प्रेम बंधन - Chapter 2
राजकीय सेना की एक टुकड़ी उस गाँव में प्रवेश करके कर वसूलने लगी थी। वे मानो किसी लूटपाट में लगे हुए थे। धन नहीं मिला तो अनाज और पशुओं को ले जाने का उनका प्रयास था। ऐसा ही कुछ उन्होंने अमृत की गायों के साथ भी करना चाहा, परंतु वह उन्हें रोकने के लिए मार्ग में आकर खड़ा हो गया।
गुस्से में एक सैनिक ने अमृत को दूसरी ओर धकेल दिया, जिससे उसके हाथ में चोट लग गई। एक चीख के साथ उसने रोना शुरू कर दिया।
उसी समय अपने शरीर के ऊपरी हिस्से पर एक वस्त्र ओढ़े हुए वैष्णव बाहर आया। उसने चेहरे को भी ढकने का प्रयास किया था, क्योंकि बाहर क्या हो रहा है इससे वह अनजान था।
अमृत को नीचे गिरा हुआ देख वैष्णव ने मुख खोलकर गहरी साँस छोड़ी और उसके पास पहुँच कर उसका हाथ पकड़ लिया, "यह क्या हो गया?"
अमृत के हाथ पर खरोंच आ गई थी। रक्त बहने लगा था, परंतु उसे अपनी नहीं, बल्कि अपनी गायों की चिंता थी।
"वे हमारी प्रिय गायों को ले जा रहे हैं।" अमृत ने रोते हुए उस दिशा में देखा।
उसी समय तिलक राजकुमार के पास आकर बोला, "आप बाहर क्यों आ गए, राजकुमार?"
"यह सब क्या हो रहा है, तिलक? ये राजकीय सैनिक हैं न? फिर यह लूटपाट कैसी?" वैष्णव हैरत में था।
तिलक ने सिर झुका लिया, "यह सब सामान्य है, राजकुमार। आप ध्यान न दें तो बेहतर रहेगा।"
तभी वैष्णव के कानों में एक वृद्धा की आवाज पड़ी, "कृपया हमारे साथ यह अन्याय न करें स्वामी। ये पशु और अन्न आप ले जाएंगे तो हमारे बच्चे क्या खाएँगे? महाराज के पास तो किसी वस्तु की कमी नहीं होगी, फिर हमारा एक गाँव छोड़ दिया जाए तो उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ प्राकृतिक आपदाएँ अन्य स्थानों के मुकाबले अधिक आती हैं।"
एक प्रमुख सैनिक उस वृद्धा की ओर मुड़कर बोला, "अपना मुँह बंद रखो, बुढ़िया । वरना जीभ काट देंगे तुम्हारी।" उसने तलवार भी निकाल ली थी।
वैष्णव अधिक समय तक यह सब देख नहीं पाया और खड़ा होकर तेज आवाज में बोला, "जो भी हो रहा है इसे तुरंत रोको।"
मुख्य सैनिक वैष्णव की ओर देखते हुए बोला, "हमने कहा न, मुँह बंद रखो वरना जीभ काट देंगे? यह नियम सब पर लागू होता है। अब हमें परेशान न करो बालक। हमें अपना कार्य करने दो।"
"क्या यह सब महाराज के आदेश से हो रहा है?" वैष्णव ने प्रश्न किया।
"हाँ, हो रहा है।" सैनिक लापरवाही से बोला।
"इसका शीश धड़ से अलग कर दो, तिलक, जो हमारे पिताश्री को बदनाम करने का प्रयास कर रहा है ।" वैष्णव की तेज आवाज सुनकर वहाँ सब कुछ मानो थम गया। उसने सिर से ओढ़ा कपड़ा हटा लिया, तो सामने खड़ा सैनिक अपने स्थान पर लड़खड़ा गया। इससे पहले कि उसके मुँह से एक भी शब्द निकलता, तिलक की तलवार के एक तेज प्रहार से उसका शीश धड़ से अलग होकर धरती पर गिर गया।
सैनिक के गिरते ही कुछ चीखों के साथ सभी गाँववासी पीछे हट गए। अन्य सैनिक डर से काँप उठे। सब जहाँ थे वहीं जम गए।
तिलक की तलवार से रक्त की बूँदें टपक रही थीं। उसने तलवार को एक झटका देकर रक्त झाड़ा और तलवार पुनः म्यान में डाल ली।
अचानक ही कुछ आवाजें हुईं और संपूर्ण गाँव के साथ सैनिकों की टोली भी राजकुमार के सम्मान में घुटनों पर आ गई।
वैष्णव के कंधे तक पहुँचते बाल हवा में उड़ रहे थे। कानों में सोने के छोटे से कुंडल थे। उसके चेहरे पर एक प्रकार की गंभीरता और तेज दृष्टिगोचर हो रहा था। उसकी बढ़ती आयु का प्रभाव उसके शरीर पर अभी से प्रकट होने लगा था।
अगले ही क्षण गाँव का मुखिया वहाँ पहुँच गया। उसके साथ उमेश और एक युवक शशांक भी था। अमृत को नीचे पड़ा देख शशांक तुरंत ही उसकी ओर बढ़ा और उसे पकड़ लिया, "यह क्या हुआ आपको?"
"उन सैनिकों ने धक्का दिया और हमें चोट लग गई।" अमृत सिसकते हुए बोला।
"हम औषधि लगा लेंगे इस पर वैद्य जी से।" शशांक ने प्यार से उसके घाव पर फूँक मारते हुए कहा।
वैष्णव ने एक दृष्टि उन पर डाली और तभी शशांक ने कहा, "ये राजकीय सैनिक हमेशा हमारे साथ ऐसा ही करते हैं। क्या महाराज को यह ज्ञात नहीं होता कि हमारे साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है?"
वैष्णव की मुट्ठियाँ कस गईं। उसके पिता कितने व्यस्त होते थे, यह उसे ज्ञात था। "हम अपने पिताश्री के विरुद्ध एक भी अपशब्द और नहीं सुनेंगे। उन्होंने किसी को आदेश नहीं दिया यह सब करने के लिए। यदि यहाँ ऐसा कुछ हो रहा है तो आप लोग अधिकारियों तक शिकायत क्यों नहीं पहुँचा सकते?"
सभी खड़े हो चुके थे, परंतु उत्तर किसी की ओर से नहीं आया।
तभी शशांक ने कहा, "अवश्य पहुँचाएँगे, राजकुमार, यदि उन्हें सुनने में रुचि होगी।"
"शशांक," मुखिया ने दबे स्वर में उसे टोका।
"क्यों बाबा? हम स्वयं शिकायत लेकर गए थे। क्या सुना उन्होंने हमें? क्या महाराज का कर्तव्य नहीं है कि वे भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में जानकारी रखें? सीधे तौर पर हम महाराज से भेट करना तो दूर उन्हें देख तक नहीं सकते ।" शशांक गुस्से में बोला।
"बस, बहुत हुआ। अब हम आगे कुछ नहीं सुनेंगे। तिलक, इस सेना की टुकड़ी को बंदी बनाकर राजसभा में प्रस्तुत करो। कौन से अधिकारी शिकायत सुनने से मना करते हैं, उनका पता लगाओ और वैद्य जी को उनकी सहायता का मूल्य चुका देना।" इतना कहकर वैष्णव ने फिर से एक बार अमृत को देखा। अमृत भी उसे हैरानी भरी नजरों से देख रहा था, यह जानकर कि वैष्णव एक राजकुमार था।
तिलक ने कुछ सिक्कों से भरी पोटली उमेश की ओर बढ़ाई। उमेश ने हाथ जोड़ लिए, "क्षमा कीजिए, हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते।"
"आपको करना होगा।" तिलक ने जबरदस्ती उसके हाथ में वह छोटी सी पोटली थमाते हुए कहा।
फिर वह राजकुमार को अश्व पर बिठाकर स्वयं पैदल चलते हुए वहाँ से निकल गया। उनके साथ अभी भी कुछ सैनिक थे और गाँव में आए सैनिकों को भी बंदी बनाकर ले जाया जा रहा था।
गांव से कुछ दूर जाते ही वैष्णव के कानों में वह आवाज सुनाई दी। कोई उसे पुकार रहा था। तिलक ने पलट कर देखा तो अमृत भागता हुआ आ रहा था।
"राजकुमार, एक क्षण रुक जाइए," अमृत ने फिर कहा। वैष्णव ने हाथ दिखाया तो तिलक ने अश्व रोक दिया। वैष्णव ने अभी भी पलट कर नहीं देखा था।
सैनिकों के बीच प्रवेश कर निडर होकर आगे आते हुए अमृत ने वैष्णव की ओर चेहरा उठाया।
"क्या हुआ कन्या? आपने हमें किसलिए पुकारा?" वैष्णव की आवाज में शरारत का आभास मुश्किल से हो रहा था।
अमृत की आंखें छोटी हो गईं, "हमने कहा था न? हम कन्या नहीं हैं। और ये लीजिए, छोटी-सी भेंट! हमारे पास देने के लिए बस इतना ही है।"
वैष्णव की भौंहें हल्की सी ऊपर उठ गईं। उस पुराने कपड़े में लपेटे हुए कुछ फल थे। उन पर नजर न होकर राजकुमार की नजरें अमृत के जख्मी हाथ पर थीं।
उसने वह फल लेकर कहा, "हम यूं ही भेंट स्वीकार नहीं करते। अपने गांव वालों से कहना, हमने उनका कर माफ कर दिया।"
"क्या सच में? परंतु हमने तो बस यूं ही ये फल दिए थे। क्योंकि हमें असली राजकुमार से मिलना था और मिल लिए," अमृत ने हैरानी से कहा।
"तो हमारी ओर से भी बस छोटी-सी भेंट थी। क्योंकि हम एक सुंदर कन्या से मिले। अब हमे जाने की अनुमति है?" वैष्णव ने कहा।
इस पर अमृत ने बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ हाथ हिला दिया। उसने इस बार "कन्या" बुलाए जाने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
वे सभी आगे बढ़े और कुछ दूर जाकर राजकुमार ने तेज स्वर में कहा, "अपने घाव पर औषधि लगा लेना, कन्या!"
अमृत का हाथ रुक गया और वह चिढ़कर बोला, "हम कन्या नहीं हैं, बताया न?"
और वह पैर पटककर अपने गांव की ओर भाग गया। वैष्णव ने एक नजर पलट कर उसे देखा और फिर कपड़ा खोल कर उसमें से फल निकाले।
"आप इन्हें न खाएं, राजकुमार। हम वन से गुजरेंगे तब आपके लिए ताजा फल एकत्र कर लेंगे," तिलक ने कहा।
"हमें अभी भूख लगी है," राजकुमार का स्वर बिल्कुल ही बदल चुका था अब।
"तो फिर हमें पहले चखने दीजिए," तिलक की बातों में एक चिंता झलक रही थी।
"हर किसी पर संदेह नहीं किया जाता, सेनापति। वह मासूम कन्या - हमारा तात्पर्य है, बालक था," वैष्णव ने एक अमरूद हाथ में लेकर उसे देखते हुए कहा।
राजधानी पहुंचते ही वैष्णव को अपने पिता के मृत शरीर के दर्शन हुए, पर उसने स्वयं को टूटने नहीं दिया।
राजगुरु ने अगले दिन ही राजकुमार के राज्याभिषेक की घोषणा कर दी। और उसी के साथ राजधानी में हर ओर यह खबर फैल गई कि नए महाराज ने अपने सभी सगे-संबंधियों को कारावास में डाल दिया है।
इस एक खबर ने नए महाराज का भय प्रजा के मन में उत्पन्न कर दिया था। राजगुरु ने तिलक के व्यतिरिक्त दो और सेनापति नियुक्त किए । ताकि तिलक का अधिक से अधिक समय महाराज वैष्णव की सुरक्षा में व्यतीत हो सके।
दो वर्ष पश्चात, तिलक ने तेज कदमों से राजमहल में बने सबसे भव्य कक्ष में प्रवेश किया। महाराज बिस्तर पर पेट के बल लेटे हुए थे और एक सेवक उनकी पीठ दबा रहा था।
तिलक ने ठंडे स्वर में कहा, "महाराज, आप पुनः एकांतवास के नाम पर उस गांव में उस बालक से मिलने गए थे, न?"
"नहीं सेनापति! हम केवल भ्रमण के लिए गए थे। दो वर्ष पूर्व जो हमारी आंखों के सामने हुआ था, वह पुनः राज्य में न हो इसका ध्यान रखने के लिए हम भ्रमण करते हैं," वैष्णव ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया।
"आप अकेले गए थे महाराज, केवल दो मूर्खों को साथ लेकर। और हमसे झूठ मत कहिए। आप उस बालक से ही मिलने गए थे। बाकी सब बहाना है," तिलक अत्यंत क्रोध में था।
वैष्णव ने ठंडी सांस छोड़ी और सेवक को इशारा किया, "बस हो गया। आप जा सकते हैं।"
सेवक के जाते ही वैष्णव उठकर बैठ गया, "आपको क्या परेशानी है अगर हम उस बालक से मिलें?"
"क्योंकि आप महाराज हैं। इस तरह कहीं भी निकल जाना आपके प्राणों पर संकट ला देगा। इसके अलावा, एक साधारण बालक से मित्रता करना - इसे कोई भी स्वीकार नहीं करेगा," तिलक ने कहा।
"आपको ईर्ष्या हो रही है उससे? एक बालक से?" वैष्णव की आंखें छोटी हो गईं।
तिलक ने तुरंत ही नजरें झुका लीं, "हमारा ऐसा कहने का कोई तात्पर्य नहीं था। परंतु महाराज, वह बालक आपको बदल रहा है। आपको आपके मार्ग से भटका रहा है। आपके स्वभाव में पहले से कही अधिक अंतर नजर आता है। ऐसे में हमें राजगुरु से इस संदर्भ में बात करनी पड़ेगी, जिन्हें आप सुनते हैं।"
"सेनापति, अपनी मर्यादा में रहिए। हमें अच्छे से ज्ञात है क्या उचित है और क्या अनुचित। इस संदर्भ में पुनः कोई बात न हो तो बेहतर रहेगा। जाइए अब," वैष्णव ने सख्त शब्दों में कहा। तिलक ने सिर झुका कर वहां से प्रस्थान किया। महाराज के आदेश का उल्लंघन वह कभी नहीं करता था।
कक्ष से बाहर निकलते ही उसे सामने दो अठारह वर्षीय युवक दिखे, जो कान पकड़ कर घुटनों पर बैठे थे।
"सेनापति, हमें क्षमा कर दीजिए। महाराज ने कहा चलो, तो हमें जाना पड़ा," उनमें से एक युवक धर्म ने कहा।
"महाराज कहेंगे आग में कूद जाओ, तो कूद जाओगे?" तिलक ने क्रोधित होकर पूछा।
"अवश्य, महाराज का आदेश सर्वोपरि है," दूसरे ने (वीरेंद्र) तुरंत उत्तर दिया।
"रात्रि तक यहीं और इसी अवस्था में बैठे रहो," तिलक ने गुस्से में उन्हें घूरते हुए कहा और आगे बढ़ गया।
वहीं कक्ष के अंदर बैठे वैष्णव ने स्वयं से कहा, "साधारण बालक? वह वैद्य बनने की शिक्षा ले रहा है अपने पिता से । यदि हम कुछ वर्षों बाद उसे अपना राजवैद्य बना लें, तो वह साधारण नहीं रहेगा, न?"
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आगे जानने के लिए कहानी के साथ बने रहे ।