रणनीति ( साजिशों का खेल) Ch. 1

रणनीति ( साजिशों का खेल) - Chapter 1

Posted by Riya Sharma • Apr 30, 2025 12:07 PM

"कुछ भी लिखने से पहले, ये जान लो सिया — ये देश वो नहीं जहां सच बोलने पर तालियां मिलती हैं, यहां या तो मुकदमे मिलते हैं… या माउथ शट कर दिया जाता है।”

दिल्ली का दिसंबर और पत्रकार सिया त्रिपाठी का मिज़ाज दोनों एक जैसे सख्त और बर्फ जैसे ठंडे। लेकिन जहां मौसम खुद को बदलता है, सिया अपने उसूलों से एक इंच नहीं हटती। वह पत्रकारिता में नई है, लेकिन उसके सवाल इतने सीधे होते हैं कि सामने वाले की गर्दन झुक जाती है या अहंकार उठ खड़ा होता है।

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

NDT Prime चैनल की सुबह की मीटिंग में जब चीफ एडिटर ने कहा — "ये नेता वसुंध राठौड़ की फंडिंग रिपोर्ट कैंसिल कर दो, ऊपर से कॉल आया है",

तो सिया ने एक पल को रुककर उसकी आँखों में देखा –" ""सर, सवाल कैंसिल करने से सच मरता नहीं है। सिर्फ डर बढ़ता है।"उसकी आवाज़ धीमी थी लेकिन शब्द भारी थे।

सिया त्रिपाठी — उम्र 26, बीते तीन सालों से पत्रकारिता में। भोपाल की रहने वाली, दिल्ली आई थी सिर्फ एक जुनून के साथ — सच्चाई।

उसका स्टाइल सिंपल था — जीन्स, कुर्ता और एक पुराना कैमरा बैग जो हर समय उसके कंधे से लटकता रहता।

उस दिन, जब बाकी रिपोर्टर्स ऑफिस छोड़कर अपने "बीट" पर गए,सिया अकेली थी जो सीधे वसुंध राठौड़ के क्षेत्र, करोलबाग के स्लम एरिया में जा पहुंची।

वसुंध — दिल्ली का एक नामी राजनेता, जिसका चेहरा टीवी पर "विकास" की बातें करता था और परदे के पीछे वही सबसे बड़ा सौदागर था "वोटों और वायदों" का।

सिया ने एक छोटे बच्चे से पूछा —"क्या तुम्हारे स्कूल में कोई नया कम्प्यूटर आया है?"

बच्चे ने मासूमियत से कहा —"दीदी, स्कूल तो कब का टूट गया। अब तो यहां शराब की दुकान है।"

बस, सिया की अगली स्टोरी वहीं से शुरू हुई।

रात के 11 बजे तक, उसकी रिपोर्ट ऑन-एयर जा चुकी थी —"विकास का नकाब: राठौड़ की सच्चाई"

और सुबह चैनल के बाहर दो बाइक पर हेलमेट वाले दो लोग आए, और एक धमकी भरा लिफाफा छोड़ गए —

"अगली बार सिर्फ कैमरा नहीं टूटेगा, रिपोर्टर भी गिरेगा।"

चीफ एडिटर घबरा गया —

"सिया, अब रुक जाओ। ये दिल्ली की गली नहीं, राजनीति की गलियां हैं।"लेकिन सिया ने बस एक ही बात कही —"सर, मेरे पापा पोस्टमैन थे। उन्होंने कहा था कभी किसी का सच मत छुपाना।अब मैं कैसे रुक जाऊं?"

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अब सिया अकेली नहीं थी, बल्कि निशाने पर थी।

दूसरी तरफ… वसुंध राठौड़।

आरोपों के बीच भी मुस्कुराते चेहरे वाला नेता —

उम्र 36, स्मार्ट, तेज दिमाग और बेहद चालाक।

हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में वो सिया से आंखें मिलाता… जैसे कोई खेल खेल रहा हो।

"आपके पास कोई सबूत है मिस सिया?"

"या फिर TRP के लिए कहानी बना रही हैं?"

सिया उसकी बातों से नहीं डरती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक बात जरूर चुभती थी —

वो उसे कमजोर समझता था।

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एक दिन, लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच में सिया ने सवाल दागा —

"सर, आपने करोड़ों की फंडिंग कहां लगाई? अस्पताल की जगह वहां अब पार्किंग लॉट बन रहा है।"

वसुंध मुस्कराया —

"आप बहुत बोलती हैं, मिस त्रिपाठी।

मेरे पास वक्त नहीं बेवजह की बहस का।"

सिया आगे बढ़ी —

"तो जवाब दीजिए न, सच क्या है?"

वसुंध ने उसे ठहरकर देखा, पहली बार थोड़ी तीखी नजरों से —"सच? सच वो होता है जो जनता सुनना चाहती है…और आप जैसी लड़कियां वो कहती हैं जो दिखाना चाहती हैं।

आपकी पत्रकारिता नहीं, आपकी नीयत मुझे तकलीफ देती है।"कमरे में सन्नाटा छा गया।

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यहीं से शुरू हुआ “रणनीति” का असली खेल।

सिया को समझ आ गया था —

वो नेता सिर्फ सियासत का खिलाड़ी नहीं है, वो मनोविज्ञान का भी मास्टर है।

और अब सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं होगी —

एक मनोयुद्ध होगा, जिसमें हथियार होंगे शब्द, साजिश, और कभी-कभी… दिल की बेचैनी।

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रणनीति — एक ऐसी कहानी जहां सवालों से क्रांति होगी, और जवाबों में चुप्पी से सत्ता डोलेगी।

जहां एक लड़की, अपनी कलम से उस सत्ता की नींव हिलाएगी —

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क्या आप तैयार हैं उस जंग के लिए,

जहां मोहब्बत, बदला और सियासत — तीनों ही बराबर चलेंगे?

coming soon............

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