His young little bride - Chapter 1
“मिस्टर चौहान, वो अपने आखिरी वक्त में आपसे मिलना चाहता है। मुझे नहीं लगता, उसके पास ज्यादा टाइम रहा है।” कॉल पर एक आदमी ने धीमी कड़क आवाज में कहा।
वह आदमी इस वक़्त गवर्नमेंट हॉस्पिटल में खड़ा था। वह एक जेलर था। बोलते हुए उसने अपने सामने देखा, जहां एक लगभग 70 साल का बूढ़ा आदमी अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा था।
“वेद... वेद को बुलाओ। वेद सिंह चौहान... उसे बुलाओ। एक बार मिलना है बस... बुला दो।” बूढ़ा आदमी लड़खड़ाते हुए, धीमी आवाज़ में बोला। उसकी सांसे उखड़ रही थी।
वो बूढ़ा आदमी कब से वेद सिंह चौहान को बुलाने के लिए गिड़गिड़ा रहा था, तो वही कॉल पर मौजूद वेद के कानों में उसकी आवाज पड़ी, तो उसने अपनी गहरी भूरी आंखों को कसकर बंद कर लिया। वो टाई बांध रहा था। उस आवाज को सुनकर उसके हाथ रुक गए थे और नसे तनने लगी थी।
उसकी आंखों के सामने कुछ दृश्य तैरने लगे, जो खुशनुमा तो बिल्कुल नहीं थे। उन यादों में वो बूढ़ा आदमी, थोड़ा जवान लग रहा था। वो हाथ में एक तलवार लिए खड़ा था, तो वही जमीन पर दो लाशें पड़ी थी।
वेद का ध्यान तब टूटा, जब जेलर ने एक बार फिर से पूछा, “मिस्टर चौहान आप आ रहे है?”
वेद ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और कॉल कट कर दिया। कॉल कट हो जाने के बाद बूढ़े आदमी ने जेलर की तरफ देखकर पूछा, “आपने उन्हें सब बता दिया है ना? क्या जवाब दिया उसने? क्या वह यहां आ रहे हैं? ”
“मैंने उन्हें कॉल कर दिया है। अब यह उन पर डिपेंड करता है कि वे यहाँ आते हैं या नहीं।” जेलर ने जवाब दिया।
हॉस्पिटल बेड पर मौजूद आदमी कोई और नहीं, वेद सिंह चौहान के परिवार का किसी वक़्त का ख़ास विश्वासपात्र आदमी देवराज ठाकुर था। वह इस वक़्त जेल में इसलिए था क्योंकि उसने वेद सिंह चौहान के माता-पिता की हत्या कर दी थी।
जेलर भी हैरान था, कि जिस इंसान की खुशियां देवराज ने खत्म कर दी, आखिर वो अपने आखिर समय में उसे ही क्यों याद कर रहा है। भला वेद उस आदमी से मिलने क्यों जाएगा, जिसने उसके मां पिता को इतनी बेरहमी से मार डाला था।
उन सब से अलग, चौहान पैलेस में वेद इस वक़्त अपने कमरे में, बिना किसी भाव के, दीवार पर लगी तस्वीरों को देख रहा था। उन तस्वीरों में वह अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ था। अपने पेरेंट्स की तस्वीर देखते हुए वेद की आंखों में एक खालीपन उतर आया था।
बीस साल पहले हुए हादसे ने उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया था। एक हंसते खेलते हुए परिवार को एक झटके में अनाथ में कर दिया था, देवराज ने।
वेद का मोबाइल एक बार फिर बजा। जेलर उसे फिर से कॉल कर रहा था। इसी के साथ वेद का ध्यान टूटा और उसके चेहरे के भाव बेहद सर्द हो गए थे।
“देवराज ठाकुर, खुशकिस्मत हो, जो जेल में हो और बच गए। वरना तुम्हारा भी वही हश्र तुम्हारा होता, जो तुम्हारे परिवार हुआ था।” वेद ने कोल्ड टोन में कहा।
वेद सिंह चौहान कोई आम शख्शियत नहीं था, वो उदयपुर की रॉयल फैमिली से बिलॉन्ग करता था। इतनी आसानी से वेद उन लोगों को कैसे जाने दे सकता था, जिसने उसके हंसते खेलते घर को बर्बाद कर दिया था।
“एक आखिरी बार, तुम्हे आखिरी सांस लेते देखकर शायद मेरे दिल को सुकून मिले। आज तुम्हारे अंत के साथ तुम्हारे खानदान का नामों निशान इस दुनिया से मिट जाएगा। अगर तुमने खुद को बचाने के लिए पुलिस का सहारा ना लिया होता, मैं तुम्हें तुम्हारे गुनाहों की सजा जरूर देता।” वेद ने गहरी सांस लेकर कहा।
वेद ने अपना मोबाइल उठाया और नीचे जाने लगा।
उसके चेहरे का औरा इस वक्त काफी ख़तरनाक लग रहा था। दिखने में बिल्कुल फ़िट एंड फ़ाइन, लगभग छह फीट हाइट, मस्कुलर बॉडी, शार्प फ़ेशियल फ़ीचर्स, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, हल्का गोरा रंग। वह दिखने में लगभग 30 साल के आसपास लगता था। उसकी फ़िटनेस भले ही उसकी उम्र को छुपा देती थी, लेकिन वेद उम्र में लगभग 37 साल का था। उसने ब्लैक ब्रैंडेड सूट पहना था। उसने हाथ में एंटीक एक्सपेंसिव वॉच थी।
वेद नीचे जा रहा था, तभी उसके क़दम रुक गए। उसके कानों में उसकी छोटी बहन नव्यांशी की आवाज़ पड़ी, जो उनके घर के बड़े से हॉल में, उसके छोटे भाई वंश की पत्नी आराध्या की तरफ़ बढ़ रही थी।
“आप बेवजह इतनी मेहनत कर रही हो, आराध्या भाभी! आप जानती है, वो अपना बर्थडे सेलिब्रेट नहीं करते है।” नव्यांशी ने सख़्त और भारी आवाज़ में कहा।
इसी के साथ केक तैयार कर रही आराध्या के हाथ रुक गए। उसने पलट कर उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, “नवी, तुम बात करके देखो ना भाई से, वो किसी की बात भी टाल सकते हैं, पर तुम्हारी बात कभी नहीं टालते हैं। ऐसे कब तक वो अपने छोटे भाई-बहनों की खुशी के लिए खुद को नज़रअंदाज़ करते रहेंगे?”
आराध्या की बात सुनकर नव्यांशी ने हाँ में सिर हिलाया। उसने केक उठाया और आराध्या को अपने पीछे आने का इशारा किया। उन दोनों के क़दम बाहर की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनके बाहर निकलते ही, दो लड़के भी उनके साथ हो गए। वो दोनों वेद के छोटे भाई वंश और अक्षत थे।
“आज तो हम बड़े भैया को मना ही लेंगे।” उनमें से एक लड़का खुश होकर बोला। वो अक्षत था, वेद का सबसे छोटा भाई, जो 23 साल का था।
उसके साथ चल रहे लड़के के भाव सख़्त थे। वे सब वेद से बात करने जा रहे थे। उनका मक़सद एक ही था—अपने बड़े भाई वेद सिंह चौहान को उनका बर्थडे सेलिब्रेट करने के लिए मनाना।
अचानक उनके क़दम वहीं पर रुक गए, क्योंकि सामने वेद हाथ बाँधकर, सख़्त अंदाज़ में खड़ा था। उसे देखते ही उनके मुँह से टूटा-फूटा एक शब्द तक नहीं निकल रहा था।
नव्यांशी ने अपने हाथ में पकड़ा केक जल्दी से पीछे कर लिया। उनके इरादों को जानते हुए भी वेद ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया और तेज क़दमों से चलकर जाने लगा।
उसके बाहर क़दम रखते ही, वेद के सबसे छोटे भाई अक्षत ने कहा, “पीछे से हम लोग इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उनके सामने आते ही पता नहीं क्या हो जाता है कि एक शब्द भी नहीं निकलता।”
“हां सोचा था, आज भाई को मना लेंगे, पर हम तो अपने दिल की बात तक नहीं रख पाए।” वंश की पत्नी आराध्या ने बुझे स्वर में कहा।
“यह बड़े भैया इतने सख़्त बनकर क्यों रहते हैं?” अक्षत ने मुंह बनाकर कहा।
अक्षत की बात सुनकर वंश ने सिर हिलाकर कहा, “क्योंकि एक ढाल हमेशा सख़्त होती है। वेद सिंह चौहान इस चौहान फैमिली की ढाल है, जो हमें हर ख़तरों से बचा रही है। हम भले ही उनके सामने एक शब्द ना कह पाए, पर मत भूलो हमारे बिना कुछ कहे ही वो हम सबकी बात समझ जाते है।”
हाँ, वेद सिंह चौहान उन सब की ढाल था, जिसने अपने भाई-बहनों की खुशियों के आगे खुद की भी परवाह नहीं की। यही वजह थी कि वेद 37 साल का हो गया था, फिर भी अब तक अनमैरिड था, जबकि उसके छोटे भाई वंश की शादी हो चुकी थी, नव्यांशी अभी बिजनेस में इंटरेस्ट ले रही थी, तो उसने इस बारे में सोचा नहीं था, जबकि अक्षत की स्ट्डीज चल रही थी।
वेद उनके लिए उनका मां और पिता दोनों था। उनकी वो इज़्ज़त भी करते थे और बहुत ज्यादा प्यार भी। वही था, जिसने अपने भाई बहनों को हर खतरे से बचाया। वरना जिस तरह से उनके पेरेंट्स की मौत हुई थी, उससे साफ था कि खतरा तो उन पर भी आया था।
वो सब उसे रोकने की कोशिश तक नहीं कर पाए, तो वही वेद तेज कदमों से चलते हुए बाहर जा रहा था। जैसे ही वेद बाहर निकला, एक 30 साल का आदमी उसके पीछे पीछे चलने लगा।
“हॉस्पिटल जाना है प्रथम..।” वेद ने सीधे चलते हुए कहा।
वो प्रथम शेखावत था, वेद का ममेरा छोटा भाई और पर्सनल सिक्योरटी मैनेजर। प्रथम उसके साथ ही रहता था।
अगले ही पल वो दोनों एक लग्ज़रियस ब्लैक मर्सिडीज़ में थे। उसके आगे-पीछे गार्ड्स की एक-एक छोटी गाड़ी भी चल रही थी।
लगभग 1 घंटे में वेद हॉस्पिटल पहुँच चुका था। वेद सिंह चौहान कोई आम शख़्सियत नहीं था; उसके रुतबे से हर कोई वाकिफ़ था। जैसे-जैसे वेद अस्पताल के अंदर आगे बढ़ रहा था, आसपास के लोग साइड हटने लगे। वेद सीधा देवराज ठाकुर के कमरे में पहुँचा और सबको इशारे से बाहर जाने को कहा। हां, बस प्रथम उसके साथ था।
देवराज ने वेद की तरफ़ देखा और अपने हाथ जोड़ने की कोशिश करने लगा, तभी वेद ने उसे ठंडी आवाज़ में कहा, “अब माफ़ी माँगने या हाथ जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। कुछ गुनाहों की कोई सज़ा नहीं होती है।”
“मैं मजबूर था।” देवराज ठाकुर ने धीमी आवाज़ में कहा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
वेद ने उसकी बात पर सिर हिलाकर, अपनी इंटेंस आवाज़ में कहा, “तुम मजबूर नहीं, धोखेबाज थे। तुम्हारे धोखे की सजा तुम्हारी फैमिली ने चुकाई। तुम अपने परिवार के आखिरी इंसान रहे हो, और आज तुम्हारी मौत के साथ मेरे मां पापा की आत्मा को सुकून मिलेगा।” वेद की नज़रें इस वक्त बेहद सर्द थी।
“मैंने नहीं मारा।” अचानक देवराज बोला, “मैं बस कठपुतली था।”
उसका कहा एक एक शब्द वेद के गुस्से में इजाफा कर रहा था। उसने अपनी दांत पीसते हुए कहा, “तो जिन्होंने भी तुम्हारी डोर खींची थी, मैं उन्हें भी ढूंढ लूंगा, और ट्रस्ट मी तुम्हारे परिवार की तरह उन्हें भी खत्म कर दूंगा।”
देवराज बिल्कुल शांत था। वेद ने गहरी सांस लेकर अपने गुस्से को काबू करके पूछा, “नाम नहीं बताओगे?”
देवराज की नज़रें नीची हो गई थीं।
“जब कुछ बताना ही नहीं था, तो यहाँ क्यों बुलाया? तुम्हारे पास फालतू समय होगा, लेकिन वेद सिंह चौहान के वक़्त की बहुत क़ीमत है।” वेद ने सख्ती से कहा और फिर वहाँ से जाने लगा तभी देवराज ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
“मुझे माफ कर दो।” देवराज ने रोते हुए, कमज़ोर शब्दों में कहा।
वेद के क़दम वहीं पर रुक गए। वह उसकी तरफ़ पलटा और बोला, “कभी नहीं।”
देवराज की आंखों में पछतावा जरूर था, पर साथ ही चेहरे पर एक सुकून भी। उसने आगे वेद को रोकने की कोशिश नहीं की। देवराज जैसा इंसान सिर्फ माफी मांगने के लिए वेद को नहीं बुलाने वाला था।
जैसे ही वेद कमरे से बाहर गया, देवराज ने मन ही मन कहा, “इसे लगता है इसने मेरे पूरे खानदान को खत्म कर दिया, इसका मतलब ये आज तक उससे अनजान है। मेरे गुनाहों की सज़ा मेरे परिवार को मिली, लेकिन शुक्र है, जो वो मासूम बच गए। वेद सिंह चौहान को उनके बारे में पता नहीं है, इसका मतलब साफ है, उन्होंने अपना वादा निभाया। वह आज भी मेरे बच्चों की रक्षा कर रहे हैं।”
देवराज अब सुकून से मर सकता था। वेद की नजरों में उसका खानदान भले ही खत्म हो गया हो लेकिन आज भी कोई जिंदा था, जिससे वह बहुत प्यार करता था और बचाना भी चाहता था। मरने से पहले देवराज यह सुनिश्चित करना चाहता था कि वेद को उनके बारे में पता है या नहीं। बस यही सोचकर उसने उसे यहां बुलाया था।
देवराज आंखें बंद करके अपनी मौत का इंतजार करने लगा। वह जानता था कि अब उसके पास ज्यादा वक्त नहीं बचा है।
“ईश्वर तुम्हें दुनिया की सारी खुशियां दे। और तुम पर कभी वेद सिंह चौहान की नजर ना पड़े मेरी बच्ची।” देवराज ने मन ही मन प्रार्थना की। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट थी।
वही वेद ने जैसे ही कमरे से बाहर कदम रखा, एक कांस्टेबल उसके पास आया। उसने एक शादी का कार्ड और लेटर देते हुए कहा, “सुबह ही कोई यह शादी का कार्ड देकर गया था। उसके साथ में यह लेटर भी है।”
“और यह तुम मुझे क्यों दे रहे हो? ” वेद में बिना किसी भाव के पूछा।
देवराज पर नजर रखने के लिए वेद ने उस कांस्टेबल को लगा रखा था। उसे पहले ही शक था कि देवराज अकेले यह साजिश नहीं कर सकता था, पर इतने सालों में देवराज से मिलने कोई नहीं आया था।
“क्योंकि आपका बदला अभी अधूरा है। मैंने यह लेटर पढ़ा था। जानते हैं यह किसकी शादी का कार्ड है? देवराज ठाकुर की पोती शिवांशा ठाकुर का। आपको लगता है कि आपने उसके पूरे परिवार को खत्म कर दिया जबकि अभी भी यह लड़की जिंदा है।” कांस्टेबल ने वेद को सब कुछ बताया।
सारी बात जानकर वेद की आंखें सर्द होने लगी और वह समझ गया था कि देवराज ने उसे यहां क्यों बुलाया होगा। वेद ने कांस्टेबल को वहीं पर छोड़ा और जल्दी से वापस कमरे के अंदर गया। उसे फिर से अपने सामने देखकर देवराज के चेहरे पर घबराहट के भाव थे।
“शिवांशा ठाकुर? यही नाम है ना उसका? डॉक्टर ने कहा कि तुम मरने वाले हो तो खुद को 24 घंटे रोक कर रखना, क्योंकि तुम्हारे मरने से पहले तुम्हारे खानदान के आखिरी अंश को भी खत्म करना बाकी है। कहा था ना, तुम्हारे घरवालों के अंतिम दर्शन तक नहीं नसीब नहीं होने दूंगा। ” वेद ने दांत पीसते हुए कहा और फिर वहां से चला गया।
वही देवराज की आंखें डर से पथराने लगी थी। वेद को बुलाकर ये जानने की कोशिश करना कि वह शिवांशा के बारे में जानता है या नहीं, देवराज की जिंदगी की दूसरी बड़ी गलती साबित होने वाली थी।
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