रणनीति ( साजिशों का खेल) Ch. 2

रणनीति ( साजिशों का खेल) - Chapter 2

Posted by Riya Sharma • Apr 30, 2025 12:07 PM

रात 11:47 PM –

सिया का घर, दिल्ली दरवाज़ा खोलते ही सामने अंधेरा था।एक थकी हुई सांस लेकर सिया ने लाइट ऑन की।कमरे में एक दीवार पर भारत का नक्शा टंगा था हर राज्य पर चिपका हुआ पोस्ट-इट, हर जगह पर एक राज़ दर्ज था। सिया ने बैग रखा, लैपटॉप खोला, और वो फाइल खोल दी जिसमें वसुंध राठौड़ की कंपनियों, उसकी बीवी की NGO, और उसकी बहन के स्कूल ट्रस्ट की डिटेल थी।

“हर महान आदमी की परछाई में एक गंदगी होती है… बस ज़रूरत है उसे उजागर करने की,” सिया खुद से बड़बड़ाई।

उसी वक्त फोन बजा उसका फोन बजने लगा, उसने देखा तो बॉस लिखा हुआ आ रहा था! फोन को उठाते ही " तभी सामने से एक आवाज आई " "तुमने क्या किया है आज?"आदित्य की आवाज़ थी। गुस्से में, मगर परवाह के साथ।

"सवाल पूछा है, वो भी कैमरे पर क्या गुनाह किया है मैने?" सिया ने लापरवाही से कहा!

"सिया, तुम्हारे पीछे लोग लग गए हैं। मेरी टीम के दो लड़कों को अज्ञात नंबर से धमकी आई है। अगर तुमने ये केस आगे बढ़ाया, तो वो…" इतना बोल आदित्य चुप हो गया!"

" "तो क्या? मुझे मार देंगे?"सिया ने हँसते हुए कहा—"तो फिर सही कहानी मिलेगी उन्हें… 'पत्रकार मरी, लेकिन झुकी नहीं'।

" "पागल हो तुम," इतना बोल आदित्य ने फोन काट दिया।

सिया ने फोन रखा और सब कुछ समेट कर वही सो गई!" "

" - -- सुबह – चैनल ऑफिस

कॉरिडोर में सिया और आदित्य आमने-सामने हुए। "तुम हर बार बहादुरी और बेवकूफी के बीच बहुत पतली लाइन पर चल रही हो," आदित्य ने कहा।

"और आप हर बार डर और समझदारी के बीच खुद को जस्टिफाई करते हो," सिया मुस्कुरा दी

। "तुम मेरी बेस्ट रिपोर्टर हो, सिया। इसलिए नहीं चाहता कि तुम जली हुई मिलो कहीं गली में।"

"और मैं जली हुई नहीं, इतिहास में दर्ज होना चाहती हूं, सर।"

आदित्य एक पल को चुप हुआ, फिर बोला— "ओके। शाम 6 बजे रेडी रहना। तुम्हें एक इन्फॉर्मर से मिलवाना है, जो वसुंध के पुराने स्कूल घोटाले का हिस्सा रहा है। लेकिन मेरी एक शर्त है—तुम अकेली नहीं जाओगी। मैं खुद चलूंगा।"

"अरे वाह, अब बॉस मुझे एस्कॉर्ट करेंगे?"सिया ने आंखें घुमाईं।

"तुम्हें बॉस समझ नहीं आता या मर्द?"आदित्य ने चिढ़ते हुए कहा।

"दोनों ही नहीं। मुझे सिर्फ फाइल समझ आती है," सिया मुस्कराई और वाह से निकल गई।

उसके जाते ही आदित्य भी चल गया था!"

" शाम 6:30 PM – पुरानी दिल्ली की गली........

अंधेरा, गंदगी, और एक टूटी हुई चाय की दुकान। एक बूढ़ा आदमी उनके सामने बैठा था आंखों में डर, पर दिल में बोझ।

"आप जानते हैं वसुंध के स्कूल घोटाले के बारे में?" सिया ने पूछा।

"जानता हूं बिटिया... वो स्कूल मेरे ही प्लॉट पर बना था। वो ज़मीन गैरकानूनी तरीके से छीनी गई थी। और स्कूल सिर्फ दिखावे का था, असल में वहां पार्टी के पैसे ट्रांसफर होते थे।मेरे पास सारे डॉक्युमेंट हैं… लेकिन…"

"लेकिन?" सिया ने आंखे घुमाते हुए पूछा?" "

"अगर मैंने तुम्हें ये दिए… तो मैं कल तक नहीं बचूंगा।" उस आदमी ने थोड़ा घबरा कर कहा!"

" सिया ने एक सांस ली, और चुपचाप अपना रिकॉर्डर स्टार्ट कर दिया।"तो बोलिए... ताकि मरने से पहले सच्चाई जी ले प्लीज अंकल!"

" रात का समय हो गया था, वही एक बड़ा सा बंगला था जिसपर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था" वसुंध राठौड़ "उस बंगले के एक बड़े से रूम में सोफे पर एक आदमी बैठा हुआ था और सामने एक बड़ी स्क्रीन पर सिया की फुटेज देख रहा था।

उसके PA ने कहा—"सर, ये लड़की रुकने वाली नहीं।

" वसुंध ने धीरे से कहा—"हर क्रांतिकारी की एक कमजोरी होती है।ढूंढो इसकी... चाहे प्यार हो, परिवार... या खुद उसका जुनून।"

तो वही रात के बारह बज रहे थे सिया का घर थकी हारी वो जैसे ही अपने अपार्टमेंट में घुसी, एक लिफाफा सामने पड़ा था। उसे देखकर दिया ने तुरंत उसे उठाया और देखा जिसमें सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—"सच की कीमत चुकानी पड़ती है, मिस त्रिपाठी तुम तैयार हो?" सिया ने उसे हाथ में पकड़ा और अंदर आकर बैठ गई!"

" तो वही वसुंध राठौड़ अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा हुआ खुद से ही बोला–" ""इस लड़की में आग है… लेकिन आग को बुझाना आता है मुझे।" वसुंध राठौड़ ने यह कहते हुए सिगार की राख फर्श पर झाड़ी,और एक लंबा कश लेकर अपनी आंखें बंद कर लीं। कमरे की रोशनी मद्धम थी — मूल्यवान लकड़ी से बना फर्नीचर, दीवारों पर पुराने स्वतंत्रता सेनानियों के फोटो,और बीच में रखी एक भारी टेबल जिस पर राजनीतिक नक्से, कुछ गोपनीय फाइलें, और एक लैपटॉप खुला पड़ा था।

"PA," उसने एक जोरदार आवाज़ दी।

"Yes, sir." उसके सामने खड़े उसके PA ने कहा!""

"जिस लड़की का नाम सिया त्रिपाठी है मुझे उसकी पूरी ज़िंदगी चाहिए।कहाँ पैदा हुई, किस स्कूल में गई, कॉलेज में क्या किया, किससे मिली, कौन से रिश्ते टूटे…सब।"

"Sir, privacy regulations…"

वसुंध की आंखें लाल हो उठीं, उसने गुस्से से कहा!""जब तक वो सांस ले रही है, कोई regulation उसे नहीं बचा सकता।मीडिया में काम करती है मैं उसे उसी की भाषा में जवाब दूंगा। पब्लिक इमेज को ढहा कर।

" PA चुपचाप झुक गया और हा में गर्दन हिलाते हुए चला गया!""

अगली सुबह – सिया का अपार्टमेंट

खिड़की से धूप झांक रही थी, लेकिन कमरे के भीतर साया पसरा था। सिया अलार्म से पहले ही उठ चुकी थी। रात भर नींद नहीं आई —घटनाएं उसके ज़हन में बार-बार घूमती रहीं:वसुंध की आंखों में दिखा वो अहंकार, वो अनदेखी धमकी,और अपने ही चैनल में आदित्य का संयमित डर। उसने बाल बांधे, और टूथब्रश करते हुए फ्रिज खोला—खाली था।

"शायद मेरी भूख भी अब समझौतों से परे हो गई है,"उसने खुद से कहा। फिर वो डायरी उठाई, जिसके पहले पन्ने पर उसके पापा की हैंडराइटिंग में लिखा था— > "तू कलम पकड़े रहना सिया, कभी न कभी ये दुनिया स्याही से हिलती है।"

उसके चेहरे पर एक हल्की, थकी सी मुस्कान आई।

--- 9:30 AM – न्यूज चैनल ऑफिस

"ब्रेकिंग न्यूज़!""मंत्री वसुंध राठौड़ के NGO की जाँच शुरू!" टीवी स्क्रीन पर बार-बार ये लाइन फ्लैश हो रही थी।लेकिन सिया को चैन नहीं था।वो अपने डेस्क पर बैठी फाइलों में सिर गड़ाए थी,और दूसरी तरफ़ आदित्य, धीरे-धीरे उसके व्यवहार को देख रहा था। "तुम्हें लगता है ये सब इतनी आसानी से रुक जाएगा?"

To Be Continued… ?

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