प्रेम बंधन Ch. 1

प्रेम बंधन - Chapter 1

Posted by Sarvam • Jun 20, 2025 01:02 PM

संध्या का समय था जब पहाड़ी पर स्थित कुलदेवी के मंदिर के सामने ही युद्ध हो रहा था। कुछ काले वस्त्र धारण किए हुए सैनिक राजसी सैनिकों पर आक्रमण कर रहे थे। राजसी सैनिक अपने प्राणों को दांव पर लगाते हुए अपने राजकुमार की रक्षा का प्रयास कर रहे थे। राजकुमार की आयु केवल तेरह वर्ष थी, फिर भी उसका पूरा प्रयास था कि उसे किसी की सुरक्षा की आवश्यकता न हो। युद्ध में मृत्यु का वरण करते अपने सैनिकों को देखकर उसका रक्त खौल रहा था। उसने अपने हाथों में शस्त्र को कसकर पकड़ रखा था, उसकी तलवार रक्त से रंजित थी।

उसी समय आकाश में बिजली कड़क उठी और वर्षा की बूँदें गिरना आरंभ हो गईं। अचानक ही पीछे से एक काले वस्त्र धारी सैनिक आगे बढ़ा और उसने राजकुमार की पीठ पर वार कर दिया।

पहले से घायल महाराज ने त्वरित गति से राजकुमार को अपने समीप खींच लिया और उस सैनिक का शीश धड़ से अलग कर दिया। परंतु इस बीच राजकुमार की पीठ पर एक गहरा घाव हो चुका था। उसके मुख से दर्द भरी कराह निकल पड़ी।

"राजकुमार!" महाराज ने चिंतित स्वर में पुकारा।

"हम ठीक हैं पिताश्री। आप अपने कार्य पर ध्यान दें।" राजकुमार ने दर्द के कारण अपनी आंखें भींच ली थीं। आधार के लिए उसने अपनी तलवार को भूमि पर टिका दिया, ताकि स्वयं को खड़ा रख सके।

महाराज ने कुछ क्षण उसे देखा और तत्पश्चात सेनापति के पुत्र को आदेश दिया, "तिलक, राजकुमार को शीघ्र गांव तक लेकर जाइए। वहाँ आपको सहायता प्राप्त होगी। और ध्यान रहे, हमारे पश्चात राजकुमार की सुरक्षा का उत्तरदायित्व आपका होगा। हम आपको राजकुमार के लिए अगला सेनापति नियुक्त करते हैं।"

तिलक की आंखें विस्मय से फैल गईं, परंतु अगले ही क्षण वह घुटनों पर बैठ गया और हाथ की मुट्ठी बनाकर अपने सीने से लगा ली, "आपके आदेश का पालन हम अंतिम श्वास तक करेंगे, महाराज।"

राजकुमार ने भी आश्चर्य से महाराज को देखा। कहीं न कहीं वह समझ चुका था कि महाराज का यहाँ से जीवित बच निकलना कठिन प्रतीत हो रहा था।

"आप हम तक पहुंचने का प्रयास करेंगे पिताश्री। वचन दीजिए।" राजकुमार ने महाराज का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसे ज्ञात था कि महाराज अपने आदेश को किसी भी स्थिति में नहीं बदलते।

"वैष्णव प्रताप राजवंशी, आपको हमारे बाद दुर्बल नहीं पड़ना है। आप मिथिला प्रदेश के भावी महाराज हैं। समझ गए?" महाराज की आवाज गंभीर और दृढ़ थी।

राजकुमार वैष्णव ने ऊँचे स्वर में उत्तर दिया, "हमें स्वीकार है, महाराज!"

महाराज की आँखें कुछ क्षणों के लिए कोमल हो गईं। उन्होंने हल्के से वैष्णव के सिर पर हाथ फेरा और तिलक को राजकुमार को ले जाने का संकेत दिया।

तिलक अपने अश्व के साथ राजकुमार के निकट पहुंचा। उसने राजकुमार को अपने साथ बिठाकर दोनों को एक कपड़े से कसकर बाँध लिया। तिलक के पिता ने भी अपनी पलकें झपकाकर वचन लिया कि वह भी राजकुमार की सुरक्षा में उसी तरह तत्पर रहेगा।

एक छोटी सी सैन्य टुकड़ी के साथ तिलक राजकुमार को लेकर वहाँ से निकल पड़ा।

उनका अश्व तीव्र गति से पहाड़ी उतरने लगा। वह जंगल का क्षेत्र था। छुपे हुए सैनिकों ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी। तिलक ने अश्व को नियंत्रित रखते हुए अपनी तलवार से बाणों का वार विफल करना आरंभ कर दिया। केवल अठारह वर्ष की आयु के इस युवक को अब राजकुमार का सेनापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ था।

रक्तस्राव के कारण राजकुमार चेतना खोने लगा था। उसकी आँखें मुँदने लगी थीं।

तभी तिलक ने कहा, "कुछ क्षण धैर्य रखिए, राजकुमार। हम शीघ्र ही निकट के गाँव तक पहुँच जाएंगे। वहाँ हमें सहायता मिल सकती है।"

राजकुमार की ओर से कोई उत्तर न आया। उसकी बेहोशी के कारण उसका सिर एक ओर लटक गया। निकलने से पूर्व तिलक ने दोनों को आपस में एक कपड़े से बाँध लिया था, जिसका उसे अब लाभ मिल रहा था।

जैसे ही वे पहाड़ी से नीचे उतरे, बाणों की वर्षा थम गई। किंतु तिलक की टुकड़ी से कुछ सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। फिर भी, पहाड़ी से उतरने के बाद तिलक के अश्व की गति में कमी नहीं आई।

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शाम के समय, आकाश में पुनः बिजली कड़क उठी और गाँव के एक घर के सामने आँगन में खड़े उमेश ने कहा, "बेटा अमृत, कपड़े भीग जाएँगे। उतार लाओगे उन्हें?"

"अभी लाया, बाबा!" दस वर्ष का अमृत दूर से ही चिल्लाया। वह दोस्तों के साथ तेज हवा का आनंद ले रहा था। भागते हुए उसके कंधों तक आते बाल हवा में लहरा रहे थे, जो आधे ही बँधे हुए थे।

गोरा रंग और बड़ी-बड़ी आँखें, पहली नज़र में कोई भी उसे कन्या समझ बैठता।

जल्दबाजी में उसने रस्सी पर टंगे कपड़ों को समेटा और उन्हें लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा।

उमेश अपनी औषधियों को समेट रहे थे, जिन्हें वे जंगल से लेकर आए थे।

दोनों ने तेज हवा के कारण घर का दरवाजा बंद कर लिया।

"बाबा, क्या तूफ़ान आने वाला है?" अमृत कपड़ों को मोड़ते हुए बोला।

"पता नहीं बेटे, तूफ़ान आना कोई छोटी बात नहीं होती। हमारे खेतों में फिर से हानि हो जाएगी।" उमेश ने चिंता व्यक्त की।

"क्या हमारी गाय इतनी तेज बारिश में बाहर ही बँधी रहेगी?" अमृत का एक और सवाल तैयार था। उमेश ने खिड़की बंद करते हुए कहा, "तो उन्हें कहाँ रखेंगे हम?"

"जब हमारे पास अधिक धन आएगा तो हम उनके लिए पक्का घर बनवाएँगे।" नटखट अमृत ने मुस्कराते हुए कहा।

"अवश्य, जैसा हमारे दयालु राजकुमार चाहेंगे। बस, धन आने की देर है अब।" उमेश ने हँसते हुए कहा।

दो समय का भोजन ही उनके लिए बहुत बड़ी बात थी। उमेश वैद्य थे, अधिकांश गाँव वालों का उपचार वे नि:शुल्क ही करते थे क्योंकि यहाँ गरीबी बहुत थी। आस-पास के गाँववाले भी उनके पास ही उपचार के लिए आते थे।

उमेश शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और उनका नन्हा पुत्र भी उन्हीं की तरह शांत था। उसने अभी से अपने पिता से औषधि का ज्ञान लेना आरंभ कर दिया था।

उसी समय बाहर वर्षा आरंभ हो गई। उमेश ने घर में दीप जलाए, जिससे चारों ओर प्रकाश फैल गया।

उमेश ने एक स्थान पर बैठकर प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, कृपया इस गाँव की समस्याएँ और न बढ़ाएँ और सबको सुरक्षित रखें।"

"मेरे बाबा की सभी इच्छाएँ पूरी करना, परमेश्वर।" अमृत ने भी बगल में बैठकर हाथ जोड़ लिए।

उमेश मुस्कुरा दिए। माँ-विहीन वह बालक कुछ अधिक ही समझदार था। वे एक-दूसरे का परिवार थे।

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कुछ समय बाद उमेश रात्रि का भोजन बनाने में व्यस्त हो गए। अमृत ने दीप की रोशनी में एक पुस्तक उठा ली। उमेश ने अपने पुत्र के साथ-साथ गाँव के अन्य बच्चों को भी शिक्षा देने का प्रयास किया था ताकि आगे जाकर वे राजधानी में कोई काम ढूंढ सकें। इस गाँव में रहकर सबका भविष्य उन्हें संकटग्रस्त ही प्रतीत हो रहा था। प्रदेश के एक कोने में बसे इस गाँव पर राजधानी के लोगों की दृष्टि भी दुर्लभ ही पड़ती थी। वे जैसे उनके लिए अस्तित्वहीन थे। हाँ, कर वसूलने के लिए उन्हें अवश्य गिना जाता था।

भोजन बन चुका था। उमेश और अमृत ने साथ बैठकर भोजन किया और फिर अपनी दिनचर्या पूरी करते हुए सो गए।

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उमेश की नींद टूटी जब अचानक किसी ने द्वार को पीटना शुरू कर दिया। अमृत भी जाग गया।

"इस समय कौन आ गया?" उमेश ने कहा और उठकर दरवाजा खोलने को बढ़े। उसे यकीन था कि इस समय उसके द्वार पर कोई मरीज ही होगा।

"क्या आप वैद्य हैं?" अंधेरे में किसी व्यक्ति ने किसी और को संभाले हुए पूछा।

"जी हां! परंतु आप कौन?" उमेश के पूछते ही, वह भीगा हुआ व्यक्ति अंदर प्रवेश कर गया।

प्रकाश में उसका चेहरा स्पष्ट हुआ। वह तिलक था। उमेश ने तिलक की बाजुओं में अचेतन अवस्था में झूल रहे युवक को देखा और आगे कुछ पूछे बिना उसे एक तरफ लिटाने का संकेत दिया।

फिर स्वयं उन्होंने शीघ्रता से उपचार की सामग्री तैयार करना आरंभ किया। घाव से अभी भी रक्तस्राव हो रहा था, जिसे देख अमृत की आँखें बड़ी हो गईं।

हल्के से चीखते हुए वह अपनी जगह लड़खड़ा गया। उमेश ने तुरंत कहा, "अमृत, जाकर सो जाओ।"

अमृत कुछ न बोल पाया और वहां से भाग गया।

अगली सुबह, खिड़की से आती तेज धूप वैष्णव के चेहरे पर पड़ी, जिससे उसने दूसरी ओर चेहरा कर लिया। उसे अपने शरीर में पीड़ा का अनुभव हो रहा था। उसने स्वयं को किसी कठोर बिस्तर पर पेट के बल सोया हुआ पाया।

जैसे ही उसकी आंखें खुलीं, सामने अमृत का छोटा चेहरा था, जो बड़ी ही ध्यानपूर्वक उसे देख रहा था।

"तुम कौन हो, कन्या? हमारे कक्ष में आने का साहस कैसे किया?" वैष्णव की क्रोधित आवाज सुन अमृत की आँखें बड़ी हो गईं और अगले ही पल नम हो गईं।

मुँह खोलकर उसने रोना शुरू कर दिया, "बाबा, इन्होंने हमें कन्या कहा।"

वैष्णव के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उसने उठने का प्रयास किया। तभी तिलक दौड़ते हुए वहां आया और उसकी सहायता की।

"हमने कहा था न, राजकुमार को परेशान मत करना, बालक? अब रोना बंद करो, तुम शोर कर रहे हो।" तिलक ने भी अमृत को डांट दिया।

इस पर अमृत का रोना बढ़ गया, "हमारे ही घर में आकर ये हमें डांट रहे हैं, बाबा।"

"क्या तुम कन्या नहीं हो?" वैष्णव ने हैरत भरी नजरों से उसे देखा।

अमृत ने रोना बंद कर उसे घूरा, "हम कन्या नहीं हैं। सुना आपने?"

"परंतु, कन्याओं की तरह रो रहे हो।" वैष्णव ने आँखें घुमा कर कहा।

अमृत का मुँह खुल गया, "बाबा, कहां हैं आप? इन्होंने फिर हमें कन्या कहा।"

तिलक को क्रोध तो बहुत आ रहा था, लेकिन राजकुमार को शांत देख वह कुछ न कह सका।

पर उसने इतना जरूर कहा, "तुम्हारे बाबा बाहर गए हैं। अब या तो बाहर जाकर रोना शुरू करो या उनके आने के बाद।"

अमृत यह सुनकर चुप हो गया, "हम शिकायत करेंगे उनसे।"

"अवश्य!" राजकुमार लापरवाही से बोला। उसे यकीन था कि किसी में इतनी हिम्मत नहीं जो उसे हानि पहुंचा सके।

अमृत पैर पटकते हुए वहां से चला गया। उसी समय वैष्णव का चेहरा गंभीर हो गया, "पिताश्री लौट आए? उनका कोई संदेश मिला?"

तिलक ने अपना सिर झुका लिया। संदेश तो मिला था, परंतु उसे बताना कठिन था।

"राजधानी चलने की व्यवस्था करो। हमें लौटना होगा," वैष्णव ने कहा।

"ऐसी अवस्था में, राजकुमार?" तिलक को उसके घाव की चिंता थी।

"हमने कहा ना? जाइए!" वैष्णव का आदेश पाकर तिलक को जाना पड़ा। कुछ समय तक वैष्णव ने आँखें बंद रखकर स्वयं को शांत रखा। मानो पीड़ा हो रही थी, लेकिन उसने अश्रुओं को बहने नहीं दिया।

आंखें खोलते ही उसे बाहर से कुछ तेज आवाजें सुनाई देने लगीं। इसी के साथ अमृत की एक चीख भी सुनाई दी।

आगे जानने के लिए कहानी के साथ बने रहे।

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