अजब सा बंधन है Ch. 2

अजब सा बंधन है - Chapter 2

Posted by Akanksha Rajput • Jan 18, 2026 12:40 PM

वो armchair पर बैठा, दोनों हाथ आपस में बाँध लिए। उसकी आँखों में अब इंतज़ार नहीं था।  सिर्फ़ planning थी।

ये शादी उसके लिए रिश्ता नहीं एक war move थी। बाहर रात और गहरी हो चुकी थी, और second floor के उस dark luxury room में एक ऐसी कहानी लिखी जा रही थी। जिसका अंजाम अध्या की आने वाली लाइफ़ के लिए आसान नहीं होने वाला था।

अगली सुबह।

उज्जैन की सुबह हमेशा की तरह सुकून भरी थी। रात की ठंडक अभी पूरी तरह गई नहीं थी, और हल्की धूप आसमान से उतरकर गलियों में फैल रही थी। हवा धीमे - धीमे चल रही थी।

एक मोहल्ले में रोज़मर्रा की हलचल शुरू हो चुकी थी। कहीं झाड़ू की आवाज़, कहीं दूधवाले की घंटी और कहीं मंदिर से आती घंटियों की हल्की गूंज।

शर्मा परिवार का छोटा - सा घर इसी मोहल्ले के बीचों - बीच था। न कोई दिखावा, न कोई भव्यता, बस सादगी और मेहनत की पहचान। महेश शर्मा अंदर कमरे में अपनी मेडिकल शॉप को खोलने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने शटर की चाबी को जेब में रखी, हिसाब - किताब की डायरी संभाली और घड़ी पर एक नजर डाली। रोज़ की तरह दुकान खोलने का वक्त हो चला था,

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। जिसे सुन वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े और जैसे ही दरवाज़ा खोला, एक पल के लिए उनकी चाल रुक गई। सामने सबसे आगे एक बुज़ुर्ग खड़े थे। चेहरा गंभीर, मगर शांत। आँखों में अनुभव की गहराई और बात करने से पहले सोचने की आदत साफ़ झलक रही थी।  ये थे सक्षम के दादा जी और उनके साथ थी उनकी पत्नी,  उनके साथ एक सक्षम के मोम डैड भी खड़े थे, और उन सबके पीछे पाँच - छह लोग खड़े थे, जिनके हाथों में मिठाइयों के डिब्बे और ढँके हुए उपहार थे।

महेश की नज़र कुछ पलों तक वहीं ठहरी रही। दिल में हल्की - सी बेचैनी उठी, मगर चेहरे पर उन्होंने खुद को संभाले रखा।

“ जी … आप लोग ? ” उन्होंने संयमित स्वर में पूछा।

सक्षम के दादा जी ने हल्का - सा सिर झुकाया, “ नमस्ते। हम अग्निहोत्री परिवार से हैं। आप ही महेश शर्मा जी हैं न ?”

उनकी बात सुन महेश जी बोले, " जी हां में ही महेश शर्मा हु "

दादा जी ने हल्की - सी मुस्कान के साथ बड़े शालीन स्वर में कहा, “ अगर आपकी अनुमति हो तो क्या हम अंदर आ सकते हैं ? ”

महेश शर्मा पल भर को चौंके, फिर तुरंत खुद को संभालते हुए शिष्टता से सिर हिलाया और दरवाज़ा पूरा खोल दिया, “ जी… आइए। ”

जिसके बाद वे सभी अंदर बैठक में आ गए। महेश ने सबको बैठाया और अंदर अपनी पत्नी को आवाज़ देकर पानी मंगवाया। कुछ ही सेकंड्स में महेश जी की पत्नी पानी लेकर बाहर आई।

कुछ पल की औपचारिक खामोशी के बाद सक्षम के दादा जी ने बिना भूमिका बाँधे, सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “ जी… हम अपने पोते, सक्षम अग्निहोत्री के लिए आपकी बेटी आध्या का हाथ माँगने आए हैं। ”

ये सुनते ही महेश शर्मा जी और उनके पास खड़ी उनकी पत्नी    

सुमित्रा जी जैसे एक पल के लिए स्तब्ध रह गए।

उनकी नज़र सामने बैठे लोगों पर ठहर गई।

“ सक्षम अग्निहोत्री…? ” महेश जी के होंठों से अनायास ही निकल पड़ा। उन्हें ये नाम पहले भी सुना था—अपने एक पुराने मित्र से। की सक्षम, जो कम उम्र में ही बड़ा बिज़नेसमैन बन चुका थाजिसका नाम और रुतबा शहर - शहर गूँजता था।

थोड़ी हैरानी और असमंजस के साथ महेश ने धीमे स्वर में पूछा,

“ जी… मगर आप लोग हमें और हमारी बेटी को जानते कैसे हैं ? ”

सक्षम के पिता ने हल्की मुस्कान के साथ बात संभाली, “ असल में कुछ महीने पहले हमारा बेटा किसी काम से उज्जैन आया था। उसी दौरान उसने आपकी बेटी को देखा… और उसे कुछ ऐसा अपनापन महसूस हुआ कि उसने तुरंत हमें इसके बारे में बताया कि वो आपकी बेटी अध्या को पसंद करता है। ”

उनकी बात सुन एक पल को महेश जी चुप हो गए। मन के भीतर अजीब - सी हलचल थी। कि इतनी बड़ी फैमिली उनकी बेटी को पसंद कर रही है, और संकोच, उनका साधारण घर और सामने बैठे ये रुतबे वाले लोग।

उन्होंने झिझकते हुए कहा, “ जी … आप लोग इतने बड़े लोग हैं … और हम बस एक छोटी - सी मेडिकल शॉप चलाने वाले। आप समझ रहे हैं न …”

सक्षम के दादा जी ने गंभीर लेकिन आत्मीय स्वर में कहा,

“ जी हम आपकी बात समझ रहे है लेकिन रिश्ते बराबरी से नहीं, दिलों से जुड़ते हैं। हमें आपकी दौलत नहीं, आपके संस्कार चाहिए। ”

उनकी बातों में ऐसी सच्चाई थी कि महेश शर्मा का दिल पिघलने लगा। फिर भी, एक पिता का मन सवालों से भरा हुआ था।

बैठक का माहौल अब काफ़ी सहज हो चुका था। तभी सक्षम की मोम ने कोमल आवाज़ में पूछा, “ वैसे आध्या कहाँ है ? हम उससे भी मिलना चाहेंगे। ”

इतना सुनते ही पास खड़ी सुमित्रा देवी बातचीत में शामिल हुईं। उन्होंने हल्की झिझक के साथ कहा, “ जी … आध्या अभी बाहर गई है, किसी काम से। थोड़ी देर में लौट आएगी। ”

सक्षम की मोम ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, “कोई बात नहीं। आप लोग उससे बात कर लीजिएगा, फिर हमें बता दीजिएगा।”

कुछ देर बाद अग्निहोत्री परिवार ने बेहद आत्मीयता से विदा ली और जाते - जाते वे अपने साथ लाए कुछ तोहफ़े वहीं छोड़ गए। कीमती पैक्ड गिफ्ट्स नौकर ने अंदर रख दिए, “ ये बस हमारी तरफ़ से छोटी - सी भेंट है,”

सक्षम के दादा जी ने कहा, “ कृपया मना मत कीजिएगा।" उनकी विनम्रता देखकर महेश शर्मा थोड़े असमंजस में तो पड़े, लेकिन होंठों पर हल्की - सी मुस्कान भी आ गई।

सक्षम की मोम ने एक बार फिर स्नेह भरी नज़र से देखा और वे सभी वहाँ से चले गए। दरवाज़ा बंद होते ही महेश शर्मा सोफ़े पर बैठ गए। सुमित्रा देवी भी उनके पास आकर बैठ गईं। उनकी आँखों में खुशी की चमक साफ़ झलक रही थी। “ जी, देखा आपने… ” सुमित्रा बोलीं, “ कितने बड़े घर के लोग थे। बात करने का ढंग कितना सरल, कितना प्यारा। न कोई घमंड, न ऊँच - नीच। सच कहूँ तो मुझे तो लगता है ये सब भोलेनाथ की ही कृपा है। ”

महेश शर्मा अभी भी गहरी सोच में डूबे थे। पत्नी की बातें सुनकर उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। “ हम्म …”

फिर उन्होंने कहा, “ पहले आध्या से बात कर लेते हैं और मैं एक बार अरविंद से भी बात करूँगा। अग्निहोत्री फैमिली के बारे में थोड़ा और जानना ज़रूरी है। ” अरविंद मिश्रा, महेश जी के वही पुराने मित्र थे, जिनके मुँह से उन्होंने कभी सक्षम के बारे में सुना था।

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