नाता तेरा-मेरा - Chapter 2
अनंत अपना सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकला। उसने इधर-उधर देखा। तभी सामने से किसी ने आवाज दी, "इधर-उधर कहाँ देख रहा है पागल डॉक्टर! जरा सामने देख।"
अनंत ने सामने देखा। वहाँ लगभग 30 साल का एक लड़का खड़ा था। उसे देख अनंत खुश होकर बोला, "शान्तनु भैया!" यह कहकर वह उसके गले लग गया।
शान्तनु ने भी उसे कसकर गले लगा लिया। फिर उसे दूर करते हुए, उसे नीचे से ऊपर तक देखते हुए बोला, "तू तो काफी हैंडसम डॉक्टर है यार! जिसे देखकर तो कोई भी पागल हो जाएगा, फिर कहाँ तक इलाज करेगा उनका?" उसने मजाकिया लहजे में कहा। यह सुनकर अनंत मुस्कुरा उठा और कहने लगा, "आप चिंता मत करो। यह मेरी प्रॉब्लम है, और मैं तो फिर भी दिमाग से खेलकर दिल को टटोलता हूँ। आप तो सीधा दिल पर ही वार करते हो।"
यह सुनकर शान्तनु हँस दिया और कहने लगा, "अरे इतना बड़ा कॉम्प्लिमेंट मत दे मुझे! और वैसे भी, लोगों के दिलों पर वार करना ही मेरा पेशा है।"
समझ तो गए होंगे कि शान्तनु ऐसा क्यों कह रहा है; क्योंकि वह एक कार्डियोलॉजिस्ट है, यानी दिल का डॉक्टर। शान्तनु का स्वभाव अपने भाइयों के लिए अलग है, और बाकियों के लिए अलग।
तभी अनंत शान्तनु से पूछने लगा, "वैसे आपने नील को बताया तो नहीं ना कि मैं आज आ रहा हूँ?"
"नो डियर ब्रदर। मैंने उसे तेरे आने के बारे में कुछ नहीं बताया।" शान्तनु ने ना में सिर हिलाकर कहा। यह सुनकर अनंत मुस्कुराते हुए बोला, "ओके! अब मैं पहले उसके हॉस्टल जाऊँगा और उसे सरप्राइज़ दूँगा।"
"ठीक है। दे देना सरप्राइज़, लेकिन अभी तो घर चल।" शान्तनु ने कहा। तो अनंत कहने लगा, "नहीं भैया, पहले मैं नील के पास ही जाऊँगा।"
"ठीक है। जैसी तेरी इच्छा।" यह कहते हुए शान्तनु उसे अपनी कार की तरफ ले गया। फिर अपने ड्राइवर से कहकर अनंत का सामान कार में रखवाने लगा।
इधर इंद्रजीत भी अपना सामान लेकर बाहर आया। तभी उसकी नज़र एक पुलिस जीप पर पड़ी। वहाँ एक पुलिस ऑफिसर किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था। उसकी उम्र लगभग 28 साल होगी। उसे देख इंद्रजीत थोड़ा असमंजस में पड़ गए। फिर कुछ सोचते हुए उसकी तरफ जाने लगे।
जब वह उसके पास आए, तो उन्हें देखकर उस पुलिस ऑफिसर ने अपने फ़ोन पर बात करते हुए कहा, "ओके! बाद में बात करता हूँ।" यह कहकर उसने कॉल रख दिया और इंद्रजीत की तरफ बिना देखे ही बोला, "मैं अपनी मर्ज़ी से आपको लेने नहीं आया, माँ ने कहा था।"
यह सुनकर इंद्रजीत की आइब्रो ऊँची हो गई और वह बोले, "कोई बहाना बना देते जिससे तुम्हें ना आना पड़ता।"
"बहाने बनाना आपको आता होगा, मुझे नहीं। और अब ज़्यादा फ़ालतू की बकवास मत करिये, चुपचाप घर चलिये।"
"निर्भय!" इस बार इंद्रजीत अपनी कड़क आवाज में बोले, "तुम्हारी बदतमीज़ियाँ हद से ज़्यादा बढ़ती जा रही हैं। मैं तुमसे कुछ कहता नहीं, इसका मतलब यह नहीं कि तुम अपनी हदें पार करो।"
यह सुनकर निर्भय ने इंद्रजीत की ओर देखा और बोला, "हदें तो आपने पार कर रखी हैं अपने गैर-कानूनी धंधों की। और मैं मजबूर... जिसके पास आपके खिलाफ़ कोई सबूत नहीं... खैर छोड़िये इस बात को, और चलिये।"
इसके बाद इंद्रजीत ने भी ज़्यादा कुछ नहीं कहा और उसकी जीप में बैठ गए। निर्भय जैसे ही जीप में बैठने लगा, उसकी नज़र सामने पड़ी जहाँ शान्तनु अपनी कार के पास खड़ा था। अनंत तो अंदर बैठ ही चुका था और शान्तनु अपने फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था।
शान्तनु को देखकर निर्भय के चेहरे पर प्यार भरी मुस्कान तैर गई और वह मन ही मन बोला, "सबके दिलों का इलाज करता है, पता नहीं मेरे दिल का इलाज कब करेगा?"
तभी इंद्रजीत जीप के अंदर से ही बोले, "अब क्या बाहर ही खड़े रहोगे?" उनकी आवाज सुनकर निर्भय के चेहरे पर खिसियाने वाले भाव आ गए। "घर ही जाना है... कोई प्लेन नहीं छूट रहा आपका?" उसने यह कहकर फिर से अपनी नज़रें शान्तनु पर जमा लीं। अंदर बैठे इंद्रजीत मन ही मन सोचने लगे, "क्या बेटा दिया है भगवान ने! ऐसा लगता है जैसे मैं नहीं, यह मेरा बाप हो।"
जब तक शान्तनु फ़ोन पर बात करता रहा, निर्भय उसे ऐसे ही प्यार भरी निगाहों से देखता रहा। कुछ देर बाद शान्तनु ने फ़ोन रखा, फिर वह भी कार में बैठ गया।
शान्तनु के कार में बैठ जाने के बाद निर्भय की तंद्रा भंग हुई। और वह शान्तनु की कार के चले जाने के बाद अपनी जीप में बैठा। उसने इंद्रजीत की तरफ़ बिल्कुल नहीं देखा और अपनी जीप स्टार्ट कर दी।
निर्भय इंद्रजीत का इकलौता बेटा है। इन दोनों बाप-बेटों की आपस में बिल्कुल नहीं बनती। बस अपनी माँ की वजह से कभी-कभी दोनों साथ आ जाते हैं।
जारी है......