श्री लोक 2
सुबह की पहली किरण जैसे ही महल की झील पर पड़ी, पानी पर सुनहरी लहरें नाचने लगीं।
झील के पास, महल के भीतर — रेशमी परदों से ढका एक शाही कक्ष। उस कमरे की हवा भी महक रही थी… गुलाब और चंदन की खुशबू से। सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे कमरे में भरने लगी, और उसी रोशनी में — बिस्तर पर लेटी हुई लड़की के चेहरे पर चमक आ गई। उसके माथे की बिंदी, उसकी बंद पलकों पर पड़ती धूप, उसे और भी सुंदर बना रही थी। ऐसा लग रहा था मानो चाँदनी की ओट से चाँद झाँकने लगा हो। उसकी पलकें भारी थीं, लेकिन उसकी मुस्कान हल्की सी खिल गई। उसका चेहरा अब भी नींद की मिठास से भरा हुआ था।
वो उठती है…
ऐसा करते ही उसके लंबे, काले रेशमी बाल उसके कंधों पर बिखर जाते हैं। वह कमल के फूल जैसी कोमलता से बिस्तर से उठती है, धीरे-धीरे अंगड़ाई लेती है। फिर वो अपनी आँखें खोलती है — तभी कोई उसे आवाज देता है,
“राजकुमारी जी।”
आवाज़ सुनते ही उस लड़की की आँखें हैरानी से बड़ी हो जाती हैं। वो अपने चारों ओर देखने लगती है। वह दासी, जिसने उसे आवाज़ दी थी, कहती है,
“राजकुमारी जी, आपका नहाने का प्रबंध हो गया है।”
यह कहकर वो दासी वहाँ से चली जाती है।
यह लड़की और कोई नहीं, त्रिशिका ही थी।
त्रिशिका अपने आपको इस अंजान जगह में पाकर घबरा जाती है। वो याद करने की कोशिश करती है… तभी उसे याद आता है — थोड़ी देर पहले वह एक दिव्य किताब पढ़ रही थी, तभी उसमें से रोशनी निकली थी और उसे झटका लगा था।
अब खुद को यकीन दिलाने के लिए वह अपने आपको चुटकी काटती है।
जब दर्द होता है, तो उसे समझ आता है — ये कोई सपना नहीं है।
वो अपने आप से कहती है,
“पर मैं कहाँ हूँ? और ये लड़की मुझे राजकुमारी क्यों कह रही थी?”
फिर वो अचानक बोलती है,
“कहीं मैं उस किताब की दुनिया में तो नहीं आ गई?”
इन सबका जवाब जानने के लिए वह तुरंत खड़ी होती है और अपने आप को देखती है — उसने बहुत ही राजसी पोशाक पहन रखी थी।
वह तेज़ी से झरोखे तक जाती है।
जैसे ही वह वहाँ पहुँचती है, जहाँ से हल्की-हल्की हवा अंदर आ रही थी — वह हवा उसके चेहरे को छू रही थी।
बाहर का दृश्य दिल थाम लेने वाला था — हरे-भरे बाग़, फव्वारों की मधुर आवाज़, और कहीं दूर बजता शहनाई जैसा संगीत। फूलों की खुशबू, मिट्टी की नमी, और संगमरमर के पत्थरों से आती ठंडक — ये सब मिलकर उसके कमरे को महज़ एक कमरा नहीं, एक एहसास बना रहे थे।
उसने दोनों कोहनियाँ झरोखे पर टिकाईं और चुपचाप बाहर देखती रही — मानो हर नज़ारे में कोई भूली हुई कहानी तलाश रही हो। नीचे बाग़ में दास-दासियाँ फव्वारों की सफाई कर रहे थे। चिड़ियाँ उड़ती हुई महल से आसमान तक जा रही थीं। अब जाकर उसे यक़ीन होने लगता है कि वह किसी राजमहल में है।
तभी उसे उस दासी की बात याद आती है, और वो उसी दिशा में चल पड़ती है, जिस ओर दासी गई थी।
उस दिशा में स्नान कक्ष था।
जैसे ही त्रिशिका झांककर देखती है — संगमरमर की दीवारों पर हल्की-हल्की रोशनी पड़ रही थी, जिससे पूरा कक्ष सुनहरे रंग में दमक रहा था। हवा में गुलाब और केवड़े की ताज़ी महक घुली हुई थी — जैसे खुद सुबह ने इस स्नान कक्ष को सजाया हो।
कमरे के बीचोंबीच बना था एक भव्य, हाथ से तराशा हुआ संगमरमर का बाथटब, जिसमें पहले से ही दूध, गुलाब की पंखुड़ियाँ और केसर मिला हुआ जल भरा था। दीवारों पर बनी कमल की नक्काशी — सब कुछ एक शांत, दिव्य वातावरण रच रही थी।
त्रिशिका धीरे-धीरे अंदर प्रवेश करती है। चारों ओर दास-दासियाँ विनम्र भाव से खड़ी थीं — किसी के हाथ में चंदन का लेप, किसी के हाथ में केसर जल।
एक दासी धीरे से पास आती है और उसके पैरों के पास गुलाब जल छिड़कती है। फिर सारी दासियाँ त्रिशिका के लिए रास्ता बना देती हैं — बाथटब की ओर जाने का।
त्रिशिका बाथटब की ओर बढ़ती है।
पानी में तैरती केसर की लहरें, दूध की सफेदी और फूलों की रंगत — उसके प्रतिबिंब को और निखार देती हैं।
स्नान के बाद
त्रिशिका ने रेशमी वस्त्र पहन रखे थे। हवा में चंदन और गुलाब की हल्की सी खुशबू फैली थी।
दासियाँ उसका श्रृंगार कर रही थीं — कोई बाल सुलझा रही थी, कोई पायल पहना रही थी, किसी ने उसकी आँखों में काजल लगाया।
उसने बहुत ही सुंदर सफेद और गुलाबी रंग का जोड़ा पहन रखा था, जिसमें वह बला की खूबसूरत लग रही थी।
तभी कक्ष के बाहर खड़े सैनिक घोषणा करते हैं,
“महारानी पधार रही हैं।”
थोड़ी देर बाद महारानी कुछ दासियों के साथ अंदर आती हैं।
वे त्रिशिका को देखकर कहती हैं,
“राजकुमारी तारीनिका, आप तैयार हो गईं?”
फिर वो अपनी आँखों के एक कोने से काजल निकालकर त्रिशिका के कान के पीछे लगा देती हैं।
त्रिशिका मन ही मन सोचती है —
“मैं जिस की जगह यहाँ हूँ, उसका नाम 'तारीनिका' है… और वह एक राजकुमारी है… और शायद ये महारानी मेरी माँ हैं।”
महारानी मुस्कुराते हुए कहती हैं,
“राजकुमारी, आपको जन्मदिन की बधाई हो।”
ये सुनकर त्रिशिका थोड़ा मुस्कुरा देती है और कहती है,
“आपका बहुत धन्यवाद।”
महारानी यह सुनकर थोड़ा चौंक जाती हैं — क्योंकि तारीनिका पहले कभी उनसे इतनी विनम्रता से बात नहीं करती थी।
शायद यह पहली बार था जब तारीनिका उनके सामने मुस्कुरा रही थी — क्योंकि वह हमेशा घमंडी स्वभाव की थी।
महारानी उसके माथे पर हाथ फेरकर यह जाँचने की कोशिश करती हैं कि कहीं वह बीमार तो नहीं।
पर सब कुछ सामान्य पाकर वह सोचती हैं कि शायद आज उसका जन्मदिन है, इसलिए वह इतनी खुश है।
“राजकुमारी तारीनिका, अब आप हमारे साथ चलिए,” महारानी कहती हैं।
त्रिशिका — जो अब राजकुमारी तारीनिका बन चुकी थी — अपनी सौम्य मुस्कान के साथ धीरे-धीरे महारानी के साथ चल रही थी।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती, महल की भव्यता एक नई परत खोलती जाती — ऊँचे सुनहरे स्तंभ, दीवारों पर रत्नों से जड़े चित्र, और संगमरमर पर बनीं नक्काशियाँ।
सभी दास-दासियाँ और द्वारपाल हैरान थे — क्योंकि राजकुमारी हमेशा गुस्से में रहती थी।
आज राजकुमारी तारीनिका के चेहरे पर एक कोमल, हल्की सी मुस्कान थी।
दासियाँ एक-दूसरे को देखकर फुसफुसा रही थीं —
“राजकुमारी मुस्कुरा रही हैं… पहली बार…”
कुछ ने तो धीरे से झुककर माथा भी टेक दिया, जैसे कोई देवी सामने खड़ी हो।
महारानी राजकुमारी को मंदिर के विशाल प्रांगण में लाती हैं। वहाँ की पवित्रता हर दीवार से झलक रही थी — शुद्ध चंदन की खुशबू, फूलों की मालाओं से सजी मूर्तियाँ, और धीमे-धीमे बजता शंख और घंटियों का स्वर।
राजकुमारी तारीनिका (त्रिशिका) झुककर देवी के चरणों में प्रणाम करती है।
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तभी वहाँ महाराज के आने की ध्वनि होती है।
गहरे लाल रंग के शाही वस्त्रों में सजे महाराज, धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए मंदिर में प्रवेश करते हैं। उनके चेहरे पर गर्व और आत्मीयता दोनों थे।
वो धीरे से पास आते हैं और राजकुमारी के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं:
“जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ, राजकुमारी।”
फिर थोड़ी देर रुकते हुए कहते हैं —
“आपकी एक इच्छा थी ना… कि आप सारा नगर घूमना चाहती हैं?”
राजकुमारी (त्रिशिका) हल्के-से चौंककर उन्हें देखती है, फिर आँखें झुका लेती है।
महाराज मुस्कुराकर कहते हैं:
“तो जाइए… आज आपको हमारे पूरे राज्य में जहाँ मन करे वहाँ जाने की आज्ञा है। आप जो चाहें, वो कर सकती हैं।”
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क्या सच में त्रिशिका उस किताब की दुनिया में आ चुकी है?
क्या कोई मकसद है इसके पीछे?
क्या किसी को त्रिशिका पर संदेह हो जाएगा?
आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी कहानी — ✨श्री लोक✨ — जिसे लिखा है A.R. Writer ने इन Yatra - Collected stories।
नॉट- ये एक शोर्ट स्टोरी कलेक्शन है इसमे अलग अलग जोनरा (genre) की बहुत सारी स्टोरीज़ होंगी। और अगली स्टोरी के बारे में, उससे पहले की स्टोरी में प्रमोशन शुरू कर दिया जाएगा I
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