सुहागरात ए लव स्टोरी Ch. 2

सुहागरात ए लव स्टोरी - Chapter 2

Posted by Moon Star • Jul 21, 2025 09:12 PM

सुबह की हल्की धूप खिड़की की जाली से छनकर कमरे में उतर रही थी, लेकिन **कमरे का माहौल अब भी रात जैसी भारी चुप्पी से भरा था।**

साड़ी के टुकड़े, टूटी चूड़ियाँ और बिस्तर की सिकुड़ी चादरें — सब गवाही दे रहे थे कि रात ने यहाँ कोई तूफ़ान देखा है।

**दरवाज़े पर दस्तक हुई।**

**ठक… ठक…**

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने धीरे से आँखें खोलीं। बिस्तर के बाईं ओर **शामली** अब भी गहरी नींद में थी — उसका चेहरा थका हुआ था, बाल बिखरे हुए, और होंठों पर हल्की थरथराहट बाकी थी।

वो उठ कर दरवाज़े तक गया। लकड़ी के भारी दरवाज़े की सांकल हटी।

**बाहर नौकरानी खड़ी थी — साड़ी की पल्लू सिर पर, आँखें झुकी हुईं।**

“मालिक… माता जी ने बुलाया है… कह रही थीं बहू को नीचे भेजिए… आज बहुत सारी रस्में करनी हैं।”

विश्वनाथ ने एक नजर पलंग की ओर डाली, फिर ठंडी आवाज़ में बोला —

“वो अभी तक सो रही है…”

नौकरानी ने हल्का सिर हिलाया, “मैं बता दूँगी माता जी को।”

वो पलटी और सीढ़ियाँ उतर गई।

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नीचे हवेली की रसोई और प्रांगण में चहल-पहल थी।

**माता जी — सावित्री देवी**, लगभग 65 की उम्र, अब भी सीधी पीठ, घुटनों में लोहे की रॉड, लेकिन आवाज़ आज भी तलवार जैसी तेज़।

वो दरबार हॉल में बैठी थीं, पान की डिब्बी पास रखी हुई और हाथ में रुद्राक्ष की माला।

नौकरानी उनके पास पहुँची।

“माता जी… वो… बहू तो अब तक सो रही है…”

सावित्री देवी की आँखों में गुस्से की परछाईं दौड़ गई।

“सो रही है?”

उनका स्वर जैसे कड़कती बिजली।

“आज पहली सुबह है उसकी… और ये राजकुमारी सो रही है? किस घर में आई है वो जानती है?”

उन्होंने गुस्से में माला ज़मीन पर पटक दी।

“बोल देना उसे… आज से छूट नहीं मिलेगी। इस हवेली में बहुओं को सज़-धज कर रहना पड़ता है… और उठना तो **पहली मुर्गे से पहले** होता है!”

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उसी वक्त ऊपर कमरे में...

शामली नींद में थी, लेकिन करवटें बता रही थीं कि उसका शरीर थक चुका था। उसकी पीठ पर नीले निशान थे, और आँखों के नीचे हल्का काजल फैला हुआ।

**विश्वनाथ बगल में बैठा, उसे देख रहा था। फिर तैयार होने लगा कोर्ट वगैरह पहनने लगा**

वो अब भी बेतहाशा सुंदर लग रही थी — लेकिन उस सुंदरता में अब मासूमियत से ज़्यादा थकान और सौंपे जाने की लाचारी थी।

उसने अपने हाथों से विश्वनाथ के हाथ पर सहलाया, और बुदबुदाया —

“आपने कल कुछ नहीं कहा…”

तभी विश्वनाथ ने उसका हाथ झटकते हुए कहा —

“अब ज़्यादा मत सोना, नीचे जाओ… आज की रस्में हैं। और माँ वैसे भी किसी को माफ नहीं करती।”

शामली ने धीरे से आँखें खोलीं।

गला सूखा था, लेकिन बोली —

“ठीक है… मैं तैयार हो जाऊँगी।”

वो मन में सोची कि विश्वनाथ उसके साथ इस तरह क्यों बात कर रहा है , विश्वनाथ उससे थोड़ा रूट अंदाज में बता किया था ,

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कुछ देर बाद…

नीचे दरबार हॉल में, बड़े थाल सजे हुए थे। पीतल की परातें, लाल सिंदूर, हल्दी, मिठाई और एक बड़ी **चाँदी की जोड़ी** — जिसे नई दुल्हन को पहनना था।

**सावित्री देवी**, सिर पर लाल चुनरी, गले में मोटी सोने की माला, अब सामने बैठी थीं।

शामली सीढ़ियाँ उतरते हुए आई।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन आँखें अब भी रात की परछाइयों से भरी हुई थीं।

**साड़ी पूरी ढकी हुई**, गहनों से लदी, लेकिन चाल में थकान की सी लचक।

सावित्री देवी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“बहू… ये हवेली कोई आरामगाह नहीं है। यहाँ काम होता है, औरतें दिन में चार बार हाथ धोती हैं, आराम करने नहीं बैठतीं।”

शामली ने सिर झुका दिया।

“जी माता जी।”

“आज कई रस्में हैं… रसोई में पहला भोग, आँगन में तुलसी पूजन, और फिर देवकक्ष में पूजा। और हाँ… हमारे खानदान की परंपरा है — **पहली सुबह बहू नहाकर तुलसी के नीचे दिया जलाए… और अपने पति के लिए व्रत रखे।**”

शामली कुछ कहती, उससे पहले सावित्री देवी ने रुकाया —

“रात जो भी हुआ हो… आज से बहू को **बांध कर रखना होगा**। इस घर की इज़्ज़त बहुओं की चाल में दिखती है।”

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आँगन में तैयारियाँ हो चुकी थीं।

शामली अब तुलसी चौरे के सामने बैठी थी — हाथ में तेल का दिया, माथे पर सिंदूर, और होंठों पर बेमन की मुस्कान।

पीछे खड़ा था **आर्यन** — चुपचाप, बिना बोले।

वो उसे देखता रहा — वही लड़की… जिसके लिए वो कॉलेज में शायरी लिखता था… वही, जो अब उसके बाप की दुल्हन बन चुकी थी।

उसका दिल जल रहा था, लेकिन चेहरा पत्थर हो चुका था।

अचानक शामली ने पीछे मुड़कर देखा।

दोनों की आँखें मिलीं…

सिर्फ एक पल…

लेकिन उस एक पल में **हज़ार कहानियाँ घुल गईं**।

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**और अब नई जंग शुरू होने वाली थी…**

**रिवाज़ों से… हवेली से… और सबसे बड़ी — उस रिश्ते से, जिसकी पहली रात में आग थी और सुबह में राख।**

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