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Jisam Ki Agg
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Jisam Ki Agg

By gurwinder sidhu Ongoing
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समय अपनी चाल जरूर चलता है। जब चलता है, तो सब कुछ पलट कर रख देता है और इंसान को संभलने का मौका भी नहीं देता। एक तरह से इंसान के किए हुए कर्म ही किसी न किसी रूप में जरूर सामने आते हैं। जैसे अब मनवीर के साथ हो रहा था। 
शायद न कभी मनवीर ने यह सोचा होगा और न ह...
Chapter 14
Words 24.5K
Updated 25 days ago
Published Apr 12, 2026
Published Chapters
Jisam Ki Agg - Chapter 1 Free
Apr 12, 2026 20 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 2 Free
Apr 12, 2026 9 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 3 Free
Apr 12, 2026 4 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 4 Free
Apr 12, 2026 4 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 5 Free
Apr 12, 2026 4 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 6 Free
Apr 12, 2026 3 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 7 Free
Apr 12, 2026 3 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 8 Free
Apr 12, 2026 1 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 9 Free
Apr 12, 2026 1 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 10 Free
Apr 12, 2026 1 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 11 Free
Apr 18, 2026 1 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 12 Free
Apr 21, 2026 3 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 13 Free
May 12, 2026 0 Read
Jisam Ki Agg - Chapter 14 Free
May 12, 2026 0 Read
समय अपनी चाल जरूर चलता है। जब चलता है, तो सब कुछ पलट कर रख देता है और इंसान को संभलने का मौका भी नहीं देता। एक तरह से इंसान के किए हुए कर्म ही किसी न किसी रूप में जरूर सामने आते हैं। जैसे अब मनवीर के साथ हो रहा था। 
शायद न कभी मनवीर ने यह सोचा होगा और न ही मनवीर के परिवार ने कि जिसे हमने अपने लायक नहीं समझा, उसी से एक दिन इंसाफ मांगना पड़ेगा। जरीना भी चुपचाप बैठी थी। अपने आंसुओं को पोंछा और फिर से अपनी जिंदगी के अधूरे ख्वाबों में खो गई। 
मनवीर की पत्नी को भी अपने हक में बोलने का मौका दिया गया। अगर मनवीर एक पत्नी होने के बावजूद दूसरी औरतों से संबंध रख सकता है, तो मैं क्यों नहीं? जब मनवीर अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने रिश्तों के लिए वचनबद्ध नहीं हो सकता, तो फिर यह कैसे किसी और के चरित्र पर उंगली उठा सकता है? मैंने तो उसी की भाषा में उसे जवाब दिया है। 
जज साहब, मैंने तो अपने पुराने हमसफर की जिंदगी में से ही अपने लिए थोड़ी खुशी ढूंढने की कोशिश की। इसमें मैंने क्या गलत किया, जज साहब? 
बस बच्चे पैदा करने से सारी जिम्मेदारियां पूरी नहीं हो जातीं। यह तो हर रोज नई औरत की तलाश करता है। पता नहीं कितने घर बर्बाद कर दिए होंगे इसने। क्या जब मनवीर यह सब करता है, तो क्या यह सही है? अगर सही है, तो फिर मैं गलत कैसे? 

मनवीर आंखें झुकाए नीचे की ओर देखता खड़ा था। शायद मनवीर के पास अब अपनी सफाई में कहने को कुछ भी नहीं बचा था। 
वकीलों की बहस चल रही थी। एक-दूसरे को नीचा दिखाने और अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए तरह-तरह के आरोप और सवाल एक-दूसरे पर लगाए जा रहे थे। लेकिन जरीना तो अपने विचारों में खोई कहीं और ही गुम हो गई थी। वकीलों की बहस खत्म हुई। 
जज ने "ऑर्डर ऑर्डर" कहकर अदालत की कार्यवाही खत्म कर दी और केस की अगली तारीख दे दी। 
जरीना अपने ख्यालों में खोई अदालत से बाहर आई और गाड़ी में बैठकर जल्दी से अपने घर चली गई। माथे पर पसीना और दिल बेचैन होने लगा था। कुछ ही पलों में जैसे जरीना का अपने आप पर काबू खत्म होने लगा था। रसोई में गई, पानी का गिलास लिया और फिर अपने कमरे में आ गई। बिस्तर के सहारे ढेर होकर बैठ गई। 
जरीना की आंखों के सामने फिर से अपनी पुरानी जिंदगी के दिन याद आने लगे। कितना कुछ बदल गया था। क्या-क्या सोचा था और क्या हो गया था। जरीना की आंखों के सामने अचानक अंधेरा-सा छा गया। जरीना सोचों में डूबी फिर से अपनी पुरानी जिंदगी में वापस चली गई, जब उसने बारहवीं कक्षा में दाखिला लिया था। 

जिंदगी बेवफा थी, या दिल बेईमान हुआ, 
रातें सच्ची काली थीं, या रोशनी को गुमान हुआ, 
तारे हंसते थे तन्हाइयों के राजदार बनकर, 
जान बनकर जिस्म से जान निकाली, 
हमारे दिल पर सजना, तेरा यह एहसान हुआ, 
मुहब्बत बेइंतहा कर बैठा पागल दिल चंद्रा, 
तुझे अपना कहकर आज तो जिस्म भी बेजान हुआ। 

जरीना बहुत ही खूबसूरत और सौम्य लड़की थी। नीली आंखें, गोरा रंग, पतला शरीर, लंबी गर्दन, देखने में बिल्कुल परियों-सी लगती थी। जो कोई भी जरीना को देखता, बस देखता ही रह जाता था। जरीना इतनी हंसमुख थी कि कोई कितना ही उदास क्यों न हो, उसे एक बार देखकर सारे दुख-दर्द भूलकर हंसने को मजबूर हो जाता था। 
जरीना का परिवार मुसलमान था, लेकिन वे गुरुद्वारे भी जाते थे। जरीना के पिता के पास चार किल्ले जमीन थी, जहां वे खेती करते थे। खेती के साथ-साथ उनका शहर में भी कारोबार था, जो जरीना के पिता और चाचा मिलकर चलाते थे। लेकिन रहते ज्यादातर गांव में ही थे। जरीना ने अब बारहवीं कक्षा में दाखिला लिया था। पढ़ाई में भी बहुत होशियार थी। 
जरीना की स्कूल में दो सबसे खास सहेलियां थीं—स्वीप और जपलीन। तीनों ही बहुत खुशमिजाज थीं। एक साथ स्कूल आतीं, एक साथ ही स्कूल से घर वापस जातीं। सगी बहनों से भी बढ़कर लगती थीं। 

मनवीर भी जरीना के गांव के बड़े जमींदार परिवार से था। पहले अपने ननिहाल में रहता था। एक तो जायदाद खुली थी, दूसरे ननिहाल में रहने की वजह से बिंदासपन ज्यादा था और पैसे का रौब था। 

एक दिन जरीना अपनी सहेलियों के साथ स्कूल जा रही थी। एक तेज रफ्तार गाड़ी उनके पास से गुजरी। कच्ची सड़क होने की वजह से धूल-मिट्टी से भर गईं। जरीना ने चिल्लाकर गाड़ी रोकने की कोशिश की, लेकिन गाड़ी आग की तरह गुजर गई और देखते-देखते पक्की सड़क पर चढ़ गई। 
जरीना, स्वीप और जपलीन ने अपनी चुन्नियों से चेहरों पर लगी धूल-मिट्टी साफ की। मन ही मन बहुत गुस्सा भी हुआ। 
करतीं भी तो क्या करतीं, गाड़ी वाले का पता भी नहीं था कि कौन था। तीनों ही वापस घर की ओर चल पड़ीं। जरीना को बहुत ज्यादा गुस्सा था। 
स्वीप और जपलीन जरीना को समझाते हुए घर तक आ गईं। 
कभी फुर्सत से लिखेंगे तकदीर अपनी, 
एक-एक सांस के साथ तेरा जिक्र लिखेंगे, 
तेरे से शुरू और तेरे तक ही मंजिल मेरी, 
आखिरी पैगाम भी तेरे नाम लिखेंगे, 
एक-एक कतरा निचोड़ के लहू का, 
इस दिल पर सरेआम तेरा नाम लिखेंगे।






रूहों की मोहब्बत हीरे, 
कैसे अक्षरों में बयान करूं, 
कहकर तो देख एक बार मुझे, 
जान निकालकर तेरे कदमों में धर दूं। 

जरीना की मां ने अचानक तीनों को इस हाल में देखकर घबराते हुए कहा, 
"क्या हुआ? आज स्कूल से वापस क्यों आईं? ये क्या, सारा रेत-मिट्टी?" 
जरीना: "कुछ नहीं, बस ऐसे ही। एक फुक्कड़-सा लड़का इतनी तेज गाड़ी चलाकर ले गया कि हमें धूल-मिट्टी से भर दिया।" 
स्वीप: "कोई बदतमीज-सा था।" 
जरीना की मां: "नहा लो और दोबारा कपड़े पहन लो। और हां, तुम दूसरी गली से जाया करो, वो भी साफ है।" 

जरीना को अभी भी बहुत गुस्सा था। स्वीप और जपलीन ने बड़ी मुश्किल से जरीना को शांत किया। 
सारा दिन जरीना को उस गाड़ी वाले पर बहुत गुस्सा आता रहा। मन ही मन बहुत कुछ बोलती रही, लेकिन कर कुछ नहीं सकती थी। 

जरीना हर शाम अपनी सहेलियों के साथ गुरुद्वारे और मस्जिद जाया करती थी। पहले गुरुद्वारा, फिर मस्जिद। 
आज जब जरीना और उसकी सहेलियां गुरुद्वारे से बाहर निकलीं और मस्जिद की ओर जाने लगीं, तो मनवीर भी वहां मौजूद था। वह अपनी दादी को गुरुद्वारे लाया था। 
जरीना अपनी सहेलियों से बातें करते हुए बाहर आ रही थी। तभी जरीना की एक सहेली की नजर उस सुबह वाली गाड़ी पर पड़ी, जो गुरुद्वारे के बाहर खड़ी थी। उसने जरीना का ध्यान उस ओर खींचते हुए गाड़ी की तरफ इशारा किया। 
"ये वही गाड़ी है, जो सुबह गुजरी थी," उसने कहा। 
गाड़ी देखते ही जैसे जरीना का खून खौल उठा। गुस्से से लाल-पीली होने लगी। 

जरीना ने अपनी सहेलियों को वहीं रुकने को कहा और खुद गाड़ी की ओर चल पड़ी। सहेलियां उसे रोकने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन जरीना का गुस्सा तो जैसे सातवें आसमान पर पहुंच गया था। वह तेजी से गाड़ी की ओर बढ़ी। सहेलियां भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ीं। 
जरीना गाड़ी के पास खड़े मनवीर के पास पहुंची। स्वीप और जपलीन उसे रोक रही थीं, लेकिन वह कहां रुकने वाली थी। 
जरीना ने मनवीर से पूछा, "ये गाड़ी तेरी है?" 


ठंडी हवा के बुलबुले-सा लगता है तेरा एहसास सजना, 
तू न जाने इस दिल के लिए, तू कितना है खास सजना। 

मनवीर ने जरीना को पहली बार देखा और बस देखता ही रह गया। जरीना का गोरा रंग, सुडौल शरीर, बिल्ली-सी आंखें, काली जुल्फें... देखने में बिल्कुल परियों-सी लगती थी। मनवीर तो जैसे जरीना को देखते ही गहरे ख्यालों में खो गया। उसका ध्यान सिर्फ जरीना पर था। टकटकी बांधे वह उसी की ओर देख रहा था। 

जरीना ने फिर पूछा, "ऐ, हैलो! मैं तुझसे कुछ पूछ रही हूं... ये गाड़ी तेरी है?" 
मनवीर: "हांजी, मेरी ही है।" 
"क्यों, क्या हुआ जी?" 
जरीना: "सुबह भी तू ही चला रहा था?" 
मनवीर: "सुबह कब?" 
जरीना: "इतनी जल्दी भूल गया? अरे, सुबह कब!" 

जरीना की सहेलियां उसे शांत रहने को कह रही थीं, लेकिन जरीना का गुस्सा तो सातवें आसमान पर था। 
जरीना ने मनवीर को बोलना शुरू कर दिया। वह तेज आवाज में बोल रही थी, लेकिन मनवीर टकटकी बांधे बस उसकी ओर ही देखे जा रहा था। जरीना उसे कुछ कह रही थी, लेकिन मनवीर तो बस उसे देखता रहा। उसकी जुबान से जरीना के खिलाफ एक भी शब्द नहीं निकला। जरीना की खूबसूरती देखकर जैसे मनवीर की जुबान ही बंद हो गई थी। 
जरीना बस बोलती जा रही थी। मनवीर टकटकी बांधे उसके चेहरे को देखे जा रहा था। 

स्वीप और जपलीन ने जरीना को बांह से पकड़ा और अपने साथ खींचकर ले गईं। जरीना को चुप कराने की उनकी कोशिशें बेकार थीं। 
मनवीर अभी भी जरीना की ओर ही देख रहा था। जब तक जरीना उसकी आंखों से ओझल नहीं हुई, वह बस उसे ही देखता रहा। 
.

तेरी आंखों में हीरे, सारी कायनात बसती है, 
तेरे चेहरे की लाली भी, बहुत कुछ कहती है, 
जान निकाल ले जाती है हीरे, 
जब शर्म का मीठा हासा हंसती है।
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