सुहागरात ए लव स्टोरी - Chapter 3
### **हाल – नई नवेली दुल्हन, पुराना स्वभाव**
गुलाब और चमेली की मिली-जुली खुशबू से सजा वह भव्य हॉल — जहाँ रिश्तेदारों की चहक, बच्चों की खिलखिलाहट, ढोल की थाप और औरतों की हँसी गूंज रही थी।
चारों तरफ रेशमी चादरें, रंग-बिरंगे परदे, और बीच में सजे दो कुर्सियाँ। एक कुर्सी पर बैठी थी **शामली** — लाल साड़ी, भारी घूंघट, हाथों में मेंहदी रचे हुए, गहनों से लदी हुई। उसकी उंगलियाँ बार-बार काँपती थीं… और दिल की धड़कन जैसे कोई अनसुना खत पढ़ रही हो।
तभी बाईं ओर की सीढ़ियों से नीचे उतरते **विश्वनाथ प्रताप सिंह** दिखे — सफेद कोर्ट में, बाल करीने से सजे, लेकिन चेहरे पर वो ही सख्त रवैया। उनके कदम धीमे थे, जैसे मन कहीं और अटका हो।
**"विश्वू!"** — पीछे से आवाज आई।
**मां थी**, माथे पर छोटी सी बिंदी, हल्का ज़ेवर, लेकिन आँखों में वही पुरानी ठसक।
"कहाँ जा रहे हो बेटा? अभी तो रस्में शुरू भी नहीं हुई। तैयार होकर कहाँ निकल पड़े?"
विश्वनाथ के कदम रुक गए, और चेहरा ज़रा भी नरम नहीं पड़ा।
**"ऑफिस जाना है मां।"** — आवाज़ में वही ठंडी कठोरता।
"ऑफिस?" मां की भौंहें उठीं, "आज तुम्हारी शादी की अगली रस्म है। नई बहू आई है घर में… और तुम—?"
विश्वनाथ ने सीधा जवाब दिया, बिना घुमाव के।
**"आपकी बहू है, आप देखिए। मुझसे मत कहिए।"**
सन्नाटा।
पास खड़ी दो बुआओं ने एक-दूसरे को देखा। एक नौकरानी जो पानी की ट्रे लेकर आ रही थी, ठिठक गई।
मां की पेशानी पर शिकन उभर आई, मगर वह अब भी संयम में थीं। थोड़ा पास आकर फुसफुसाईं — लेकिन आवाज़ शामली तक भी पहुँच गई।
**"विश्वू, बेटा… ये रस्में सिर्फ लड़की की नहीं होतीं। तुम भी उसका साथ दो। वो सब कुछ अकेले थोड़ी करेगी?"**
विश्वनाथ का चेहरा तन गया।
वो दो क़दम पीछे हटे, जैसे हर रस्म से दूरी बनाना चाहते हों।
**"मां, ये शादी मैंने आपकी ज़िद पर की है। रस्म-रिवाज़ निभाने के लिए नहीं।"**
**"मुझे न तो शादी में कोई दिलचस्पी थी, न ही इस तमाशे में।"**
इतना कहकर उन्होंने एक तीखी नज़र शामली पर डाली — बस एक पल के लिए।
शामली, जो अब तक शांत बैठी थी, उसका चेहरा ज़रा भी हिला नहीं… लेकिन उसका दिल?
उसके भीतर कुछ चटक गया था। शायद एक सपना। या शायद वो भ्रम, जो उसे सुबह तक यह विश्वास दिला रहा था कि कुछ तो खास होगा आज… कि कोई तो पल होगा जहाँ वो उसकी तरफ देखेगा… मुस्कुराएगा…
पर वहाँ जो था — वो सिर्फ सर्द हवाओं जैसा व्यवहार था।
बगल में बैठी एक महिला ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा, लेकिन शामली की आँखें अब धुंधला चुकी थीं। उसका सिर झुका रहा, मगर अंदर कुछ टूट रहा था।
उधर, विश्वनाथ पलटे और सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। हर कदम उनके ठंडे इरादों की गवाही देता जा रहा था।
मां वहीं खड़ी थीं — गुस्से और लाचारी के बीच जूझती हुई।
**"तू तो पहले जैसा ही है…"** — उन्होंने धीमे से कहा, शायद खुद से ही।
चारों तरफ हलचल अब भी थी, पर उस हॉल के कोने में बैठी नई दुल्हन और ऊपर जाते विश्वनाथ के बीच **एक बहुत बड़ा सन्नाटा फैल गया था।**
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**कुछ पल बाद…**
रस्में फिर शुरू हो गईं। ढोल फिर बजने लगे। शामली को हल्दी की थाली पास दी गई।
उसके चेहरे पर अब मुस्कान नहीं थी — बस एक ठहरी हुई चुप्पी।
मां ने सब संभालने की कोशिश की। रिश्तेदारों से मुस्कुराकर बात की। नौकरों को निर्देश दिए। लेकिन उनकी आँखों में अब चिंता थी।
रात का ये पहला झटका था — जिसे सिर्फ शामली नहीं, पूरा घर महसूस कर रहा था। वही कोने में खड़ा आर्यन ये सब देख उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं , जैसे जो कुछ हुआ उसे समझ नहीं आया ,