रणनीति ( साजिशों का खेल) Ch. 3

रणनीति ( साजिशों का खेल) - Chapter 3

Posted by Riya Sharma • Apr 30, 2025 12:07 PM

आदित्य ने परेशान होकर आखिरकार पूछा। "नहीं,"और शायद इसी में इसकी खूबसूरती है— जो लड़ाई आसान हो, वो पत्रकारिता नहीं, PR कहलाती है।"सिया ने दो टुक में जवाब दिया!"" आदित्य कुछ देर उसे देखता रहा।फिर धीरे से मुस्कराया, और उसके सामने एक फोल्डर रख दिया। "ये लो। अगला असाइनमेंट। नॉर्थ दिल्ली के एक अस्पताल में घोटाले की खबर है,लेकिन वहां पहुंचने से पहले तुम अपने घर चली जाओ।" "घर?" सिया ने सवाल भरी नजरे से देखा!" " "हां। तुम्हारी मां कल रात 4 बार ऑफिस कॉल कर चुकी हैं।और सुबह से तुम्हारा फोन बंद है।" सिया एकदम चुप हो गई।उसने अपना सर टेबल पर टिका लिया!" " --- 11:15 AM – लाजपत नगर, सिया का घर सिया अपना मुंह कवर करके एक छोटे से घर के सामने थी, उसने दरवाजा खटखाया तो दरवाज़ा मां ने खोला।चेहरे पर झुर्रियां, लेकिन आंखों में आज अजीब घबराहट थी। "इतनी बड़ी-बड़ी बातें करती है, पर अपनी मां को कुछ नहीं बताती?" उसकी मां ने सीधा सवाल।करते हुए कहा!"" "मां…" सिया ने कहा!"" "तू जिस आदमी से भिड़ रही है ना, उसने तेरे कॉलेज के एक दोस्त को फोन करवाया था।वो बोला, 'सिया को कह देना, अबकी बार सवाल पूछने से पहले घर की सुरक्षा देख लेना।'" सिया स्तब्ध रह गई।"मां… मुझे माफ़ करना…" "माफी नहीं चाहिए। बस मेरी एक बात याद रख—सच का रास्ता अच्छा होता है, लेकिन उसमें कांटे बहुत होते हैं। और जो कांटे मेरी बेटी के खून से लाल हों,तो उस रास्ते को जलाना पड़ेगा सिया ।" सिया कुछ नहीं कह सकी। बस मां के कंधे पर सिर रख दिया। --- शाम – न्यूज़ ऑफिस के बाहर एक कार कार में बैठा आदमी मोबाइल पर बोल रहा था— "सिया त्रिपाठी ने फिर से कदम बाहर रखा है। जैसा आपने कहा था, हम उसके पीछे हैं।"

दूसरी तरफ़ से वसुंध की आवाज़ आई— "कभी-कभी किसी को सबक सिखाने के लिए, उसे डराने की नहीं… उसके सबसे कीमती रिश्ते को तोड़ने की ज़रूरत होती है।" "समझ गया, सर।" --- रात – चैनल का प्रोडक्शन रूम सिया स्क्रीन पर खबर एडिट कर रही थी, जब अचानक आदित्य आया। "तुम्हारी मां का कॉल आया था।" "फिर से?" "नहीं। इस बार सिर्फ कहा कि तुम अगर ऑफिस में हो, तो जल्दी घर लौट जाना। और हां, उसने मुझसे पूछा, ‘क्या आप मेरी बेटी के साथ हैं?’" सिया थोड़ी चौंकी, फिर बोली— "और आपने क्या कहा?" "मैंने कहा, ‘जब तक वो सवाल करती रहेगी, मैं जवाब देने वालों से लड़ता रहूंगा।’" एक पल को सन्नाटा छा गया। सिया की आंखों में हल्का पानी उतर आया था, लेकिन उसने मुंह फेर लिया। आदित्य धीरे से बोला— "सिया… अगर तुम चाहो तो आज रात मेरे घर रुक सकती हो। सेफ है, लोकेशन भी किसी को नहीं पता।" "क्यों? डर है आपको?" "डर नहीं, पर कभी-कभी जो अकेले लड़ते हैं, उन्हें बस कोई इतना चाहिए होता है— जो उनके साथ खड़ा रहे।" --- कहीं और – वसुंध की मीटिंग "उसे तोड़ो। रिश्तों से, डर से, या अपमान से। लेकिन तोड़ो। सिया त्रिपाठी को गिराओ, तभी मेरी राजनीति सुरक्षित रहेगी।"

रात के डेढ़ बज चुके थे। दिल्ली की सड़कों पर अब केवल ट्रैफिक लाइट्स की लाल-पीली लहरें झिलमिला रही थीं और दूर से आते किसी ट्रक की आवाज़ बीच-बीच में सन्नाटे को काट रही थी।

सिया त्रिपाठी अब भी जाग रही थी।उसके कमरे की लाइट बुझी थी, बस लैपटॉप की स्क्रीन हल्की नीली रोशनी दे रही थी, जिसमें कुछ फाइलें खुली थीं वसुंध पांडे के पुराने इंटरव्यूज़, चुनावी वादे, और हाल ही में हुए दो टेंडरों की रिपोर्ट।

उसकी आंखें भारी हो रही थीं, लेकिन दिमाग थमा नहीं था।पास ही चाय का प्याला ठंडा पड़ा था और मां के कमरे से धीमी सांसों की आवाज़ आ रही थी। बाहर की बालकनी में कुछ देर पहले तक कोई बिल्ली घूम रही थी। अब सब शांत था, बहुत ज़्यादा।सिया ने एक लंबा सांस भरा और आंखें बंद कीं। कुछ पल को बस यही सोचना चाहा कि उसने जो शुरू किया है, क्या वो अकेली पूरी कर पाएगी? तभी उसका फोन वाइब्रेट हुआ।एकदम अचानक से फोन का वाइब्रेट देख सिया हल्का सा घबराई और उसने फौरन फोन उठाया उसने देखा तो " प्राइवेट नंबर था कोई नाम नहीं, कोई आईडी नहीं।उसने कॉल रिसीव करने से पहले हल्के से होठ भींचे। फिर, रिसीव बटन दबा दिया।

"हैलो?" सिया ने कहा!"

सामने से कोई आवाज नहीं आई सिर्फ चुप्पी।

"कौन है?" उसकी आवाज़ में हल्की झुंझलाहट थी।

फिर एक आवाज़ आई। धीमी, बुझी हुई और डरावनी सी।"सच जानने का बहुत शौक है ना? लेकिन कहीं ऐसा न हो कि ये सच… तुम्हारी मां की सांसें रोक दे।"

सिया एकदम खड़ी हो गई।उसके हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा। दिल ज़ोर से धड़क रहा था। वह कुछ कहती, उससे पहले ही कॉल कट गया।

उसने फौरन मां के कमरे की तरफ देखा।मां गहरी नींद में थीं, सब ठीक था। पर उसका खुद का चैन जा चुका था।वो वापस कमरे में आई और खिड़की का पर्दा थोड़ा हटाकर बाहर देखा।एक स्कूटी नीचे सड़क के कोने पर रुकी थी। हेलमेट पहने कोई शख्स कुछ देख रहा था। अगले ही पल वह मुड़कर चला गया।सिया के भीतर हलचल थी। एक अजीब सी बेचैनी जो अब सिर्फ सवालों में नहीं, डर में भी बदल रही थी।वो वापस टेबल पर बैठी। खुद को शांत करने की कोशिश की।तभी नज़र सामने पड़े एक भूरे रंग के लिफाफे पर गई—जो वहां पहले नहीं था।

वो चौंकी। उठकर लिफाफा उठाया।उस पर कुछ नहीं लिखा था। न नाम, न पता। उसने उसे धीरे से खोला। अंदर एक तस्वीर थी।

एक फोटो—वसुंध पांडे किसी पुराने सरकारी अफसर के साथ एक होटल के कमरे में, समय और तारीख के साथ।और साथ में एक लाइन:

"अगर ये बाहर आई, तो सिर्फ वसुंध नहीं गिरेगा… कोई और भी हमेशा के लिए खामोश हो जाएगा।"

सिया की उंगलियां कांपने लगीं।अब ये सिर्फ पत्रकारिता नहीं रही। ये निजी हो चुका था।

उसने तस्वीर को मेज पर रखा, गहरी सांस ली और खुद से कहा—"अब पीछे नहीं हट सकती। जो डर गया, वो बिक गया।" इतना बोल उसने सब कुछ समेट कर रखा और सो गई!"

to be continue.......

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