Beyhadh Wala Ishq Ch. 1

Beyhadh Wala Ishq - Chapter 1

Posted by Kanchan Mehak Suthar • Mar 13, 2026 08:46 AM

दिल्ली की नेहरू कॉलोनी में, मिस्टर ऋषि अग्रवाल जी के घर में कल से भागदौड़ मची हुई थी—कभी घर, कभी हॉस्पिटल में।

“अरे जल्दी करो, हॉस्पिटल नहीं जाना है क्या मुन्ना?”

(मिस्टर ऋषि अग्रवाल से उनकी माँ बोलती है।)

ऋषि—“जा तो रहा हूँ माँ, देखो तैयार भी हो गया।”

“बहू अकेली है हॉस्पिटल में, तुम्हारी ज़रूरत पड़ी तो…”

माँ ने फिर चिल्लाते हुए बोला।

“अरे माँ, डॉक्टर हैं वहाँ। तुम ऐसे ही चिंता किए जा रही हो। मैं सामान लेने आया था, सोचा नीतू की डिलीवरी से पहले-पहले ले आऊँ। अब जा रहा हूँ, आप रंजन का ख़्याल रखना।”

कहकर ऋषि जाने लगते हैं।

तभी रंजन भागता हुआ ऋषि का हाथ पकड़ लेता है—

“हम भी जाएंगे साथ पापा, हम भी जाएंगे मम्मी के पास।”

(रंजन, ऋषि-नीतू की पहली संतान है, जो छह साल का है।)

ऋषि—मुस्कुराते हुए, “बेटा आप दादी के पास रहो। हम जाकर आपकी मम्मी को लाते हैं। और आपको पता है ना, आपके साथ खेलने वाला नन्हा सा भाई या बहन आने वाले हैं। अगर तुम साथ जाओगे तो उसका वेलकम कौन करेगा? वो कहेगा—मेरे रंजन भैया मुझसे प्यार ही नहीं करते। बताओ फिर?”

रंजन—“नहीं नहीं, करता हूँ ना। मैं ध्यान रखूँगा मेरी बहन का। पापा आप बहन ही लेकर आना मेरे लिए। मैं वेट करूँगा और वेलकम भी।”

कहते हुए रंजन पीछे हट जाता है।

ऋषि—“हाँ हाँ, देखा माँ? इसे तो बहन ही चाहिए।”

दादी रंजन को उठाते हुए—

“तो इसे क्या, इसकी दादी को भी पोती चाहिए। अब तू जा जल्दी।”

ऋषि हॉस्पिटल पहुँचता है और डॉक्टर से पूछता है—

“नीतू कैसी है?”

डॉक्टर—“हम आपका ही वेट कर रहे थे। आपकी वाइफ की हालत बहुत क्रिटिकल है। डिलीवरी में बहुत प्रॉब्लम हो रही है, ऑपरेशन करना पड़ेगा।”

ऋषि—“क्या? पर नर्स ने तो बोला था सब नॉर्मल है, डिलीवरी आसानी से हो जाएगी।”

डॉक्टर—“हाँ, पर बच्चा ऐसी सिचुएशन में आ चुका है कि थोड़ी प्रॉब्लम बढ़ गई है। पर आप चिंता मत कीजिए, हम पूरी कोशिश करेंगे—माँ और बच्चा दोनों को बचाने की।”

कहकर डॉक्टर चला जाता है।

ऋषि—“क्या…”

कहते हुए सोचने लगता है—

“हे माता रानी, मेरी नीतू और मेरे बच्चे की रक्षा करो।”

तभी नर्स पेपर लाती है—

“सर प्लीज़, इन पर साइन की ज़रूरत है।”

ऋषि पेपर पढ़ता है, जिसमें लिखा होता है कि सिचुएशन बिगड़ने पर एक को ही बचाया जा सकता है। ये सुनते ही ऋषि के कदम पीछे हट जाते हैं।

नर्स—“डोंट वरी सर, सब ठीक होगा। ये फॉर्मेलिटी है। कुछ नहीं होगा आपकी वाइफ और बच्चे को। पर ये सब ऑपरेशन के लिए ज़रूरी है।”

ऋषि साइन करके डॉक्टर के पास जाकर कहता है—

“आप नीतू को कुछ मत होने देना… और मेरे बच्चे को भी।”

नीतू को ऑपरेशन वार्ड में ले जाया जाता है।

ऋषि वहीं बाहर बैठा होता है। बहुत टेंशन होती है। घर से माँ का बार-बार फोन आ रहा होता है, पर वो नहीं उठाता। बस बार-बार वार्ड की ओर ही देखे जा रहा होता है।

एक घंटा हो चुका था। हालात बहुत खराब थे नीतू के।

वो चिल्लाए जा रही थी—

“ऋषि… ऋषि…”

कोई इंजेक्शन भी असर नहीं कर रहा था।

नर्स दौड़ती हुई बाहर आती है—

“सर जल्दी आइए, आपकी वाइफ को आपकी ज़रूरत है।”

ऋषि दौड़ता हुआ जाता है। नीतू का हाथ पकड़ते हुए—

“सब ठीक हो जाएगा, घबराओ मत। डॉक्टर प्लीज़ कुछ करो।”

“कैल्म डाउन।” डॉक्टर बोलता है।

तभी फोन फिर बजता है और रिंगटोन होती है—

“ओ ओ जाने जाना, ढूंढे तुझे दीवाना,

सपनों में रोज आए, आ ज़िंदगी में आना…”

ऋषि फोन बंद नहीं कर पाता, क्योंकि वो नीतू का हाथ पकड़े हुए होता है।

और ये गाना सुनते ही डिलीवरी हो जाती है।

बच्चे की रोने की आवाज सुनकर सबके घबराए चेहरों पर मुस्कान आ जाती है।

फोन कटकर फिर बजता है।

फिर गाना सुनकर रोता बच्चा चुप हो जाता है।

नर्स—“बेटी हुई है। और देखो, गाना सुनते ही रोना बंद कर दिया। लगता है गाना पसंद आया है।”

हँसते हुए बोलती है।

डॉक्टर—“इसी गाने ने तो डिलीवरी करवाई है। काश पता होता तो पहले ही सुना देते गाना। बच्चा और माँ दोनों ठीक हैं।”

“थैंक्स डॉक्टर।”

हँसते हुए ऋषि कहता है—

“वो बात ये है कि नीतू ने बहुत फिल्में देखी हैं, शायद उसी का असर हो…”

और सब हँसते हैं।

ऋषि—“सब ओके है ना?”

नर्स—“यस सर, कल तक आप मैम को घर भी ले जा सकते हैं।”

थोड़ी देर बाद नीतू को होश आता है।

ऋषि कहता है—

“मिसेज अग्रवाल, बधाई हो… बेटी हुई है।”

नीतू—“अच्छा? रंजन को भी तो बहन चाहिए थी ना।”

हँसते हुए ऋषि कहता है—

“हाँ, पर इस बहन ने तो छक्के छुड़ा दिए सबके। बोला था ना फिल्में कम देखा करो। सलमान के गाने पर एंट्री मारी है हमारी लाडली ने।”

और दोनों हँसते हैं।

“रंजन, मेरी बहन आ गई!”

कहकर उछलने लगता है, जब ऋषि और नीतू घर पहुँचते हैं।

दादी भी बहुत खुश होती है और कहती है—

“देखो देखो मेरी लाडली आई है।”

(इस परिवार में बहुत लंबे समय बाद लड़की ने जन्म लिया होता है। ना तो दादी की कोई ननद थी, ना नीतू की।)

“लक्ष्मी आई है मुन्ना हमारे घर में।”

ऋषि—“हाँ माँ, हमारी लाडली आई है।”

कहते हुए गोद में लेते हुए चूमता है।

रंजन—“पापा, मम्मी इसका नाम क्या है? दादी माँ मैं इसे क्या बुलाऊँ? जैसे मेरा नाम रंजन है, इसका क्या है?”

नीतू रंजन के गाल को चूमते हुए—

“अच्छा, ये बताओ क्या नाम पसंद है मेरे बेटे को?”

रंजन—“हम्म…”

दादी—“सोच रहा है…”

ऋषि—“सोचो बेटा सोचो, आज तो भाई ही नाम निकालेगा अपनी प्यारी सी बहन का।”

“हाँ याद आया! वो उस दिन टीवी में देखा था ना वो छोटी सी बच्ची, मेरी बहन जैसी ही थी… जिसका नाम… हाँ संध्या! मैं इसका नाम संध्या रखूँगा।”

नीतू—“संध्या…”

ऋषि—“नाम तो प्यारा है, है ना माँ?”

“हम्म, बहुत प्यारा।”

रंजन—“मेरी संध्या, मेरी संध्या!”

कहकर कूदने लगता है।

तो नन्ही सी बच्ची का नाम संध्या रख दिया जाता है और सब बहुत खुश होते हैं।

जब-जब संध्या रोती, तो गाने चला दिए जाते और वो खिलखिलाकर हँसने लगती।

देखते-देखते संध्या बड़ी होने लगी। सपने देखने लगी।

जब भी गाना बजता, मानो उसी के लिए हो।

और बस हीरो की एंट्री उसी के लिए होगी।

सब उसे फिल्मों-गानों की दीवानी कहते।

हमेशा गाने गुनगुनाती जो रहती।

“अरे इस संध्या को उठाओ ना, कॉलेज के लिए लेट हो जाएगी!”

नीतू किचन से चिल्लाती है।

रंजन—“मम्मी आपको पता तो है ना, उसे उठाना कितना मुश्किल है।”

ऋषि—“सही कहा। दरवाज़ा खटखटाते रहेंगे तो भी नहीं उठेगी संध्या। ख्वाबों में जो खोई होगी।”

नीतू—दादी ऋषि को चाय देते हुए—

“ये लड़की भी ना… मुझे तो समझ ही नहीं आती है। और ना ही इसके ख्वाब। कभी तो कोई हीरो इसे प्रपोज करता है, कभी शादी करता है। पागल है पूरी।”

रंजन—“पता नहीं आज कौन ख्वाबों में उसे गुलाब दे रहा होगा।”

हँसते हुए कहता है।

और सब हँसते हैं।

अपने रूम में संध्या करवटें बदलती हुई, चेहरे पर मुस्कान होती है।

हाथों में गुलाब… कदमों पर बैठा हीरो…

“आहें हाय… आज तो संध्या तुझे प्रपोज करेगा ही… जो तुझसे कहेगा कि मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ…”

ख्वाब में वो संध्या की ओर बढ़ता है।

तभी संध्या का फोन बजता है… और रिंगटोन—

“मेरे ख्वाबों में जो आए, आकर मुझे छेड़ जाए…”

अपना हाथ चद्दर से बाहर निकालते हुए फोन उठाकर कान पर लगाते हुए—

“हेलो… कौन?”

“ओ मैडम! गुड मॉर्निंग। ख्वाबों की दुनिया से बाहर आओ। सुबह हो चुकी है। कॉलेज भी जाना है, समझी? जल्दी उठो।”

रंजन बोलता है।

(अक्सर संध्या को ऐसे ही उठाया जाता था।)

संध्या—“आई भैया…”

और मुँह से चद्दर हटाते हुए बैठती है।

चेहरे से बाल हटाते हुए मुस्कुराकर—

“गुड मॉर्निंग संध्या…”

और गाती है—

“मेरे ख्वाबों में जो आए,

आकर मुझे छेड़ जाए,

उसे कहो मेरे सामने तो आए…”

हम्म हम्म…

कहते हुए आईने के सामने जाती है।

“हाय… आज भी नहीं आया। सिर्फ आते ही दिखा। पता नहीं कब आएगा मेरे सपनों का राजा… या यूँ ही परेशान करता रहेगा अपनी संध्या को।”

खुद से कहती है और हँसती है।

तभी फिर फोन बजता है।

फोन उठाते हुए—

“अक्षित…?”

“हेलो…”

अक्षित—“क्या है यार! ना मैसेज के रिप्लाई और ना कॉल उठाया।”

संध्या—“यार सो रही थी।”

अक्षित—“पता है तुम सो रही थी। ख्वाबों के आगे दिखता भी है क्या कोई? कॉलेज का फर्स्ट डे है, लेट नहीं होना है।”

संध्या—“हाँ चल फोन रख, अब तू लेट करा रहा है। अभी आती हूँ जल्दी से…”

क्रमशः

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