My Boss is my Secret Lover! - Chapter 2
शिविका को अपने पिता से इस बारे में बात करनी थी, इसीलिए वह पार्टी से घर के लिए निकल गई।
शिविका का घर पंजाब के लुधियाना शहर के वीआईपी एरिया में स्थित एक विशाल और सुंदर मेनसन था, जिसे "वृंदा मेनसन" के नाम से जाना जाता था। शिविका की स्वर्गीय माता का नाम वृंदा था और मेनसन के बाहर इसी नाम का एक बड़ा बोर्ड लगा हुआ था।
शिविका अपनी फेरारी कार से घर लौटी। उसका ड्राइवर कार चला रहा था और दिनेश अंकल ड्राइवर के साथ आगे बैठे थे। शिविका कार में पीछे अकेली बैठी थी।
उसे अपने पिता से शादी के बारे में बात करनी थी और हमेशा की तरह, इस बार भी शादी के प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करना था। इसलिए उसने पार्टी समाप्त होने का इंतजार किए बिना ही घर वापस आने का निर्णय लिया था।
घर के अंदर आते ही शिविका ने चारों ओर देखा, परन्तु उसके पिता घर में नज़र नहीं आए। उसने तेज आवाज़ में पुकारा, "पापा... पापा कहाँ हैं आप? और आप मेरी मर्ज़ी के बिना मेरी शादी कैसे तय कर सकते हैं?"
शिविका के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर, ग्राउंड फ्लोर पर स्थित एक कमरे से एक नर्स व्हीलचेयर लेकर बाहर निकली। व्हीलचेयर पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था, जिसकी आयु लगभग पचास से साठ वर्ष के बीच होगी।
"धीमी आवाज़ में बोलो। इतना ज़ोर से क्यों चिल्ला रही हो? काव्या जाग जाएगी।" व्हीलचेयर पर बैठे उस आदमी ने शिविका की ओर देखते हुए कहा।
उस आदमी के चेहरे पर एकदम सपाट भाव था। वह बिल्कुल भी गुस्से या नाराज़गी में नहीं लग रहा था।
वह आदमी कोई और नहीं, शिविका के पिता थे। शिविका के पिता का नाम मिस्टर देवेश खन्ना था और तीन साल पहले आए पैरालिसिस अटैक के बाद से वह व्हीलचेयर पर थे, क्योंकि उनके पैर काम नहीं करते थे। इस कारण वह थोड़े अजीब से हो गए थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि वे अपने घरवालों पर बोझ हैं।
उनकी पत्नी को दस साल हो चुके थे। अब घर में शिविका और काव्या के अलावा उनका एक बेकार बेटा ऋषभ था, जो आए दिन नशे, पार्टियों और अय्याशी में डूबा रहता था। उसे घर, परिवार, बिज़नेस और प्रॉपर्टी से कोई लेना-देना नहीं था।
शिविका के पिता ने उसे सबक सिखाने के लिए उसे पैसे देना बंद कर दिया था और उसके बैंक अकाउंट भी फ्रीज़ करवा दिए थे।
ऋषभ, शिविका से केवल दो साल छोटा था, लेकिन शिविका अपने छोटे भाई से बहुत प्यार करती थी, इसलिए वह अपने पिता से छुपकर उसे पैसे दे देती थी।
वह नहीं चाहती थी कि जिस तरह से उसके पिता बिज़नेस और काम में फंसकर अपनी ज़िंदगी का आनंद नहीं ले पाए, उसी तरह उसका भाई भी केवल काम करने की मशीन बनकर रह जाए। इसी सोच ने लगभग उसके भाई को पूरी तरह बिगाड़ दिया था।
ऋषभ के घर आने-जाने का कोई निश्चित समय नहीं था और वह अभी तक अपना कॉलेज भी पूरा नहीं कर पाया था। वह तीन साल से लगातार फाइनल ईयर में फेल हो रहा था, क्योंकि उसे पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता था। लेकिन शिविका उसकी सभी कमियों को हमेशा छिपाती रहती थी।
"मैं खुद भी चिल्लाना नहीं चाहती, पापा! मुझे कोई शौक नहीं है, लेकिन आप मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर करते हैं। आखिर वह लड़का पार्टी में क्या कर रहा था? और वह कौन है? मैं उसे जानती तक नहीं हूँ, और आपने उससे मेरी शादी तय कर दी? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?" शिविका ने एक के बाद एक शिकायत करते हुए कहा। उसकी आवाज़ भले ही पहले से थोड़ी धीमी थी, लेकिन वह अभी भी सामान्य लहजे में नहीं बोल रही थी।
"शिविका, देखो, बहुत हो गया तुम्हारा... अब मैं तुम्हारी और नहीं सुनने वाला। तुम 26 साल की हो गई हो और अगले महीने तुम्हारा जन्मदिन है। उससे पहले मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी और करण की सगाई हो जाए।" शिविका के पिता ने उसी तरह, बिना भाव वाले चेहरे के साथ अपना फैसला सुनाते हुए कहा।
"करण! वाह... उसका नाम भी मुझे अब पता चल रहा है। और यह शादी आपके लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? और आपको नहीं पता कि मेरे पास पहले से ही मेरी ज़िंदगी की वजह काव्या है? और आपको क्या लगता है, कौन सा आदमी उसे अपनी बेटी की तरह अपनाएगा?" शिविका ने निराश होकर कहा और अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई।
शिविका के पिता अपनी बेटी की ऐसी हालत नहीं देख पाए। उन्होंने अपने हाथ से व्हीलचेयर चलाते हुए उसके ठीक सामने आकर रुक गए और उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोले, "बेटा, करण बहुत अच्छा लड़का है और वह तुम्हारी सारी बातें मानने के लिए भी तैयार हो जाएगा। मुझे उस पर पूरा भरोसा है।"
"हो जाएगा से क्या मतलब है? आपने अभी तक उससे इस बारे में बात नहीं की है, क्या?" शिविका ने एक नज़र उठाकर अपने पिता की ओर देखते हुए थोड़ी उलझन से पूछा।
"नहीं... अभी तुम दोनों में से किसी को भी कुछ नहीं बताया गया है। करण...वह राज़ी हो जाएगा, क्योंकि उसके पिता को मैं पहले से ही जानता हूँ। हमारे यहाँ पहले काम भी करता था, डिजाइनिंग हेड के पद पर, लेकिन फिर..." इतना बोलते हुए शिविका के पिता चुप हो गए और शिविका ने भी उनसे आगे नहीं पूछा, क्योंकि वह अपने पिता को बहुत अच्छी तरह से जानती थी और समझती थी कि वह उसे केवल उतना ही बताएँगे जितना वे बताना चाहते हैं। इस तरह शिविका को करण और उसके परिवार के बारे में पूरी जानकारी कभी नहीं मिल पाएगी।
"अच्छा, ठीक है, लेकिन मैं यह शादी अपनी शर्तों पर करूँगी और उसे मेरी सारी बातें माननी होंगी। इसके साथ ही हम उसे काव्या के बारे में पूरा सच नहीं बताएँगे और यह कहेंगे कि वह मेरी सगी बेटी है, सिर्फ़ उसका रिएक्शन देखने के लिए..." शिविका ने अपने पिता के सामने शर्त रखते हुए कहा। उसकी इस बात पर उसके पिता ने पहली बार हल्का सा मुस्कुराया।
शिविका के पिता ने उसकी सहमति मिलते ही तुरंत कहा, "हाँ, ठीक है। तुम उससे मिलकर देख लो और हो सके तो उसके साथ थोड़ा समय बिताओ। मुझे पूरी उम्मीद है कि वह तुम्हें भी पसंद आएगा।"
अपने पिता की इस बात पर शिविका ने बेमन से मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे कोई भी इतनी जल्दी और आसानी से पसंद नहीं आता, और यह बात आप बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, पापा!"
"हाँ, और इसीलिए मैंने यह रिश्ता तय किया है, क्योंकि मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ, बेटा! और अब जाकर सो जाओ। रात काफी हो गई है। पार्टी से सीधे ही आ रही हो, थक भी गई होगी।" शिविका के पिता ने इतना कहा और फिर अपनी केयरटेकर नर्स से अपनी व्हीलचेयर वापस कमरे के अंदर ले जाने का इशारा किया।
उनका इशारा समझते ही वह नर्स उनकी व्हीलचेयर लेकर कमरे के अंदर चली गई।
अपने पिता की यह बात सुनने के बाद भी शिविका कुछ देर वहीं बैठी रही। दिनेश अंकल भी अब तक वहाँ से चले गए थे।
तभी शिविका ने गहरी साँस लेते हुए अपनी जगह से उठकर अपने कमरे की ओर बढ़ी, लेकिन तभी उसने घर की नौकरानी ज्योति को बुलाया और उससे काव्या के बारे में पूछा...
"बिटिया अपने कमरे में सो रही है, मैडम! मैंने उन्हें रात का खाना भी खिला दिया था।" ज्योति ने बताया। शिविका ने "ठीक है" कहकर अपने कमरे की ओर बढ़ गई।
अपने कमरे में जाकर कपड़े बदलने के बाद, शिविका ने अपना नाइटवियर पजामा और शर्ट पहना और अपने कमरे से निकलकर सीधा दूसरे कमरे की ओर आ गई।
वह कमरा शिविका के कमरे के बिल्कुल बगल में ही था। शिविका ने जैसे ही कमरे का दरवाजा खोला, उसने देखा कि एक मुलायम गुलाबी रंग के कंबल में चार साल की एक छोटी बच्ची बहुत आराम से सो रही है। उसके आस-पास छोटे-छोटे मुलायम खिलौने और तकिए रखे हुए थे, ताकि वह इतने बड़े बिस्तर पर साइड से नीचे ना गिरे।
छोटी बच्ची का कमरा बहुत ही प्यारा सुनहरे और गुलाबी रंग से सजा हुआ था। उसकी दीवारों पर स्ट्रॉबेरी शॉर्टकेक कार्टून की तस्वीरें बनी हुई थीं और जगह-जगह स्ट्रॉबेरी वाली सजावट थी। दीवारों पर सिंड्रेला और गुलाबी रंग की परी की पेंटिंग भी थीं।
लेकिन दरवाजे के पास खड़ी शिविका बहुत ही प्यार भरी नज़रों से उस सोती हुई प्यारी बच्ची को देख रही थी, जो सोते वक़्त पाउट बनाए हुए और भी ज़्यादा प्यारी लग रही थी। उसके मोटे-मोटे गाल सोते वक़्त और भी ज़्यादा मोटे लग रहे थे।
कुछ पल के लिए इतना सोचने के बाद शिविका कमरे के अंदर आई और उस छोटी बच्ची के दाहिनी ओर रखे हुए मुलायम खिलौनों और तकियों को हटाकर वहाँ पर खुद बैठ गई और बच्ची के सिर पर हाथ फेरते हुए बहुत ही प्यार से उसकी ओर देखने लगी।
"मेरी कवि! कितनी प्यारी लग रही है सोते हुए..." इतना बोलकर शिविका ने हल्का सा झुककर बच्ची के माथे पर हल्के से चुंबन किया। फिर वह बच्ची नींद में ही हल्का सा हिली, लेकिन शिविका ने उसके हाथ पर हल्के से थपकी दी, तो वह दोबारा उसी तरह गहरी नींद में सो गई।
उसे आराम से सोता देखकर शिविका भी उसके बगल में ही जगह बनाकर वहाँ पर सो गई।
क्रमशः