Historical Fiction Ancient Historical Fiction
Haaaa
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निश्चित रूप से, आपकी कहानी का पहला एपिसोड शुद्ध हिंदी (देवनागरी लिपि) में यहाँ प्रस्तुत है। इसमें राजपूती आन-बान और किरदारों के मन के द्वंद्व को दर्शाया गया है: एपिसोड 1: समझौते की दहलीज उदयपुर के भव्य किले की दीवारें आज हज़ारों दीपकों की रोशनी से जगमगा रह...
निश्चित रूप से, आपकी कहानी का पहला एपिसोड शुद्ध हिंदी (देवनागरी लिपि) में यहाँ प्रस्तुत है। इसमें राजपूती आन-बान और किरदारों के मन के द्वंद्व को दर्शाया गया है: एपिसोड 1: समझौते की दहलीज उदयपुर के भव्य किले की दीवारें आज हज़ारों दीपकों की रोशनी से जगमगा रही थीं, पर महल के भीतर का सन्नाटा किसी आने वाले तूफान की आहट जैसा था। शहनाई की गूंज में खुशी कम और एक अनजाना भारीपन ज़्यादा महसूस हो रहा था। दृश्य 1: राठौड़ी बन्नी का श्रृंगार किले के एक विशाल कक्ष में, राठौड़ी कन्या आईने के सामने बैठी थी। उसने गहरे लाल रंग की राजपूती पोशाक पहनी थी, जिस पर कुंदन और गोटा-पत्ती का इतना भारी काम था कि उसका हर एक टांका उसे अपनी मजबूरी की दास्तान लग रहा था। उसकी बड़ी बहन ने धीरे से उसके माथे पर रखड़ी सजाई और पीछे शीशफूल को बालों में पिरोया। जब उसकी छोटी बहन ने उसके हाथों में सुनहरी जंजीरों वाला हथफूल पहनाया, तो बन्नी की आँखों से एक आँसू निकलकर उसके हाथ की ताज़ा रची मेहंदी पर गिर गया। "जीजी, रोना मत... आपकी मेहंदी का रंग फीका पड़ जाएगा," छोटी बहन ने कांपते हुए स्वर में कहा। बन्नी ने आईने में खुद को देखा—वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी, पर उसकी आँखों की चमक गायब थी। उसके पिता ने उदयपुर के राज-घराने को जो वचन दिया था, आज वह उसी वचन की भेंट चढ़ रही थी। उसने अपनी ओढ़नी का लंबा घूंघट नीचे गिरा लिया, जैसे अपने दर्द को दुनिया से छुपाना चाहती हो। दृश्य 2: कुँवर का इनकार वहीं दूसरी तरफ, उदयपुर के कुँवर अपने कक्ष में बेचैनी से टहल रहे थे। उनका केसरिया साफ़ा मेज पर रखा था। उनका चेहरा गुस्से और बेबसी से तमतमाया हुआ था। वह इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे। उन्हें लग रहा था कि उनके ऊपर एक ऐसी लड़की थोपी जा रही है जिसे वह जानते तक नहीं। "यह रिश्ता मेवाड़ की शान हो सकता है, पर मेरी पसंद नहीं," उन्होंने अपने मित्र से तीखे स्वर में कहा। पर राज-परिवार की मर्यादा और दबाव के आगे उनकी एक न चली। उन्होंने भारी मन से अपनी म्यान से तलवार उठाई और मंडप की ओर कदम बढ़ा दिए। दृश्य 3: मंडप का तनाव मंडप में अग्नि कुंड की लपटें ऊँची उठ रही थीं। जब बन्नी अपनी बहनों के साथ मंडप में आई, तो पूरे दरबार में एक अजीब सी खामोशी छा गई। कुँवर ने एक बार भी उनकी ओर नहीं देखा, जैसे वह अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हों। पंडित जी ने गंभीर स्वर में कहा, "हथ-लेवा की रस्म शुरू कीजिए।" कुँवर ने अपना सख्त हाथ आगे किया। बन्नी ने कांपते हुए हाथों से अपना हाथ उनकी हथेली पर रखा। जैसे ही उनका हथफूल कुँवर की कड़क उंगलियों से टकराया, दोनों के भीतर एक सिहरन सी दौड़ गई। बन्नी की थरथराहट कुँवर ने साफ़ महसूस की। उन्होंने पहली बार घूंघट की बारीक जाली के पीछे छिपे उस चेहरे को देखने की कोशिश की, पर उन्हें सिर्फ गिरते हुए आँसुओं की ठंडक महसूस हुई। बन्नी
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निश्चित रूप से, आपकी कहानी का पहला एपिसोड शुद्ध हिंदी (देवनागरी लिपि) में यहाँ प्रस्तुत है। इसमें राजपूती आन-बान और किरदारों के मन के द्वंद्व को दर्शाया गया है: एपिसोड 1: समझौते की दहलीज उदयपुर के भव्य किले की दीवारें आज हज़ारों दीपकों की रोशनी से जगमगा रही थीं, पर महल के भीतर का सन्नाटा किसी आने वाले तूफान की आहट जैसा था। शहनाई की गूंज में खुशी कम और एक अनजाना भारीपन ज़्यादा महसूस हो रहा था। दृश्य 1: राठौड़ी बन्नी का श्रृंगार किले के एक विशाल कक्ष में, राठौड़ी कन्या आईने के सामने बैठी थी। उसने गहरे लाल रंग की राजपूती पोशाक पहनी थी, जिस पर कुंदन और गोटा-पत्ती का इतना भारी काम था कि उसका हर एक टांका उसे अपनी मजबूरी की दास्तान लग रहा था। उसकी बड़ी बहन ने धीरे से उसके माथे पर रखड़ी सजाई और पीछे शीशफूल को बालों में पिरोया। जब उसकी छोटी बहन ने उसके हाथों में सुनहरी जंजीरों वाला हथफूल पहनाया, तो बन्नी की आँखों से एक आँसू निकलकर उसके हाथ की ताज़ा रची मेहंदी पर गिर गया। "जीजी, रोना मत... आपकी मेहंदी का रंग फीका पड़ जाएगा," छोटी बहन ने कांपते हुए स्वर में कहा। बन्नी ने आईने में खुद को देखा—वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी, पर उसकी आँखों की चमक गायब थी। उसके पिता ने उदयपुर के राज-घराने को जो वचन दिया था, आज वह उसी वचन की भेंट चढ़ रही थी। उसने अपनी ओढ़नी का लंबा घूंघट नीचे गिरा लिया, जैसे अपने दर्द को दुनिया से छुपाना चाहती हो। दृश्य 2: कुँवर का इनकार वहीं दूसरी तरफ, उदयपुर के कुँवर अपने कक्ष में बेचैनी से टहल रहे थे। उनका केसरिया साफ़ा मेज पर रखा था। उनका चेहरा गुस्से और बेबसी से तमतमाया हुआ था। वह इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे। उन्हें लग रहा था कि उनके ऊपर एक ऐसी लड़की थोपी जा रही है जिसे वह जानते तक नहीं। "यह रिश्ता मेवाड़ की शान हो सकता है, पर मेरी पसंद नहीं," उन्होंने अपने मित्र से तीखे स्वर में कहा। पर राज-परिवार की मर्यादा और दबाव के आगे उनकी एक न चली। उन्होंने भारी मन से अपनी म्यान से तलवार उठाई और मंडप की ओर कदम बढ़ा दिए। दृश्य 3: मंडप का तनाव मंडप में अग्नि कुंड की लपटें ऊँची उठ रही थीं। जब बन्नी अपनी बहनों के साथ मंडप में आई, तो पूरे दरबार में एक अजीब सी खामोशी छा गई। कुँवर ने एक बार भी उनकी ओर नहीं देखा, जैसे वह अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हों। पंडित जी ने गंभीर स्वर में कहा, "हथ-लेवा की रस्म शुरू कीजिए।" कुँवर ने अपना सख्त हाथ आगे किया। बन्नी ने कांपते हुए हाथों से अपना हाथ उनकी हथेली पर रखा। जैसे ही उनका हथफूल कुँवर की कड़क उंगलियों से टकराया, दोनों के भीतर एक सिहरन सी दौड़ गई। बन्नी की थरथराहट कुँवर ने साफ़ महसूस की। उन्होंने पहली बार घूंघट की बारीक जाली के पीछे छिपे उस चेहरे को देखने की कोशिश की, पर उन्हें सिर्फ गिरते हुए आँसुओं की ठंडक महसूस हुई। बन्नी
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