नाता तेरा-मेरा Ch. 1

नाता तेरा-मेरा - Chapter 1

Posted by Sanyogita • May 02, 2025 11:32 AM

शिमला की ठंडी हवाओं के बीच एक बड़ा सा आलीशान बंगला था। उसके सबसे ऊपरी मंजिल वाले कमरे से जोर-जोर से चिल्लाने और सामानों के टूटने-फूटने की आवाज़ें आ रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई पागल किसी पर चिल्ला रहा हो, उसे कमरे से भगाने की कोशिश कर रहा हो।

उसी बंगले के बड़े से हॉल में, एक बड़ी सी आलीशान कुर्सी पर एक शख्स अपने पैर पर पैर चढ़ाए बैठा हुआ था। इस शख्स का नाम अशोक कुमावत था, उसकी उम्र 50 साल थी और उसका व्यक्तित्व काफी रौबदार था।

अशोक उस कुर्सी पर अपने चेहरे पर चिंता भरे भाव लिए बैठा था। तभी एक इंसान चीखता-चिल्लाता उसके सामने आया।

“मुझे माफ़ कर दीजिये, लेकिन मैं आपके बेटे का इलाज नहीं कर पाऊँगा... प्लीज़ मुझे जाने दीजिये!”

कुछ गार्ड्स ने आकर उसे पकड़ लिया। वो इंसान उनसे छूटने की कोशिश करता रहा।

तभी अशोक अपनी रौबदार आवाज़ में बोला, “इसका भी वही हाल करो जो यहाँ आए बाकी डॉक्टर्स का किया है।”

उसने अपने गार्ड्स को ऑर्डर दिया। वो लोग उस इंसान, जो कि एक डॉक्टर था, को पकड़कर ले गए। वो छूटने के लिए चिल्लाता रहा।

“मुझे अपने परिवार के पास जाना है, छोड़ दीजिये मुझे...”

वो चिल्लाता रहा, लेकिन किसी ने उसकी चीत्कार पर कोई ध्यान नहीं दिया। गार्ड्स उसे बेरहमी से पकड़कर वहाँ से ले गए।

अशोक के पास खड़ा उसका सेक्रेटरी कार्तिक बोला, “सर, ये दसवाँ डॉक्टर है जो रुद्रांश का इलाज नहीं कर पाया। आप कब तक इन डॉक्टर्स को सज़ा देते रहेंगे?”

“तब तक जब तक ऐसा कोई डॉक्टर नहीं मिल जाता जो रुद्रांश को ठीक कर सके,” अशोक ने शांत लहजे में कहा।

कार्तिक फिर से कहने लगा, “अगर ऐसा कोई डॉक्टर मिला ही नहीं तो?”

ये सुनकर अशोक ने अपनी तीखी नज़रों से उसे देखा और अपनी सख्त आवाज़ में कहने लगा, “तुम किसलिए हो? तुम्हें मैंने मुफ़्त की रोटी खाने के लिए नहीं रखा है। तुम्हारा काम है ऐसा डॉक्टर ढूँढकर लाना जो मेरे बेटे रुद्रांश का इलाज कर सके, उसे ठीक कर सके, अण्डरस्टैण्ड!”

ये कहकर वो अपनी कुर्सी से उठा और अपने रूम की तरफ़ चला गया।

पीछे खड़ा कार्तिक मन ही मन बोला, “साला खूँखार बुड्ढा! समझता क्या है ये अपने आप को, इसकी नौकरी करता हूँ तो रौब जमाता है और अब इसके पागल बेटे के लिए डॉक्टर भी ढूँढूँ! हुहं... बोलकर तो ऐसे गया है जैसे डॉक्टर नहीं, लाइफ़ पार्टनर ढूँढना हो।”

कार्तिक मन ही मन अशोक को कोस रहा था। कार्तिक की उम्र 26 साल थी। पहले इसके पिता दिवाकर अशोक के सेक्रेटरी थे, लेकिन उनकी मौत के बाद अशोक ने इसे सेक्रेटरी बना लिया था। दिवाकर काफी वफ़ादार था, लेकिन ये कार्तिक थोड़ा अलग ही मिजाज का था। अशोक के सामने तो उसकी चापलूसी करता था, लेकिन पीठ पीछे उसे कोसता रहता था और सबसे ज़्यादा उसके पागल बेटे रुद्रांश को।

उस बंगले के सबसे ऊपरी मंजिल के सबसे आखिरी वाले कमरे में रुद्रांश खिड़की के सामने लगी टेबल पर आलथी-पालथी मारकर बैठा खुले आकाश की तरफ़ देख रहा था। उसका चेहरा एकदम शांत था। शिमला की ठंडी हवाओं को वो अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था।

तभी किसी ने उसके कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोला और उसका खाना अंदर सरका दिया। कोई भी डर के मारे उसके कमरे में आने की हिम्मत नहीं करता था। रुद्रांश ने एक नज़र उस खाने की ओर देखा, फिर ज़्यादा ध्यान ना देते हुए फिर से उस खुले आकाश की ओर देखने लगा।

रुद्रांश की उम्र 27 साल थी। दो महीने पहले उसका एक्सीडेंट हुआ था जिसमें उसकी दिमागी हालत ख़राब हो गई थी। इसके पिता अशोक नहीं चाहते थे कि उनके बेटे का इलाज किसी पागलखाने में हो, इसलिए उन्होंने अपने बंगले में ही वो हर सुविधा उपलब्ध करवाई थी जिससे रुद्रांश का इलाज किया जा सके। लेकिन जो भी डॉक्टर उसका इलाज करने आता, वो एक दिन भी नहीं टिक पाता था। रुद्रांश का रौद्र रूप देखकर हर डॉक्टर यहाँ से डरकर भाग जाता था।

नहीं, गलत कह दिया मैंने, वो भाग भी नहीं पाता था, बल्कि अशोक के ऑर्डर पर उसे यहीं बंद करके रख लिया जाता था ताकि बाहरी दुनियाँ उसके बेटे के इस पागलपन के बारे में ना जान सके। अब ऐसा क्यों था, ये तो आगे कहानी में पता चलेगा।

इधर, एक फ्लाइट लंदन से इंडिया जा रही थी। उसमें एक 26 साल का खूबसूरत नौजवान बैठा था। वो एक मैगज़ीन पढ़ रहा था। उसके बगल में कोई 55 साल का शख्स बैठा हुआ था। उस शख्स ने जब उस नौजवान को देखा तो वो उससे बोला, “तुम शायद अनंत गुप्ता हो, है ना!”

अनंत ने अपने चेहरे के सामने से वो मैगज़ीन हटाकर उस शख्स को देखा और मुस्कुराकर बोला, “यस, लेकिन आप मुझे कैसे जानते हैं?”

“आई एम इंद्रजीत शेखावत!” ये कहकर उस शख्स ने अनंत से हाथ मिलाया और बोला, “तुम वही अनंत गुप्ता हो ना जो नीट के एग्ज़ाम में ऑल इंडिया में फर्स्ट रैंक पर आए थे?”

“जी हाँ, मैं वही अनंत गुप्ता हूँ। उसके बाद मैं अपनी एमडी की पढ़ाई के लिए लंदन आ गया था और आज एक साइकैट्रिस्ट बनकर वापस इंडिया जा रहा हूँ,” अनंत ने कहा।

इंद्रजीत मुस्कुराते हुए बोला, “अच्छा, तो तुम अपने देश में अपनी सेवाएँ देना चाहते हो।”

“जी हाँ, बिल्कुल सही समझा आपने। और इसके अलावा भी मेरा कुछ पर्सनल रीज़न है। वैसे आप क्या करते हैं?” अनंत ने उनसे पूछा।

“मैं तो एक बिज़नेस मैन हूँ। इंडिया में मेरे कई बिज़नेस हैं,” इंद्रजीत ने कहा।

“तो फिर आप लंदन में भी अपना बिज़नेस एस्टेब्लिश करने आए होंगे?” अनंत ने उससे पूछा। इंद्रजीत हँसते हुए बोला, “नो मि. अनंत, मैं तो यहाँ बस अपने एक दोस्त के बेटे की शादी में शामिल होने आया था।”

“ओके!” ये कहकर अनंत ने मैगज़ीन रखी और आराम से बैठ गया। तभी इंद्रजीत फिर बोला, “वैसे क्या मैं जान सकता हूँ कि तुम्हारा इंडिया जाने का पर्सनल रीज़न क्या है?”

ये सुनकर अनंत ने उसकी ओर देखा। इंद्रजीत कहने लगा, “एज़ योर विश। अगर तुम बताना चाहो तो, वरना मैं कोई प्रेशर नहीं डाल रहा।”

ये सुनकर अनंत मुस्कुराकर कहने लगा, “जी, मेरा एक छोटा भाई है और हम दोनों का एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं है। हाँ, एक बड़े भैया भी हैं जो शिमला के ही एक हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट हैं। जिनके डैड ने हम दोनों भाइयों को पाल-पोसकर बड़ा किया था। लेकिन उनकी डेथ के बाद हम दोनों फिर से अनाथ हो गए और हमारे साथ-साथ हमारे बड़े भैया भी।”

इंद्रजीत अनंत की बातों को बड़े ही ध्यान से सुनता रहा। कितना सीधा और सरल व्यक्तित्व था अनंत का, चेहरे पर गज़ब का आकर्षण और उसकी बातों से ही पता चलता था कि उसके लिए उसका फ़र्ज़ और उसके भाई कितना महत्व रखते हैं।

इंद्रजीत और अनंत ऐसे ही बातें करते रहे और कुछ समय बाद फ्लाइट शिमला के जुब्बरहट्टी एयरपोर्ट पर लैंड हो गई।

जारी है......

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