अजब सा बंधन है Ch. 3

अजब सा बंधन है - Chapter 3

Posted by Akanksha Rajput • Jan 18, 2026 12:40 PM

फिर उन्होंने कहा, " पहले आध्या से बात कर लेते हैं और मैं एक बार अरविंद से भी बात करूँगा। अग्निहोत्री फैमिली के बारे में थोड़ा और जानना ज़रूरी है। " अरविंद मिश्रा, महेश जी के वही पुराने मित्र थे, जिनके मुँह से उन्होंने कभी सक्षम के बारे में सुना था।

उधर सुबह का उजाला और बढ़ चुका था। एक तरफ़ शर्मा परिवार के छोटे से घर में रिश्ते की बात रखी जा चुकी थी और दूसरी तरफ़, आध्या शहर के एक छोटे से कैफ़े में बैठी थी। उसके सामने अमित बैठा था। मेज़ पर रखे कॉफ़ी के कप से भाप उठ रही थी, लेकिन उनके बीच की हवा अब ठंडी और भारी हो चुकी थी।

अमित ने गहरी साँस लेकर कहा, " आध्या... मेरी फैमिली ने मेरा रिश्ता कहीं और तय कर दिया है। मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता।" ये सुनते ही आध्या के होंठ काँप गए।

उसकी बड़ी - बड़ी आँखों में आँसू भर आए, " अमित ... तुम ऐसा कैसे कह सकते हो ? मैं तुमसे प्यार करती हूँ।

अमित ने नज़रें झुका लीं। आवाज़ में बेरुख़ी थी। “ सोचो न आध्या हमारा रिश्ता बस छह महीने का है। इतना सीरियस होने की क्या ज़रूरत थी ? तुम जानती हो, मेरी फैमिली कितनी स्ट्रीक है। "

वो कुर्सी पीछे खिसकाकर उठ खड़ा हुआ, " सॉरी आध्या मुझे अब जाना होगा। " इतना कहकर वो बिना पीछे देखे चला गया।

आध्या वहीं जमी रह गई। आँसू उसकी पलकों से फिसलकर गालों पर आ गिरे। दिल बुरी तरह टूट चुका था। असल में जब भी अमित उसके करीब आने की कोशिश करता, आध्या उसे हर बार रोक देती थी। वो उससे हर बार यही कहती थी, “ अमित ... ये सब शादी के बाद। हम एक दूसरे से प्यार करते हैं। "

लेकिन शायद अमित उस धैर्य को समझ नहीं पाया। दबाव और मोह के बीच उसने आध्या को छोड़ देना आसान समझा। आध्या ने अपने आँसू पोंछे और भारी कदमों से कैफ़े से बाहर निकल गई।

आध्या ने अपने आँसू पोंछे और भारी कदमों से कैफ़े से बाहर निकल गई। बाहर की सड़क पर रोज़ की तरह हलचल थी, लेकिन उसके भीतर सब कुछ जैसे ठहर गया था।

उधर घर पर —

सुमित्रा देवी अब भी सुबह आए मेहमानों के बारे में सोच रही थीं। उनके चेहरे पर एक अलग ही संतोष था, आँखों में हल्की चमक।

वे भावुक होकर बोलीं, “ मुझे तो लगता है हमारी आध्या वहाँ बहुत खुश रहेगी। ये सब भोलेनाथ की कृपा ही तो है।”

महेश शर्मा ने भी धीरे से सिर हिलाया।

“ हाँ… पहले आध्या से बात कर लेते हैं। वैसे भी अब उसकी शादी की उम्र हो चुकी है। ”

दोपहर में—

आध्या घर लौटी। महेश शर्मा उस वक्त मेडिकल शॉप पर थे। घर में सिर्फ़ उसकी माँ थीं, जो टीवी देख रही थीं। दरवाज़े की आवाज़ सुनते ही उन्होंने मुड़कर देखा। “ बेटा, आ गई ? खाना लगा दूँ तुम्हारे लिए ? ”

सुमित्रा देवी ने अपनत्व से पूछा। आध्या ने बिना नज़र मिलाए कहा, “ नहीं मम्मी मैंने राधिका के घर पर खा लिया है। अब भूख नहीं है। रात में खा लूँगी। ” इतना कहकर वह बिना कुछ और बोले अपने कमरे में चली गई। सुमित्रा देवी ने उसे जाते हुए देखा, मगर कुछ समझ नहीं पाईं।

शाम का समय—

घड़ी की सुइयाँ सात बजा रही थीं। डाइनिंग टेबल पर सादा मगर सुकून भरा माहौल था। गरम रोटियाँ, दाल - सब्ज़ी और रोज़मर्रा की शांति। आध्या अपने माता  -पिता के साथ बैठी थी, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। वो चुपचाप थाली में सब्ज़ी रख रही थी।

खामोशी को तोड़ते हुए महेश शर्मा बोले, “ बेटा, आज घर पर कुछ लोग आए थे… तुम्हारी शादी की बात करने। ”

आध्या एकदम चौंकी। उसने पापा की ओर देखा, मगर कुछ बोली नहीं। सुमित्रा देवी ने नरमी से आगे कहा, “ लड़के का नाम सक्षम अग्निहोत्री है। उनकी फैमिली ने बताया कि जब वे उज्जैन आए थे, तभी उन्होंने तुम्हें देखा और तभी से तुम्हें पसंद करते हैं। हमने भी उनके बारे में जानकारी ली है। परिवार बहुत अच्छा है। हमें तो ये रिश्ता ठीक लगा। अब तुम बताओ—क्या तुम लड़के से एक बार मिलना चाहोगी ? ”

आध्या का दिल अजीब - सी दुविधा में फँस गया। मुझे पसंद करते हैं…? उसने अनजाने में अमित का चेहरा याद कर लिया। दिल में कसक उठी, आँखों के सामने वही टूटे हुए पल घूम गए।

कुछ देर चुप रहने के बाद उसने नज़रें झुका लीं और बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “ पापा मुझे मिलने की ज़रूरत नहीं है। आप लोग जो भी फैसला करेंगे, मुझे मंज़ूर होगा। आप मेरे लिए कभी गलत नहीं सोच सकते। ”

उसके होंठों पर एक फीकी - सी मुस्कान आ गई। ऐसी मुस्कान, जिसमें न खुशी थी, न उम्मीद बस एक खामोश समझौता।

महेश और सुमित्रा देवी ने उस मुस्कान को बेटी की सहमति समझ लिया। दोनों के चेहरे पर राहत आ गई।।खाना ख़त्म हुआ। सब अप ने- अपने कमरों में चले गए। लेकिन आध्या अपने कमरे में आकर बिस्तर पर पेट के बल लेट गई। तकिए में चेहरा छुपाते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले। दिल भारी था, जैसे वो अपने बीते हुए कल और आने वाले कल के बीच फँस गई हो।

रात का समय।

ऑफिस में नीली रोशनी फैली हुई थी। लैपटॉप स्क्रीन के सामने सक्षम अब भी काम में डूबा था। तभी उसका फोन वाइब्रेट हुआ— Mom Calling …

फोन उठाते ही दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “ बेटा … आध्या ने हाँ कर दी है। वो लोग तैयार हैं तुमसे शादी करने के लिए। ”

ये बात सुन सक्षम के होंठों पर तुरंत एक शैतानी मुस्कान तैर गई, “ ओके मॉम ,” उसने ठंडी आवाज़ में कहा,

“ उनसे कह दीजिए—शादी की तैयारी शुरू कर दें। शादी एक हफ़्ते बाद होगी। ”

ये बात सुन उसकी मोम घबराकर बोलीं, “ क्या ? इतनी जल्दी ? लेकिन क्यों ? और इतनी जल्दी अब कुछ कैसे होगा? ”

सक्षम की आवाज़ और कठोर हो गई। “ सब हो जाएगा, मॉम। और हाँ मुझे बेकार की रस्में नहीं चाहिए। बस सीधा शादी। ”

इतना कहकर उसने कॉल काट दिया। उसकी मोम फोन की स्क्रीन देखती रह गईं। “ ये लड़का … इसके दिमाग़ में क्या चलता रहता है, ” वो खुद  बुदबुदाईं।

सक्षम अपनी revolving chair पर बैठा था। चेयर को हल्का - हल्का घुमाते हुए उसने ड्रॉअर खोला और एक फ़ाइल निकाली और खोली।

पहला पन्ना —

जिस पर आध्या की प्यारी सी तस्वीर थी जिसमें वो बहुत मासूम सी लग रही थी , गोरा रंग, उम्र 21 साल, brown आईज, उसकी तस्वीर देखते ही सक्षम के चेहरे की सख़्ती और गहरी हो गई। आँखों में नफ़रत, होंठों पर दबा हुआ गुस्सा। वो धीमी मगर ठंडी आवाज़ में बोला, “ तुम्हारी उलटी गिनती शुरू हो चुकी है … मिस आध्या। ”

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