म… वैसे मेरे होते गर्लफ्रेंड की क्या जरूरत तुझे।
स्कूटी के पीछे बैठते अक्षित बोलता है –
अब चल, बातें बाद में करना।
संध्या – ओके, चल मेरी जान। जल्द कॉलेज पहुंचाती हूं।
अक्षित (मुस्कुराते हुए) – पागल।
संध्या – कुछ कहा?
अक्षित – नहीं तो…
कॉलेज का पहला दिन
संध्या – अरे अक्षित, कुछ बोलो ना। चुप क्यों हो?
अक्षित – क्या बोलूं?
संध्या – लो कमाल है। स्कूटी हम चला रहे हैं, तुम बोल भी नहीं सकते हो?
अक्षित – बोल तो सकता हूं, पर कहते हैं ड्राइविंग चुपचाप करनी चाहिए।
संध्या – ओ हेल्लो! रूल पता है मुझे। थोड़ा बोलने से एक्सीडेंट नहीं होगा (हँसते हुए)। चल बता।
अक्षित – ओके, पूछ मेरी मां। वैसे भी तू चुप रहने वालों में थोड़ी है।
संध्या – अरे मेरी जान, संध्या है तेरे साथ। अभी हम नहीं मरेंगे। अभी तो लाइफ बाकी है। और मैं स्कूटी पता है कितने अच्छे से चलाती हूं।
अक्षित – हाँ पता है, साइकिल वाला भी आगे निकल जाए… हा हा…
संध्या – हाँ तो जिंदगी से प्यार है, समझा… और मेरी स्कूटी से भी मुझे।
अक्षित – हाँ, तभी मुझे नहीं देती चलाने को। चल, क्या पूछ रही थी पूछो।
संध्या – ओके। कॉलेज का पहला दिन है। मान ले कोई लड़की पसंद आ गई तुझे, तो उसे गर्लफ्रेंड के लिए प्रपोज कैसे करेगा?
अक्षित – क्या?
संध्या – क्या क्या, जवाब दो।
अक्षित – ऐसा कभी नहीं होगा। प्रपोज तो दूर की बात है, मुझे कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं चाहिए।
संध्या – कोई बनेगी तब ना… (हँसते हुए)।
अक्षित – ना बने, चाहिए भी नहीं।
संध्या – तो तुझे कैसी चाहिए? अगर चाहिए तो लड़की कैसी होनी चाहिए?
अक्षित – मेरी पसंद सबसे लाजवाब है। ना उसके जैसी कोई होगी… (मुसकराते हुए कहता है)।
संध्या – ओए होए! क्या बात है, ढूंढ रखी है क्या…
अक्षित – नहीं नहीं यार। मैं तो तेरे जैसे बात कर रहा था। मेरी छोड़, अपनी बता। जिस हीरो की तलाश तुझे है, वो तेरा बेहद वाला इश्क इसी कॉलेज में मिला तो…
संध्या – तो जो इंतजार है, वो खत्म होगा इन नजरों का। शुरू होगी नई दास्तां मेरे बेहद की… पर…
अक्षित – पर? (हँसते हुए)
संध्या – इतनी जल्दी ये सब नहीं होगा।
अक्षित – फिर?
संध्या – फिर क्या… लेते हैं इस बेकरारी वाले ख्वाब का मजा… (और हँसती है)। लो आ गई हमारी मंजिल…
अक्षित – फाइनली हमारी कॉलेज लाइफ शुरू, संध्या।
संध्या – हाँ यार… पढ़ाई, मस्ती सब साथ साथ…
अक्षित – चलें?
संध्या – हम्म… वैसे अक्षित, बताना जरूर अगर किसी लड़की पर दिल आ जाए तो।
अक्षित – तू फिर शुरू हो गई।
संध्या – अच्छा, वैसे मैं रूकी कब थी? (हँसते हुए)
अक्षित – रूक, तुझे अभी बताता हूं।
कहते हुए संध्या के पीछे भागता है।
संध्या – पहले पकड़ तो सही… संध्या हाथ आने वालों में से नहीं…
आगे दौड़ती हुई बोलती है।
संध्या – यार, ये सब यहाँ क्या हो रहा है? सब स्टूडेंट यहाँ भीड़ क्यों लगा रखी है?
अक्षित – मुझे क्या पता। मैं भी तो तुम्हारे साथ आया हूं ना।
अक्षित और संध्या आगे बढ़ते हैं।
संध्या एक लड़के से पूछती है –
“एक्सक्यूज मी, यहाँ क्या हो रहा है?”
लड़का – क्या क्या… जो हर कॉलेज में पहले दिन होता है… रैगिंग। सीनियर जूनियर की वाट लगा देते हैं।
संध्या और अक्षित एक दूसरे की ओर देखते हुए –
“रैगिंग…?”
संध्या – हम तो नहीं करेंगे।
लड़का – तो यार कॉलेज में नो एंट्री। ये सब ना चाहते हुए भी हमें करना पड़ेगा। हाय, मैं राहुल।
संध्या – हाय, मैं संध्या।
अक्षित और राहुल से हाथ मिलाते हैं दोनों।
अक्षित – मैंने तो ये सब कभी नहीं किया यार।
राहुल – अक्षित, कमाल करते हो। कॉलेज में पहली बार आए हो, तो पहली बार ही होगा ना।
संध्या – ओ एम जी! हमने तो कभी सीनियर होकर ये नहीं किया।
राहुल (हँसते हुए) – यार, ये स्कूल नहीं कॉलेज है।
तभी राहुल को आगे बुलाया जाता है।
विराट (सीनियर) – नाम क्या है?
राहुल – राहुल।
प्रिति – ओके, क्या करोगे तुम राहुल?
राहुल – वो… वो…
विराट – तो तुम उल्टे खड़े होकर दिखाओ।
संध्या और अक्षित एक दूसरे की ओर देखते हैं।
राहुल उल्टा खड़ा होता है, तभी संजीव उसे गुदगुदी करके गिरा देता है और सब हँसते हैं।
प्रिति – राहुल, तुम जाओ।
फिर संध्या और अक्षित को इशारा करके बुलाती है।
दोनों आगे आते हैं।
विराट – वाह, सो ब्यूटीफुल… क्या नाम है तुम्हारा?
अक्षित – मेरा अक्षित… ये संध्या।
प्रिति (अक्षित के चेहरे पर उंगलियां फेरते हुए) – वाव… नाइस नेम। विराट, इससे क्या करवाएं… हैंडसम भी बहुत है।
अक्षित उसे दूर करता है।
संजीव – हम्म… चल बेटा, तू किस करेगा प्रिति को… और प्रपोज कर… क्यों प्रिति?
प्रिति – आई लाइक इट… चलो चलो।
अक्षित – मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा।
ये सुनकर संध्या जोर से हँसती है –
“हा हा…”
और अक्षित की ओर देखती है।
संजीव – क्या हुआ? हँस क्यों रही हो ऐसे?
संध्या – हंसूं ना तो क्या करूं… जो सब आपने बोला वो इससे कभी नहीं होगा। प्रपोज… हा हा… कुछ और करवालो।
विराट – अच्छा… इससे नहीं होगा तो तुम कर दो मेरे साथ।
इतना सुनते ही अक्षित विराट की कॉलर पकड़ लेता है –
“बकवास बंद करो।”
विराट अक्षित को धक्का देकर गिरा देता है।
संध्या गुस्से में विराट के गाल पर थप्पड़ जड़ देती है –
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे दोस्त को धक्का देने की!”
अक्षित संध्या को रोकता है।
प्रिति – क्या दोस्ती है… एक से पूछो तो दूसरा बोलता है, और दूसरे को कुछ कहो तो पहला गुस्सा करता है।
संजीव – अब तो तुम दोनों वही करोगे जो बोला है।
संध्या – सॉरी, पर अब ऐसा कुछ नहीं होगा। ना मैं करूंगी, ना अक्षित। वैसे रैगिंग के इतने घटिया रूल किसने बनाया है? टार्चर करना कहाँ सही है? सीनियर हो तो कुछ भी करवाओगे? हम यहाँ पढ़ने आते हैं, तो मान लेते हैं बात जो कहते हो। इसका ये मतलब नहीं हमसे कुछ भी करवाओगे, समझे।
तभी पीछे से आवाज आती है –
“कौन है जो इतना लंबा लेक्चर दे रहा है?”
क्रमशः