His young little bride Ch. 2

His young little bride - Chapter 2

Posted by Jahnavi Sharma • Aug 07, 2025 10:13 PM

वेद सिंह चौहान, जो उदयपुर की रॉयल फैमिली का मुखिया था, उसे एक सुबह जेलर का कॉल आया। उसके माता-पिता का कातिल, देवराज ठाकुर, अपनी आखिरी साँसें गिन रहा था। उसने वेद को मिलने के लिए बुलाया था। वेद मिलने भी गया। अपने माता-पिता को मारने वाले शख्स के खानदान के हर व्यक्ति को उसने खत्म कर दिया था; बस बचा था देवराज। वेद उसे भी मरते हुए देखना चाहता था।

देवराज भी कोई सीधा-सादा इंसान नहीं था। उसने वेद को इसलिए बुलाया था ताकि बातों-ही-बातों में पता कर सके कि वेद उसकी पोती के बारे में जानता है या नहीं। वेद को यही लगता था कि उसने देवराज के पूरे परिवार को खत्म कर दिया है। ये देखकर देवराज ने राहत की साँस ली; वह आसानी से मर सकता था।

देवराज की खुशी चंद पलों की थी क्योंकि जब वेद बाहर आया, तो एक कांस्टेबल ने शादी का कार्ड दिया, जिसके साथ एक लेटर भी था। लेटर पढ़ने पर पता चला कि वह किसी और ने नहीं, बल्कि देवराज की पोती ने लिखा था। वेद वापस देवराज के पास गया और उसने उसकी पोती, शिवांशा को 24 घंटे में खत्म करने की धमकी दी।

देवराज उसे रोकना चाहता था, पर रोक नहीं पाया। वहीं बाहर आकर, वेद ने प्रतीक से सख्त आवाज़ में कहा, “वेडिंग कार्ड को अच्छे से पढ़ो और पता लगाओ कि शादी कहाँ हो रही है। यह शादी नहीं होनी चाहिए; उस घर से डोली नहीं, लड़की की अर्थी उठनी चाहिए।”

“बिल्कुल यही होगा भाई। उन्होंने जो बुआ और फूफा जी सा के साथ किया, उसका सूद समेत बदला लेना बनता है। और जब तक वह लड़की ज़िंदा है, हमारा बदला अधूरा है।” प्रतीक ने भी दाँत पीसते हुए कहा।

सिर्फ़ प्रतीक ही नहीं, पूरी चौहान फैमिली यही चाहती थी कि देवराज के परिवार के साथ यही हश्र हो। उसके माता पिता शोभा चौहान और भरत सिंह चौहान, काफ़ी नेकदिल इंसान थे; वे ऐसी मौत मरने के लायक नहीं थे।

जब भी वेद उनके बारे में सोचता, उसका गुस्सा उसके काबू के बाहर हो जाता। वेद मन ही मन बड़बड़ाते हुए बोला, “काश उस वक़्त मैं तुम्हारे असली चेहरे को पहचान पाता! इतनी समझ होती, जो तुम जैसे घटिया इंसान को समझ पाता, तो कभी तुम्हें अपनी माँ-पापा के करीब भी नहीं जाने देता, देवराज ठाकुर।”

वेद के क़दम अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहे थे; उसके पीछे-पीछे प्रतीक भी चल रहा था। गाड़ी में बैठने के अगले पाँच मिनट में प्रतीक ने पूरा कार्ड पढ़ लिया था।

प्रतीक ने कार्ड पढ़ने के बाद वेद की तरफ़ देखकर शांत लहजे में कहा, “इस लड़की की शादी देवेश राजावत के छोटे बेटे से हो रही है। उसके दोनों बेटे दिल्ली में रहते हैं; बस शादी के लिए यहाँ आए हुए हैं।”

“ठीक है, फिर वहीं चलते हैं। राजावत फैमिली से दुश्मनी निभाने का एक और मौक़ा मिल जाएगा।” वेद ने जवाब में कहा।

“हाँ, वेन्यू उनके पुरानी हवेली में रखा गया है, तो जाने में भी टाइम लग जाएगा। उम्मीद है शादी होने से पहले तो हम पहुँच ही जाएँगे।” प्रतीक ने जवाब दिया।

वहीं दूसरी तरफ़, राजावत फैमिली में एक तरफ़ जहां शादी की खुशियों का माहौल चल रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ़ एक बंद कमरे में काफ़ी गहमागहमी का माहौल था। अपने बड़े भाई, तेजेंद्र राजावत, की सारी बात मानने वाला देवेश राजावत इस वक़्त उनसे बहस कर रहा था। साथ ही कमरे में तेजेंद्र का बेटा, अंकुश, भी था।

थोड़ी देर पहले ही अंकुश ने उन्हें देवराज के मरने की ख़बर सुनाई थी। उसे सुनने के बाद तेजेंद्र ने तेज आवाज़ में कहा, “अब हमें उसे लड़की को और झेलने की ज़रूरत नहीं है। हमारा वादा उसके दादा के ज़िंदा रहने तक ही था। गलती से भी अगर वेद सिंह चौहान को पता चल गया कि इस लड़की को हमने पनाह दे रखा है, तो वह हमसे भी अपनी दुश्मनी निकालने पर उतर आएगा। इसका बिज़नेस पर क्या असर हो सकता है, तुम समझ सकते हो।”

देवेश इस बात से सहमत नहीं था। वो गिड़गिड़ाते हुए बोला, “किसी को पता नहीं चलेगा। वैसे भी शिवांशा हमेशा से अरमान और मनन के साथ दिल्ली में रहती आई है; सबको यही लगेगा कि वह मनन की पत्नी है। प्लीज़ ऐसा मत कीजिए भाई साहब।”

अंकुश भी अपने पिता तेजेंद्र की बात से सहमत था। उसने कहा, “चाचू, मैं आपके इमोशन्स समझ सकता हूँ, लेकिन सच में वह लड़की यूज़लेस है। वैसे भी वेद और हमारे बीच पहले से कम राइवलरी नहीं है, और आप उसे एक और बड़ा मौक़ा देना चाहते हैं। मुझे उससे दुश्मनी निभाने में कोई डर नहीं है; मैं हर तरीके से उसे टक्कर देने के लिए तैयार हूँ, आज से नहीं, हमेशा से ही। पर यह मामला थोड़ा हटके है; बात उसके माँ-बाप के क़त्ल की है।”

“और हाँ, हम बीच में बेवजह नहीं पिसना चाहते हैं। हम तो बस उस राज का थोड़ा-सा भागीदार थे; फिर हम क्यों सज़ा भुगतें?” तेजेंद्र ने पल्ला झाड़ते हुए कहा।

अंकुश और तेजेंद्र शिवांशा को खत्म करने पर तुले हुए थे, लेकिन देवेश इसके सख्त ख़िलाफ़ था। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मैंने कभी आपके किसी भी बात के लिए इंकार नहीं किया है। अपने परिवार से अलग आपके साथ रहता हूँ, पर प्लीज़, यह शादी मत रुकवाइए। इस मोमेंट पर शादी रुकने से बहुत बदनामी होगी; ऊपर से मैं मनन को क्या जवाब दूँगा?”

“आपको मनन को एक्सप्लेन करने की ज़रूरत ही क्या है? वैसे भी वह पागल…” अंकुश गुस्से में बोल रहा था।

उसकी बात पूरी होने से पहले ही देवेश ने उसे काटते हुए कहा, “वह पागल नहीं है; ठीक हो रहा है। हाँ, समय के साथ उसका दिमाग इतना विकसित नहीं हुआ है, लेकिन शिवांशा के साथ रहता है तो उसका गुस्सा भी काबू में रहता है। वह उसे बहुत प्यार करता है। प्लीज़, मेरे बेटे के लिए उसे जाने दीजिए; मैं उसका ध्यान रखूँगा; पहले भी उसकी ज़िम्मेदारी अरमान संभाल रहा था।”

“तुम हमें कितने भी बहाने बनाने की कोशिश क्यों ना करो, देवेश, इस लड़की के चक्कर में हम खुद को मुसीबत में नहीं डाल सकते। अंकुश, ऐसा करो कि तुम अपने आदमियों को लेकर जाओ और शादी होने से पहले ही उस लड़की को खत्म कर दो। हम मेहमानों को कह देंगे कि लड़की शादी से पहले किसी और के साथ भाग गई; वैसे भी लोगों को आसानी से यकीन हो जाएगा कि कौन एक पागल लड़के के साथ शादी करके अपनी ज़िंदगी बर्बाद करना चाहेगी।” तेजेंद्र ने अपनी मनमानी करते हुए अंकुश को ऑर्डर दे दिए थे।

देवेश अंकुश को रोकना चाहता था, लेकिन उसने उसे अनसुना किया और एक ईविल स्माइल के साथ कमरे से बाहर निकल गया। वह तो कब से शिवांशा को रास्ते से हटाना चाहता था, पर देवेश के चलते वह कुछ नहीं कर पा रहा था।

जैसे ही अंकुश ने दरवाज़ा खोला, देवेश उसके पीछे आ गया; वहीं दरवाज़े के बाहर खड़े मनन ने उनकी सारी बातें सुन ली थीं। मनन लगभग 25 साल का था और उसी की शादी शिवांशा के साथ होने वाली थी। उसका दिमाग अपनी उम्र के मुताबिक़ विकसित नहीं हुआ था, लेकिन हाँ, कमरे में जो बातें चल रही थीं, वह उन्हें अच्छे से समझ सकता था।

“व… वो… वो मेरी शिवि को मारना चाहते हैं। नहीं, मेरी शिवि को कुछ नहीं हो सकता; मनन उसे बचाएगा। गंदे लोग! मेरी शिवि को मारना चाहते हैं।” मनन ने अपना चश्मा ऊपर करते हुए नाक सिकोड़कर कहा।

वह जल्दी से ऊपर शिवांशा के कमरे में जाने लगा। मनन को सख्त हिदायत मिली थी कि शादी से पहले वह शिवांशा से ना मिले, लेकिन जब वह उसके कमरे की तरफ़ बढ़ने लगा, तो अंकुश की पत्नी, गीतिका, बीच में आ गई।

गीतिका ने अंकुश को देखकर हल्का हँसते हुए कहा, “लगता है आप बड़े हो रहे हो देवर जी, लेकिन थोड़ा इंतज़ार कर लीजिए; आज रात शादी के बाद वह आपकी ही होने वाली है।”

“लेकिन मुझे मेरी शिवि से मिलना है, और आप मुझे नहीं रोक सकतीं। आप गंदी हो; सब गंदे हैं।” मनन ने बच्चों की तरह कहा।

गीतिका मनन को रोकना चाहती थी; अगर वह उसे जाने देती, तो रिश्तेदारों के नाम पर उसी की दो बातें सुनाई जातीं। इसलिए गीतिका ने मनन का हाथ पकड़ लिया। मनन ने अपना हाथ छुड़ाने के चक्कर में गीतिका को धक्का दे दिया, जिससे उसका हाथ बरामदे की रेलिंग पर लग गया।

गीतिका ने गुस्से में चिल्लाकर कहा, “पागल हो तुम? मैं भी तुम्हें कह रही हूँ, पागल ही हो तुम! और वह लड़की बेवकूफ़, जो तुमसे शादी कर रही है! एक बार समझ नहीं आता क्या? उस कमरे में नहीं जाना चाहिए! खैर, तुम पागल हो, लेकिन…”

गीतिका अपने गुस्से में मनन को भला-बुरा सुना रही थी, लेकिन अचानक बोलते हुए उसके शब्द गले में अटक गए। बोलते हुए उसकी नज़र मनन के बड़े भाई, अरमान राजावत पर गई, जो उसे ख़ौफ़ से भरी निगाहों से घूर रहा था।

“वह मैं कब से इन्हें समझाने की कोशिश कर रही हूँ कि शिवांशा के कमरे में नहीं जाना है, लेकिन देखिए ना, बच्चों की तरह जिद कर रहे हैं! फिर आप मम्मी जी को जानते हैं; वह मुझ पर गुस्सा करेगी।” गीतिका ने अपनी सफ़ाई देने की कोशिश की।

अरमान मनन के पास आया और उसके कपड़े सही करते हुए बोला, “गो हेल विद योर फैमिली! आगे से मेरे भाई को पागल कहने की हिम्मत मत करना, वरना पता चल जाएगा कौन पागल है, कौन सही।” इतना कहकर अरमान ने मनन का हाथ पकड़ा और उसे प्यार से कहा, “मेरे कमरे में चलो, बात करते हैं।”

“लेकिन अरमान, वह गंदे लोग… मेरी शिवि…” मनन उसे सब कुछ बताने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अरमान गुस्से में उसकी तरफ़ देखते हुए बस सिर हिलाया, तो मनन बिल्कुल चुप हो गया।

अरमान मनन से उम्र में लगभग चार साल बड़ा था। सिर्फ़ अरमान ही था जिससे मनन थोड़ा डरता था; दूसरी शिवांशा, जो मनन को प्यार से हैंडल कर सकती थी। प्यार तो अरमान भी बहुत करता था अपने भाई से; यही वजह थी कि अपनी फैमिली से दूर वह मनन और शिवांशा से अलग दिल्ली में अपना अलग बिज़नेस करता था। उसे राजावत फैमिली से सख्त चिढ़ थी।

उनसे अलग अपने कमरे में आते ही अरमान ने मनन को देखकर उसकी आँखों में देखते हुए इंटेंस वॉइस में कहा, “क्या हुआ मनन? इतना एग्रेसिव क्यों हो रहे हो?” वह अच्छे से जानता था कि मनन का यह गुस्सा बेवजह नहीं है।

“वह… वह अरमान, मैंने उनकी बातें सुनी थीं। उन्होंने कहा कि वह शिवि को मार देंगे क्योंकि उसके दादाजी की मौत हो गई है। वह मेरी शिवि को आज मारने वाले हैं; शादी नहीं होगी; शिवि की मौत होगी! बचा लो उसे।” मनन ने रोते हुए बताया।

मनन का दिमाग बच्चों की तरह था, पर ऐसा नहीं था कि अरमान ने उस पर यकीन नहीं किया; वह अपनी फैमिली को अच्छे से जानता था।

“तुम चिंता मत करो; आज रात शादी होगी और तुम्हारी शिवि को कुछ नहीं होगा; यह वादा है मेरा। एक प्रॉमिस तुम भी करोगे; किसी से कुछ नहीं कहोगे।” अरमान ने कहा और अपना हाथ आगे कर दिया। अगर वह मनन से यह प्रॉमिस नहीं लेता और इस बारे में उसके घरवालों को भनक भी होती, तो वे उसे भी नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते।

मनन ने अपना हाथ अरमान के हाथ पर रखा और कहा, “पक्का प्रॉमिस।”

इसी के साथ अरमान के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसका सख्त दिखने वाला चेहरा इस हल्की-सी मुस्कान के साथ खिल उठा था।

मनन को वहीं पर छोड़कर अरमान कमरे से बाहर निकला। वह बात करने के लिए सीधे देवेश के पास जा रहा था; तो इस बीच अंकुश शिवांशा के कमरे में पहुँचा।

शिवांशा इस वक़्त अपने रूम में अकेली थी। मेकअप आर्टिस्ट बस उसे तैयार करके ही गई। डार्क मैरून लहंगे के साथ हैवी ज्वेलरी पहने शिवांशा इस वक्त बिल्कुल किसी राजकुमारी की तरह सजी थी। वो लगभग 21 साल की थी। गोरा रंग, खूबसूरत छोटी आँखें, उभरे हुए बराबर होंठ और उस पर उसकी मासूमियत देखते ही बनती थी।

शिवांशा ने एक नजर खुद को आईने में देखा। उसके चेहरे पर इस शादी की कोई खुशी नहीं थी। हां, अहसानों के बोझ तले दबी शिवांशा को एक मौका मिला था, राजावत फैमिली के एहसान चुकाने का, तो वो मना नहीं कर पाई। वैसे भी उसकी जिंदगी राजावत फैमिली के बदौलत ही थी।

अचानक कमरे में अंधेरा हो गया, तो शिवांशा ने घबराकर पीछे की तरफ़ देखा; उसे किसी के आने की आहट महसूस हुई।

“क… कौन है? गीतिका भाभी, आप आई हैं क्या?” शिवांशा ने घबराहट के साथ पूछा।

अचानक किसी ने उसके मुँह पर हाथ रखा। वह अंकुश था। उसने शिवांशा को शांत करने के लिए अपना एक हाथ उसके मुंह पर रखा, तो दूसरे हाथ से उसने उसे बुरी तरह दबोच कर खुद के करीब कर लिया। शिवांशा तो मानों वही जड़ हो गई हो।

शिवांशा कुछ समझ पाती, उससे पहले वह उसे दबोचते हुए वहाँ से कमरे के दूसरे दरवाज़े से ले जाने लगा। हवेली वैसे भी पुराने जमाने के हिसाब से बनी हुई थी, जिसमें एक कमरे में एक से ज़्यादा दरवाज़े थे।

“क्या लगा था बेबी गर्ल, बचने का मौका मिल जाएगा। शादी तो आज रात तुम्हारी नहीं होगी, लेकिन वादा करता हूँ, बिना **** मनाए नहीं मरने दूँगा।” अंकुश ने शिवांशा के कान में धीरे से कहा। यह सुनकर उसकी आँखें डर के मारे फैल गई थीं।

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फिलहाल के लिए इतना ही, उम्मीद है आप कहानी के साथ कनेक्ट कर पा रहे हो। बाकी मैने इसे बहुत दिल से लिखा है। पढ़कर समीक्षा जरूर कीजियेगा।

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